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________________ ७१६ हरिवंशपुराणे यौवनं स परिप्राप्तः कन्याजनमनोहरम् । ततोऽस्मै वरयांचके चक्री राजकुमारिकाः ॥१२७।। भभिरूपतरां कन्यां सोमशर्माग्रजन्मनः । प्रजातां क्षत्रियायां च सोमाख्यां वृतवान् हरिः ।।१२८॥ विवाहारम्भसमये मुदिताखिलयादवे । जाते जिनपतिः प्राप्तो विहरन् द्वारिका तदा ।।१२९।। समागत्योपविष्टं तमद्रौ रैवतिके विभुम् । वन्दितुं निर्ययुः सर्वे यादवा बहुमङ्गलाः ॥१३०॥ दृष्ट्वा गजकुमारस्तमाटोपं द्वारिकोद्भवम् । पृष्ट्वा कञ्जुकिनं जैनं विवेद हितमादितः ॥१३॥ ततो गजकुमारोऽपि प्रयातो वन्दितं जिनम् । रथेनादित्यवर्णन हर्षाद्रोमाञ्चमुद्वहन् ।।१३२।। आर्हन्त्यविभवोपेतं गणे-दशभिवृतम् । जिनं नत्वोपविष्टोऽसौ कुमारश्चक्रपाणिना ॥१३३॥ जगाद भगवांस्तत्र नृसुरासुरसंसदि । संसारतरणोपायं धर्म रत्नत्रयोज्ज्वलम् ।।१३४॥ प्रस्तावे हरिरमाक्षीजिनेन्द्रं प्रणिपत्य सः । अत्यन्तादरपूर्णेच्छः श्रोतृलोकहितेच्छया ।।१५।। अर्हतां चक्रिणामर्धचक्रिणां सीरधारिणाम् । उत्पत्ति प्रतिशत्रूणां जिनानामन्तराणि च ॥१३६॥ यथाप्रश्नमितस्तस्मै संभूति विष्णवे ततः । त्रिषष्टियुगमुख्यानां प्रोवाच पुरुषेशिनाम् ।।१३७॥ आद्यो वृषभनाथोऽभूद जितः संभवः प्रभुः । अभिनन्दननाथश्च सुमतिः पद्मसंप्रमः ।।१३८॥ सुपार्श्वनामधेयोऽन्यश्चन्द्रप्रभ इतीश्वरः । सुविधिः शीतल: श्रेयान् वासुपूज्यश्च पूजितः ।।१३९।। जब गजकुमार कन्याओंके मनको हरण करनेवाले यौवनको प्राप्त हुआ तब कृष्णने उत्तमोत्तम राजकुमारियोंके साथ उसका विवाह कराया ॥१२७|| सोमशर्मा ब्राह्मणकी एक सोमा नामको अत्यन्त सुन्दर कन्या थी जो उसकी क्षत्रिया स्त्रीसे उत्पन्न हुई थी। श्रीकृष्णने गजकुमारके लिए उसका भी वरण किया ।।१२८॥ जब उसके विवाहके प्रारम्भका समय आया तब समस्त यादव अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसी समय विहार करते हुए भगवान् नेमिनाथ द्वारिकापुरी आये ।।१२९|| जब भगवान् आकर गिरनार पर्वतपर विराजमान हो गये तब समस्त यादव अनेक मंगल द्रव्य लिये हुए उनकी वन्दना करनेके लिए नगरसे बाहर निकले ॥१३०॥ द्वारिकामें होनेवाले इस आटोप (हलचल ) को देखकर गजकुमारने किसी कंचुकीसे पूछा और प्रारम्भसे ही जिनेन्द्र भगवान्की समस्त हितकारी चेष्टाको जान लिया ॥१३१।। तदनन्तर गजकुमार भी हर्षसे रोमांच धारण करता हुआ सूर्यके समान वर्णवाले रथपर सवार हो जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना करनेके लिए गया ।।१३२॥ वहाँ आर्हन्त्य लक्ष्मीसे युक्त तथा बारह सभाओंसे घिरे हुए जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर गजकुमार श्रीकृष्णके साथ मनुष्योंकी सभामें बैठ गया ॥१३३॥ भगवान् नेमि जिनेन्द्रने, मनुष्य, सुर तथा असुरोंकी उस सभामें उस धर्मका निरूपण किया जो संसार-सागरसे पार होनेका एकमात्र उपाय था एवं जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी रत्नत्रयसे उज्ज्वल था ॥१३४॥ अवसर आनेपर अत्यन्त आदरसे पूर्ण इच्छाके धारक श्रीकृष्णने जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर श्रोताओंके हितकी इच्छासे तीर्थंकरों, चक्रवतियों, अर्ध चक्रवतियों, बलभद्रों और प्रतिनारायणोंकी उत्पत्ति तथा तीर्थंकरोंके अन्तरालको पूछा ॥१३५-१३६॥ तदनन्तर भगवान प्रश्नके अनुसार श्रीकृष्णके लिए त्रेशठ शलाकापूरुषोंमें प्रमुख चौबीस तीर्थंकरोंकी उत्पत्ति इस प्रकार कहने लगे ।। १३७ ।। उन्होंने कहा कि इस युगमें सबसे पहले तीर्थकर वृषभनाथ हुए। उनके पश्चात् क्रमसे अजितनाथ, सम्भवनाथ, अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपाश्वनाथ, चन्द्रप्रभ, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयोनाथ, १. निर्ययो म.। २. दृष्ट्वा म. । ३. तीर्थकृताम् । ४. नारायणानाम् । ५. बलभद्राणाम् । ६. उत्पत्ति: म.। ७. प्रतिनारायणानाम् । ८. च विशेषतः म., घ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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