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________________ षष्टितमः सर्गः ७१७ विमलोऽनन्तजिद्धर्मः शान्तिः कुन्थुररो जिनः । मल्लिः शल्यकुशोद्धारो मुनीन्द्रो मुनिसुव्रतः ।।१४०॥ नमिश्च निवृतो नेमिवर्तमानोऽहमत्र तु । पाश्चापि महावीरो मवितारौ जिनेश्वरौ ॥१४१॥ जम्बूद्वीपविदेहेऽष्टौ मरते पञ्च ते जिना । सप्तव धातकीखण्डे चत्वारः पुष्करार्धजाः ॥१४॥ प्राग्मवे पुण्डरीकिण्यां वृषमः शान्तिरीश्वरः । अजितस्तु सुसीमायां क्षेमपुर्यामरो जिनः ॥१४३॥ रनसंचयजः कुन्थुः संभवश्वामिनन्दनः । मल्लिश्च वीतशोकायां जम्बूद्वीपविदेहजाः॥१४॥ चम्पायामिह कौशाम्ब्यां गजाहनगरेऽपि ते-ऽयोध्यायां भरतक्षेत्रे छत्राकारपुरे क्रमात् ॥१४५॥ मुनिसुव्रतनाथश्च नमिर्ने मिजिनस्तथा । पाख्यिश्च महावीरः पञ्चामी पूर्वजन्मनि ॥१४६॥ पुण्डरीकिण्यखण्डश्रीः सुसीमाक्षेमपुर्यपि । धातकीखण्डपूर्वाध सक्रम रत्न संचयम् ।।१४७॥ सुमत्यादिचतुर्णा च पुरः पूर्वत्र जन्मनि । सुविध्यादिचतुर्णा च पूर्वपुष्फरजास्त्वमू ॥१४॥ तथैव धातकोखण्डे पश्चादैरावतक्षितौ । अनन्तजिदमत्पूर्वमरिष्टपुरसंभवः ॥१४९।। पूर्वार्धभारते तस्य विमलस्तु महापुरे । मद्रिलादौ पुरे धर्मस्तम नामान्यमूनि तु ॥१५॥ वज्रनामिरभूदायो विमलस्तदनन्तरः । विपुलो वाहनान्तोऽन्यो महाबल इतीरितः ॥१५॥ परोऽतिबल इत्यासीदपराजित इत्यतः । नन्दिषेणस्तथा पयो महापद्मः स्मृतः परः ॥१५२।। पद्मगुल्मोऽपि नलिनगुल्मः पनोत्तरः परः । पद्मासनः पुनः पद्मस्तथा दशरथो नृपः ।।१५३॥ राजा मेघरथः सिंहरथो धनपतिः परः । नाम्ना वैश्रवणो राजा श्रीधर्माख्यस्ततः परः ॥१५॥ वासुपूज्य, विमलनाथ, अनन्तजित्, धर्मनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, शल्यरूपी कुशको निकालनेवाले मल्लिनाथ, मुनियोंके स्वामी मुनि सुव्रतनाथ और नमिनाथ तीर्थकर हुए हैं। ये सभी निर्वाणको प्राप्त हो चुके हैं। बाईसवां तीर्थकर मैं नेमिनाथ अभी वर्तमान है और पार्श्वनाथ तथा महावीर ये दो तीर्थंकर आगे होंगे ॥१३८-१४१।। इन तीर्थंकरोंमें-से आठ. तीर्थकर पूर्वभवमें जम्बूद्वीपके विदेहक्षेत्रमें, पांच भरतक्षेत्रमें, सात धातकी-खण्डमें और चार पुष्कराधमें उत्पन्न हुए थे ॥१४२।। जम्बूद्वीपके विदेह क्षेत्रमें उत्पन्न हुए आठ तीर्थंकरोंका विवरण इस प्रकार हैवृषभनाथ और शान्तिनाथ पूर्वभवमें जम्बूद्वीपसम्बन्धी विदेहक्षेत्रकी पुण्डरीकिणी नगरीमें, अजितनाथ सुसीमा नगरीमें, अरनाथ क्षेमपुरीमें, कुन्थुनाथ, सम्भवनाथ और अभिनन्दननाथ रत्नसंचय नगरमें और मल्लिनाथ वीतशोका नगरीमें उत्पन्न हुए थे ॥१४३-१४४।। भरतक्षेत्रमें उत्पन्न हुए पांच तीर्थकर इस प्रकार हैं-मुनि सुव्रतनाथ चम्पापुरीमें, नमिनाथ कौशाम्बी नगरीमें, नेमिनाथ हस्तिनापुरमें, पार्श्वनाथ अयोध्यामें और महावीर छत्राकारपुरमें पूर्वभवमें उत्पन्न हुए थे ॥१४५-१४६।। ___धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वाधंमें जन्म लेनेवाले सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्वनाथ और चन्द्रप्रभ इन चार तीर्थंकरोंको पूर्वभवको नगरियां क्रमसे अखण्ड लक्ष्मीकी धारक पुण्डरीकिणीपुरी, सुसीमापुरी, क्षेमपुरी और रत्नसंचयपुरी थीं। सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयोनाथ और वासुपूज्य इन चार तीर्थंकरोंकी पूर्व जन्मकी नगरियां क्रमसे पूर्व पुष्कराधसम्बन्धी पुण्डरीकिणी, सुसोमा, क्षेमपुरी और रत्नसंचयपुरी थीं ॥१४७-१४८|| अनन्तजित् ( अनन्तनाथ ) भगवान् पूर्वभवमें धातकीखण्ड द्वीपके पश्चिम ऐरावत क्षेत्र-सम्बन्धी अरिष्टपुर नगरमें उत्पन्न हुए थे ॥१४९॥ विमलनाथ पूर्वाधसम्बन्धी भरत-क्षेत्रके महापुर नगरमें और धर्मनाथ भद्रिलपुर नगरमें उत्पन्न हुए थे। इन तीर्थंकरोंके पूर्वभवके नाम इस प्रकार हैं-१. वज्रनाभि, २. विमल, ३. विपुलवाहन, ४. महाबल, ५. अतिबल, ६. अपराजित, ७. नन्दिषेण, ८. पम, ९. महापन, १०. पद्मगुल्म, १. पदः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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