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________________ तृतीयः सर्गः ३७ मव्यसरवैयंदा कैश्चित् लभ्यन्ते पञ्च लब्धयः । क्षयोपशमसंशुद्धिक्रियाप्रायोग्य देशनाः ॥१४॥ अधःप्रवृत्तकरणमपूर्वकरणं तदा । तथाऽनिवृत्तिकरणं विधाय करणं त्रिधा ॥१४२॥ ततो दर्शनमोहस्य विधायोपशमं ततः । क्षयोपशमभावं च क्षयं चात्मविशुद्वितः ॥१४३॥ पूर्वमेवीपशमिकं क्षायोपशमिक क्रमात् । क्षायिकं तैः समुत्पाद्य सम्यक्त्वमनुभूयते ॥१४४॥ तथा चारित्रमोहस्य क्षयोपशमलब्धितः । चारित्रं प्रतिपद्यामी क्षयं कुर्वन्ति कर्मणाम् ॥१४५॥ ततोऽनन्तसुख मोक्षमनन्तज्ञानदर्शनम् । अनन्तवीर्यमध्यास्य तेऽधितिष्ठन्ति निवृताः ॥१४६॥ ये तु चारित्रमोहस्य नितान्तबलवत्तया। दर्शनादेव निष्कम्पा देवायुष्कस्य बन्धकाः ॥१४७॥ संयतासंयता ये च नराः कल्पेषु तेऽमराः । सौधर्माद्यच्युतान्तेषु संभवन्ति महर्द्धयः ॥१४८॥ सरागसंयमश्रेष्टाः संयता ये तु तेऽनघाः । कल्पे सुरा भवन्त्येके कल्पातीतास्तथा परे ॥१४॥ नवगैवेयकावासा नवानुदिशवासिनः । कल्पातीतास्तथा ज्ञेयाः पञ्चानुत्तरवासिनः ॥१५०॥ इन्द्रायाः कल्पजा देवा अहमिन्द्राश्च सत्पथे । सुखं सुविहितस्यामी भुञ्जते तपसः फलम् ॥१५१॥ सौधर्मशानयोरायुः साधिके सागरोपमे । सानत्कुमारमाहेन्द्रकल्पयोः सप्त सागराः ॥१५२॥ 'दशार्णवोपमायुष्का ब्रह्मब्रह्मोत्तरामराः । लान्तवेऽपि च कापिष्टे स्युश्चतुर्दश सागराः ॥१५३॥ अधिक एकपल्य है, जघन्य स्थिति पल्यके आठवे भाग प्रमाण है और स्वर्गवासी देवोंको उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागर तथा जघन्य स्थिति कुछ अधिक एक पल्य प्रमाण है ॥१४०।। जब कोई भव्य जीव, क्षयोपशम, विशुद्धि, प्रायोग्य, देशना तथा अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके भेदसे तीन प्रकारको करण लब्धि इन पंच लब्धियोंको प्राप्त करता है तब वह आत्म-विशुद्धिके अनुसार दर्शन-मोहनीय कर्मका उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षय कर सर्वप्रथम औपशमिक, फिर क्षायोपशमिक और तदनन्तर क्रमसे क्षायिक सम्यक्त्व उत्पन्न कर उसका अनुभव करता है ।।१४१-१४४|| सम्यक्त्व प्राप्त करनेके बाद कितने ही भव्य जीव चारित्र मोहके क्षयोपशमसे चारित्र प्राप्त कर कर्मोका क्षय करते हैं तदनन्तर निर्वाणको प्राप्त कर अनन्त सुख, अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन और अनन्त वीर्यसे युक्त होते हुए मोक्षमें निवास करते हैं ॥१४५-१४६।। जो भव्य जीव चारित्रमोहकी अत्यन्त प्रबलतासे चारित्र नहीं धारण कर पाते हैं वे निश्चल सम्यकत्वके प्रभावसे ही देवायुका बन्ध कर लेते हैं ।।१४७|| इसी प्रकार जो मनुष्य संयतासंयत अर्थात् देशचारित्रके धारक हैं वे सौधर्मसे लेकर अच्युत स्वगं तकके कल्पोंमें बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंके धारक देव होते हैं ।।१४८॥ जो मनुष्य सराग संयमसे श्रेष्ठ तथा निर्दोष संयमके धारक हैं, उनमें से कितने ही कल्पवासी देव होते हैं और कितने ही कल्पातीत देव ॥१४९।। नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश तथा पंच अनुत्तर विमानोंमें रहनेवाले देव कल्पातीत कहलाते हैं ।।१५०॥ कल्पवासी देव इन्द्रादिकके भेदसे अनेक प्रकारके हैं और कल्पातीत देव केवल अहमिन्द्र कहलाते हैं-उनमें भेद नहीं होता। इन सभीने सन्मार्गमें चलकर जो उत्तम तप किया था वे देवगतिमें उसके फलस्वरूप सुखका उपभोग करते हैं।।१५१।। सौधर्म-ऐशान स्वर्गमें देवोंकी आयु कुछ अधिक दो सागर, सानत्कुमारमाहेन्द्र स्वर्गमें कुछ अधिक सात सागर, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर स्वर्ग में कुछ अधिक दश सागर, लान्तव १. दशसागरप्रमितायुष्काः । * कुछ अधिक आयु घातायुष्क जीवोंकी अपेक्षा है। इसका सम्बन्ध बारहवें स्वर्ग तक ही रहता है, क्योंकि घातायुष्क जीवोंकी उत्पनि यहीं तक होती है। जो उपरितन स्वर्गोंकी आयु बांधकर पोछे संक्लेशरूप परिणाम हो जाने के कारण नीचेके स्वर्गोंमें उत्पन्न होते हैं वे घातायुष्क कहलाते हैं। इनकी आयु निश्चित आयुसे आधा सागर अधिक होती है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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