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________________ ७१० हरिवंशपुराणे वज्रमुष्टेः सुभदायां सुमतिस्तनयामवत् । सुन्दर्यायिकया पाश्र्वे करवा रत्नावलीतपः ॥५१॥ सा त्रयोदशपल्यायुब्रह्मेन्द्रामाङ्गनामवत् । च्युतातो दक्षिणश्रेण्या विजयार्धस्य भारते ॥५२॥ नगरे जाम्बवाभिख्ये जाम्बवस्य खगेशिनः । जाम्बवत्या प्रियायां त्वं जाता जाम्बवती सुता ॥५३॥ तपस्तपस्विनी कृत्वा भूत्वा कल्पामरोत्तमः । च्युत्वा नृपात्मजो भूत्वा तपसा सिद्धिमेष्यति ॥५४॥ सेत्युक्त त्यतसंशीतिः शीलालंकृतिशालिनी । प्रणम्य जिनमासीना मन्वाना भवनिर्गमम् ॥५५॥ जननानि जिनो पृष्टो विनयेन सुसीमया । सभाजनमनोह्लादजननध्वनिनाब्रवीत् ॥५६॥ धातकीखण्डपूर्वार्धमेरुपूर्व विदेहजे । 'विषये मङ्गलावत्यां नगरे रत्नसंचये ॥५॥ भूपतिर्विश्वसेनोऽभूद्भार्यास्यानुन्धरीरिता । अमात्यः श्रावकोऽस्यैव विश्रुतः सुमतिश्रुतिः ॥५८॥ पद्मसेनेन निहतोऽयोध्याधिपतिना युधि । विश्वसेनोऽस्य जायायै सोऽमात्यो धर्ममब्रवीत् ॥५॥ मोहादप्राप्तसम्यक्त्वा विजयद्वारवासिनः । मृत्वा ज्वलितवेगाभूद् व्यंतरी विजयस्य सा ॥६॥ दशवर्षसहस्राणि भुक्त्वा तत्र सुखं ततः । च्युता चिरं परिभ्रम्य मीमं संसारसागरम् ॥६॥ जम्बूद्वीपविदेहेऽतः सीताया दक्षिणे तटे । रम्ये रम्याभिधे क्षेत्रे शालिग्रामे महाधने ॥६२॥ जम्बूद्वीपकी पुण्डरीकिणी नामक विशालपुरीमें वज्रमुष्टिको सुभद्रा स्त्रीसे सुमति नामकी पुत्री हुई। वहां उसने सुन्दरी नामक आर्यिकासे प्रेरित हो उनके समीप रत्नावली नामका तप किया जिसके प्रभावसे मरकर वह तेरह पल्यकी आयुकी धारक ब्रह्मेन्द्रकी प्रधान इन्द्राणी हुई। तदनन्तर वहाँसे भी च्युत होकर भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजया पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें जाम्बव नामक नगरके विद्याधर राजा जाम्बवकी जाम्बवती नामक रानीसे तू जाम्बवतो नामकी पुत्री हुई ।।४८-५३।। इस भवमें तू तपस्विनी होकर तप करेगी और स्वर्गका उत्तम देव होकर वहाँसे च्युत हो राजपुत्र होगी। तदनन्तर तपके द्वारा मोक्षको प्राप्त होगी ।।५४।। इस प्रकार भगवान्के द्वारा अपने पूर्वभव 'कहे जानेपर जिसका सब संशय दूर हो गया था तथा जो शीलरूपी अलंकारसे सुशोभित थी ऐसी जाम्बवती रानी जिनेन्द्र देवको प्रणाम कर 'मैं संसारसे पार हो गयी' ऐसा मानती हुई सुखसे आसीन हुई ॥५५॥ तदनन्तर सुशीला नामक चौथी पट्टरानीने विनयपूर्वक जिनेन्द्र भगवान्से अपने भवान्तर पूछे सो भगवान् सभासदोंके मनको आनन्द उत्पन्न करनेवाली दिव्यध्वनिसे उसके भवान्तर इस प्रकार वर्णन करने लगे धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वार्धमें जो मेरु पर्वत है उससे पूर्वकी ओरके विदेह क्षेत्रमें एक मंगलावतो नामका देश है । उसके रत्नसंचय नामक नगरमें किसी समय विश्वसेन राजा रहता था उसको स्त्रीका नाम अनुन्धरी था। इसी राजाका एक सुमति नामका प्रसिद्ध मन्त्री था जो श्रावक धर्मका प्रतिपालक था ॥५६-५८|| कदाचित् अयोध्याके राजा पद्मसेनने राजा विश्वसेनको युद्ध में प्राणरहित कर दिया जिससे उसकी स्त्री अनुन्धरी बहुत दुःखी हुई। सुमति मन्त्रीने उसे धमका उपदेश दिया परन्तु मोहके कारण वह सम्यग्दर्शनको प्राप्त नहीं हो सकी और आयके अन्तमें मरकर विजयद्वारपर निवास करनेवाले विजय नामक व्यन्तर देवकी ज्वलनवेगा नामको व्यन्तरी हुई ।।५९-६०॥ दश हजार वर्ष तक वहाँके सुख भोगकर वह वहांसे च्युत हुई और चिरकाल तक भयंकर संसार-सागरमें परिभ्रमण करती रही ।।६१।। तदनन्तर जम्बूद्वीपके विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके दक्षिण तटपर एक रम्य नामका सुन्दर क्षेत्र है । उसके महाधनसम्पन्न शालिग्राम नामक नगरमें एक यक्षिल नामका गृहपति रहता था। उसकी स्त्रीका नाम देवसेना था। १. सुन्दर्यायिकायाः ख. । २. विजयो म. (?) । ३. विदेहेन्तः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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