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________________ ३६ हरिवंशपुराणे प्रकृत्या मधुमांसादिसावधाहारवर्जिताः । अर्जयन्ति सुमानुष्यं कुमानुष्यं कुकर्मभिः ॥ १२६ ॥ पापनिर्जरणात् कैश्चित् तिर्यग्नारकजन्तुभिः । प्राप्यते प्रियमानुष्यं देवैश्च शुभकर्मभिः ॥ १२७ ॥ मनुष्यश्वेऽपि जन्तूनामार्यम्लेच्छकुलाकुले । दुःखमेवेप्सितालाभाद् विप्रयोगात्प्रियैर्जनैः ॥ १२८ ॥ नापि प्राप्तेप्सितार्थानां संयुक्तानां प्रियैर्जनैः । विषयेन्धनदीप्तेच्छापावकानां नृणां सुखम् ॥ १२९॥ यदेव जायते नृत्वं केषांचिन्मोक्षकारणम् । आसन्न भव्य सत्त्वानां दर्शनादिनिषेविणाम् ॥१३०॥ तदेव जायतेऽन्येषां दीर्घसंसारकारणम् । सुदूर भव्य सत्वानां नरत्वं मुग्धचेतसाम् ॥१३१॥ कर्मभूमिषु सर्वासु भोगभूमिषु च स्थिती । तिरश्चामिव निश्श्रेये नृस्थिती च परावरे ॥१३२॥ अब्भक्षा वायुभक्षाश्च मूलपत्रफलाशिनः । उपशान्तधियोऽभ्यस्तकषायेन्द्रियनिग्रहाः ॥ १३३॥ तापसा बालतपसः कायक्लेशपरायणाः । अकामनिर्जरायुक्तास्तिर्यञ्चो बन्धरोधिनः ॥ १३४ ॥ भावना व्यन्तरा देवा ज्योतिष्काः कल्पवासिनः । अल्पर्द्धयो हि जायन्ते ते मिथ्यात्वमलीमसाः ॥ १३५ ॥ देवाः कन्दर्पनामानो नित्यं कन्दर्परञ्जिताः । आभियोग्याः सभायोग्याः क्लिष्टाः किल्विषकादयः ॥ १३६ ॥ ते महर्द्धिकदेवानां दृष्ट्वैश्वर्यं महोदयम् । देवदुर्गतिदुःखार्ता दुःखमश्नन्ति मानसम् ॥१३७॥ सम्यग्दर्शनलामस्य दुर्लभत्वादभव्यवत् । भव्या अपि निमज्जन्ति भवदुःखम होदधौ ॥ १३८ ॥ भावनानां भवत्यब्धिः साधिकः परमा स्थितिः । भौमानां पल्यमन्या तु दशवर्षसहस्रिका ॥ १३९॥ ज्योतिषां साधिकं पल्यं पल्याष्टशंशोऽवरा परा । स्वर्गिणां सागराः पल्यं साधिकं ह्यपरा स्थितिः ॥ १४०॥ ही पापभीरु हैं और स्वभावसे ही मधुमांसादि सावद्य आहारके त्यागी हैं वे उत्तम मनुष्यपर्याय प्राप्त करते हैं तथा जो खोटे कर्म करते हैं वे खोटी मनुष्यपर्याय प्राप्त करते हैं ||१२५-१२६ || पाप कर्मोंकी निर्जरा होनेसे कितने ही तिर्यंच तथा नारकी और शुभ कर्म करनेवाले देव भी उत्तम पर्याय प्राप्त करते हैं ||१२७|| आर्य तथा म्लेच्छ कुलसे भरा हुआ मनुष्य जीवन प्राप्त होनेपर भी इच्छित वस्तुकी प्राप्ति नहीं होनेसे तथा प्रियजनोंके साथ वियोग होने के कारण जीवोंको दुःख ही प्राप्त होता रहता है || १२८|| कितने ही मनुष्यों को यद्यपि इच्छित पदार्थ प्राप्त होते रहते हैं और प्रियजनोंके साथ उनका समागम भी होता रहता है तथापि विषयरूपी ईंधन के द्वारा उनकी इच्छारूपी अग्नि निरन्तर प्रज्वलित होती रहती है। इसलिए उन्हें सुख प्राप्त नहीं होता || १२९ || जो मनुष्य भव, सम्यग्दर्शनादिको धारण करनेवाले किन्हीं निकट भव्य जीवोंको मोक्षका कारण होता है वही मनुष्य भव, मोहपूर्ण चित्तको धारण करनेवाले दूरानुदूर भव्य जीवोंको दीर्घं संसारका कारण है ।।१३०-१३१|| समस्त कर्मभूमियों और भोगभूमियोंमें मनुष्योंकी उत्कृष्ट तथा जघन्य स्थिति तिर्यंचों के समान जानना चाहिए ॥१३२॥ जो केवल जल, वायु अथवा वृक्षोंके मूल, पत्र तथा फलोंका भक्षण करते हैं, जिनकी बुद्धि अत्यन्त शान्त है, जिन्होंने कषाय तथा इन्द्रियोंके निग्रहका अभ्यास कर लिया है, जो बालतप करते हैं तथा जो कायक्लेश करनेमें तत्पर रहते हैं, ऐसे तापसी और अकामनिर्जरासे युक्त बन्धनबद्ध तिर्यंच, भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी तथा अल्प ऋद्धिके धारक कल्पवासी देव होते हैं | ये सब मिथ्यादर्शन से मलिन होते हैं ।। १३३ - १३५ ॥ इनमें जो कन्दर्प नामके देव हैं वे निरन्तर कामसे आकुलित रहते हैं, आभियोग्य जातिके देव सभामें बैठनेके अयोग्य होते हैं और किल्विषक देव सदा संक्लेशका अनुभव करते रहते हैं || १३६ || ये बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंके धारक देवोंके महाभ्युदयसे युक्त ऐश्वर्यंको देखकर तथा देव होनेपर भी अपनी दुर्गतिका विचार कर दुःखसे पीड़ित होते हुए मानसिक दुःख उठाते रहते हैं || १३७ || सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति दुर्लभ होनेसे भव्य जीव भी अभव्यकी तरह संसारके दुःखरूपी महासागरमें गोता लगाते रहते हैं | | १३८।। भवनवासी देवोंकी उत्कृष्ट स्थिति कुछ अधिक एक सागर है, व्यन्तर देवोंकी एक पल्य प्रमाण है और जवन्य स्थिति दस हजार वर्षकी है ॥१३९|| ज्योतिषी देवोंकी उत्कृष्ट स्थिति कुछ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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