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________________ पष्टितमः सर्गः क्षुत्पीडिता जनास्तत्र दिग्मूढा मूढबुद्धयः । मृगा इव मृता दुःखात् किंपाकफल भक्षिणः ॥ ११४ ॥ अनास्वाद्य फलान्येषा 'पद्मदेवी दृढव्रता । प्रत्याख्यायैकपल्यायुरन्ते हैमवतेऽभवत् ॥११५॥ देवी स्वयंप्रभस्यातो व्यन्तरस्य स्वयंप्रमा । स्वयंभूरमणद्वीपे स्वयंप्रभगिरावभूत् ॥ ११६ ॥ ततश्चागस्य भरते जयन्तनगरेशिनः । श्रीमत्यां विमलश्रीः सा श्रीधरस्य सुताभवत् ॥ ११७ ॥ प्रादायि मेघनादाय सा मद्रिलपुरेशिने । लेभे च तनयं ख्यातं मेघघोषाख्ययावनौ ॥११८॥ मर्तरि स्वर्ग सापि पद्मावस्यायिकान्तिके । आचाम्लवर्धमानाख्यं तपः कृत्वा दिवं ययौ ॥ ११९॥ सा सहस्रारकरूपस्य पत्युर्मृत्वा कामिनी । नवपञ्चकपल्यैस्तु तुल्यं कालमजीगमत् ॥ १२० ॥ जातास्य ततश्च्युत्वा त्वमरिष्टपुरेशिनः । श्रीमत्यां स्वर्णनाभस्य सुता पद्मावती श्रुता ।। १२१ ॥ तपसा नाकमारुह्य देवश्च्युत्वा तपोबलात् । सेत्स्यति त्वमिति प्रोक्ते श्रुत्वा सा जिनमानमत् ॥ १२२॥ रोहिणीदेवकीपूर्वा देव्योऽन्येऽपि च यादवाः । पृष्ट्वा श्रुत्वा स्वजन्मानि जाता संसारभीरवः ॥ १२३॥ नुत्वा नत्वा जिनेन्द्रं तं सुरासुराश्व यादवाः । यान्ति स्वस्थानमायान्ति पूजनार्थं पुनः पुनः ॥ १२४॥ विजहार पुनर्देशान् जिनो भव्य हिताय सः । सूर्यस्येव हि चर्यासीजगत् कार्याय वैभवी ॥ १२५ ॥ इतश्च वसुदेवाभं वासुदेवमनः प्रियम् । सुतं गजकुमाराख्यं देवकी सुषुवे शुभम् ॥ १२६ ॥ सिंहरथने हठपूर्वक उस भीलको मार डाला जिससे उसके बन्धन में स्थित शाल्मलीखण्ड ग्रामकी समस्त जनता छूटकर शरणरहित वनमें इधर-उधर भ्रमण करने लगी ||११३ || मूढबुद्धि लोग दिशाभ्रान्ति होनेसे उस वन में मृगोंकी भाँति भटक गये और भूखसे पीड़ित हो किपाक फल खाकर दुःखसे मर गये ||११४ || पद्मदेवी अपने व्रतमें दृढ़ थी इसलिए उसने अज्ञात फल होने से उन फलोंको नहीं खाया और संन्यास मरण कर वह अन्तमें हैमवत क्षेत्रमें एक पल्यको ७१५ युवाली आय हुई ||११५|| तदनन्तर स्वयंभूरमण द्वीपके स्वयम्प्रभ नामक पर्वतपर स्वयम्प्रभ नामक व्यन्तर देवकी स्वयम्प्रभा नामको देवी हुई ||११६ || वहांसे आकर भरत क्षेत्रसम्बन्धी जयन्त नगर के स्वामी राजा श्रीधरकी श्रीमती नामक रानीसे विमलश्री नामकी पुत्री हुई ॥११७॥ विमलश्री, भद्विलपुरके राजा मेघनादके लिए दी गयी। उसके संयोगसे उसने पृथिवीपर मेघघोष नामसे प्रसिद्ध पुत्र प्राप्त किया ||११८।। कदाचित् पतिका स्वर्गवास हो जानेपर उसने पद्मावती आर्थिक के समीप दीक्षा लेकर आचाम्लवर्धन नामका तप तपा और उसके प्रभावसे वह स्वर्ग गयी ॥ ११९ ॥ | स्वर्ग में वह सहस्रार स्वर्गके इन्द्रकी प्रधान देवी हुई ओर पैंतालीस पल्य प्रमाण वहाँका काल व्यतीत करती रही || १२०|| अब वहाँसे च्युत होकर तू अरिष्टपुरके राजा स्वर्णनामकी श्रीमती रानीसे पद्मावती नामकी पुत्री हुई है ।। १२१ ॥ तपकर तु स्वगंमें देव होगी और वहांसे च्युत हो तपके सामर्थ्य से मोक्ष प्राप्त करेगी। इस प्रकार कहे जानेपर अपने भवान्तर सुन पद्मावतीने नेमि जिनेन्द्रको नमस्कार किया || १२२|| रोहिणी, देवकी आदि देवियों और अन्य यादवोंने भी अपने-अपने भव पूछे तथा श्रवण कर वे संसारसे भयभीत हुए || १२३|| इस प्रकार सुर, असुर तथा यादव लोग जिनेन्द्र भगवान्‌की स्तुति कर तथा उन्हें नमस्कार कर अपने-अपने स्थानपर चले जाते थे और पूजाके लिए बारबार आ जाते थे || १२४ ॥ तदनन्तर नेमि जिनेन्द्रने भव्य जीवोंके हितके लिए पुनः अनेक देशों में विहार किया सो ठीक ही है क्योंकि उनकी चर्या सूर्यके समान जगत् के हित के लिए ही थी || १२५ ॥ इधर देवकीने कृष्ण के पश्चात् गजकुमार नामका एक दूसरा पुत्र उत्पन्न किया जो वसुदेवके समान कान्तिका धारक था, श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय था एवं अन्यन्त शुभ था ॥ १२६॥ १. पद्मादेवी म. । २. बुद्ध्वा म । ३. विभोरियं वैभवी । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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