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________________ तृतीयः सर्गः ३५ मधुमांससुराहाग मानुषाः कर्मभूमिजाः । तिर्यञ्चो व्याघ्रसिंहाया बन्धका नारकायुषः ।।११३॥ जायन्ते चातिशीतोष्णदह्यमानशरोरिषु । चण्डा नरककुण्डेषु नारकाः षण्डकात्मकाः ॥१३॥ न तद् द्रव्यं न तत् क्षेत्रं न सा कालकलाऽपि च । स्वभावो यत्र दुःखस्य विश्रामो नरक जाम् ॥११॥ लामः साधारणस्तेषामकाले मरणं न यत् । वल्लभ जीवलोकस्य सुलभं चिरजीवितम् ॥११५॥ रत्नप्रभादिषु ज्ञेयं पृथिवीष्वथ सप्तसु । महातमःप्रमान्तासु प्रमाणमिदमायुषः ॥११॥ एकत्रयस्ततः सप्त. दश सप्तदश क्रमात् । द्वाविंशतिस्त्रयस्त्रिंशत् सागराः परमा स्थितिः ॥११७॥ पूर्वात्पूर्वादधोऽधः स्यात् जघन्या समयाधिका । दशवर्षसहस्राणि प्रथमायां क्षितौ स्थितिः ॥११॥ क्रोधमानमहामायालोमचिन्तावशीकृताः । आर्तध्यानमहावर्तसततभ्रान्तमानसाः ॥१९॥ तिर्यञ्चो मानुषा देवा नारका वा कुदृष्टयः । तिर्यग्गतिं प्रपद्यन्ते त्रसस्थावरसंकुलाम् ।।१२०॥ पृथिव्यप्कायभेदेषु ते तेजोऽनिलमूर्तिषु । वनस्पतिषु चाइनन्ति जन्मदुःखं पुनः पुनः ॥१२१॥ कृम्यादिद्वीन्द्रियेष्वेके यूकादित्रीन्द्रियेष्वपि । चतुरिन्द्रियभेदेषु भ्रमन्ति भ्रमरादिषु ॥१२२॥ पञ्चेन्द्रियप्रकारेषु पक्षिमत्स्यमृगादिषु । ते भजन्ते चिरं दुःखं तिर्यग्जन्मनि जन्तवः ॥१२३॥ अन्तर्मुहूर्त्तकालञ्चातिरश्चामधरा स्थितिः । पूर्वकोटीः परा भोगभूमौ पल्योपमत्रयम् ॥१२४॥ स्वमावादार्जवोपेताः स्वभावान्मृदवो मताः । स्वमावाद् मद्रशीलाश्च स्वभावात् पापभीरवः ॥१२५॥ दूसरेका धन हरण करनेके लोभी हैं, जिन्हें भोगोंको तृष्णा अत्यधिक है, जो मधु, मांस और मदिराका आहार करते हैं ऐसे कर्मभूमिके मनुष्य और व्याघ्र, सिंह आदि तियंच नरकायुका बन्ध करते हैं ॥११०-११२।। एवं जहाँ अत्यन्त शीत और उष्णतासे शरीर जल रहे हैं ऐसे नरककुण्डोंमें अत्यन्त क्रोधी नारकी उत्पन्न होते हैं। वहाँ इन नारकियोंके खण्ड-खण्ड हो जाते हैं ।।११३।। वहां न वह द्रव्य है, न क्षेत्र है और न वह कालकी कला भी है जहाँ नारको जीवोंके दुःखका स्वाभाविक विश्राम हो सके ॥११४।। उन नारकियोंके यदि एक साधारण लाभ है, तो यही कि उनका अकालमें मरण नहीं होता। संसारके समस्त प्राणियोंको चिरकाल तक जीवित रहना प्रिय है सो यह चिरजीवन नारकियोंको सुलभ है ॥११५॥ रत्नप्रभाको आदि लेकर महातमःप्रभा पर्यन्त-सातों पृथिवियोंमें नारकियोंकी आयुका प्रमाण क्रमसे एकसागर, तीनसागर, सातसागर, दशसागर, सत्रहसागर, बाईससागर और तैंतीससागर जानना चाहिए। यह इनकी उत्कृष्ट स्थिति है ॥११६-११७॥ पूर्व-पूर्व नरकोंकी जो उत्कृष्ट स्थिति है वही एक समय अधिक होनेपर आगामी नरकोंको जघन्य स्थिति कहलाती है। प्रथम नरककी जघन्य स्थिति दश हजार वर्षकी है॥११८।। __ जो क्रोध, मान, महामाया और लोभके कारण चिन्तातुर है तथा आर्तध्यानरूपी बड़ी भारी भंवरके कारण जिनका मन निरन्तर घमता रहता है, ऐसे मिथ्यादष्टि तिर्यंच, मनुष्य, देव और नारकी त्रसस्थावर जीवोंसे भरी हुई तिर्यंचगतिको प्राप्त होते हैं ॥११२-१२०॥ तिर्यंचगतिमें जन्म लेनेवाले प्राणो पृथिवीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय और वनस्पतिकायमें बार-बार जन्म लेनेका दुःख भोगते रहते हैं ॥१२१॥ कितने ही कृमि आदि दो इन्द्रियोंमें, यूक आदि तोन इन्द्रियोंमें, भ्रमर आदि चतुरिन्द्रियोंमें और पक्षी, मत्स्य, मृग आदि पंचेन्द्रियोंमें चिरकाल तक दुःख भोगते हैं ॥१२२-१२३॥ कर्मभूमिज तियंचोंकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट एक करोड़ वर्ष पूर्वकी है तथा भोगभूमिज तियंचोंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य एक पल्य प्रमाण है ।।१२४॥ जो मनुष्य स्वभावसे हो सरल हैं, स्वभावसे हो कोमल हैं, स्वभावसे ही भद्र हैं, स्वभावसे १. खण्डकात्मकाः म. । २. कालस्य तिरश्चा-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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