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________________ अष्टपञ्चाशः सर्गः "कर्मणोऽनुभवात्तस्मात्तपसश्चापि निर्जरा । विपाकजा तु तत्रैका परा चाप्यविपाकजा ॥२९३॥ संसारे भ्रमतो जन्तोः प्रारब्धफलकर्मणः । क्रमेणैव निवृत्तिर्या निर्जराऽसौ विपाकजा ॥२९४॥ यत्तूपायविपाचयं तदात्रादिफलपाकवत् । अनुदीर्णमुदीर्याशु निर्जरा त्वविपाकज ॥ २९५ ॥ सर्वेष्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशकाः । घनाङ्गुलस्यासंख्येय भागैक्षेत्रावगाहिनः ॥२९६॥ एकद्वित्र्यादिसंख्येयसमयस्थितयः सदा । प्रदेशबन्ध संतानेऽप्यासते कर्मपुद्गलाः ॥२९७॥ ● शुभायुर्नामगोत्राणि सद्वेद्यं च चतुर्विधः । पुण्यबन्धोऽन्यकर्माणि पापबन्धः प्रपञ्चितः ॥ २९८ ॥ "आस्रवस्य निरोधस्तु संवरः परिभाष्यते । स भावद्रव्यभेदाभ्यां द्वैविध्येन निरुच्यते ॥ २९९॥ "क्रियाणां भवहेतूनां निवृत्तिर्भाव संवरः । तत्कर्म पुद्गलादानविच्छेदो द्रव्यसंवरः ॥ ३०० ॥ स्वमुख ही उदय आती हैं परन्तु इन भेदोंकी जो अवान्तर उत्तर प्रकृतियाँ हैं उनका दोनोंसे उदय आता है। इसी प्रकार आयु कर्मकी उत्तर प्रकृतियों का सदा स्वमुखसे ही उदय आता है परमुखसे नहीं । जैसे नरकायका सदा नरकायु रूप ही उदय आता है अन्य रूप नहीं ||२९२ || ६९१ विपाकसे और तपसे कर्मोंकी निर्जरा होती है । इस निर्जरामें एक निर्जरा तो विपाकजा है। और दूसरी अविपाकजा है । भावार्थ - निर्जराके विपाकजा और अविपाकजाके भेदसे दो भेद हैं || २९३ || संसारमें भ्रमण करनेवाले जीवका कर्म जब फल देने लगता है तब क्रमसे ही उसकी निवृत्ति होती है, यही विपाकजा निर्जरा कहलाती है || २९४ || और जिस प्रकार आम आदि फलोंको उपाय द्वारा असमय में ही पका लिया जाता है उसी प्रकार उदयावलीमें अप्राप्त कर्म की तपश्चरण आदि उपायसे निश्चित समयसे पूर्व ही उदीरणा द्वारा जो शीघ्र ही निर्जरा की जाती है वह अविपाकजा निर्जरा है || २९५ ॥ आत्माके समस्त प्रदेशोंके साथ कर्मपरमाणुओंका जो बन्ध है वह प्रदेशबन्ध कहलाता है । इस प्रदेशबन्धको सन्तति में अनन्तानन्त प्रदेशोंसे युक्त घनांगुलके असंख्येय-भाग प्रमाणक्षेत्रमें अवगाढ एक, दो, तोन आदि संख्यात समयोंको स्थितिवाले कर्मरूप पुग्दल आत्माके समस्त प्रदेशों में सदा विद्यमान रहते हैं ।। २९६ - २९७॥ उपर्युक्त कर्मबन्ध, पुण्यबन्ध और पापबन्धके भेदसे दो प्रकारका है, उनमें शुभ आयु, शुभ नाम, शुभ गोत्र और सद्वेद्य ये चार पुण्यबन्धके भेद हैं और शेष कर्म पापबन्ध रूप हैं ||२९८|| आस्रवका रुक जाना संवर कहलाता है । यह भावसंवर और द्रव्यसंवरके भेदसे दो प्रकारका कहा जाता है ||२९९|| संसारकी कारणभूत क्रियाओंका रुक जाना भावसंवर है और कमरूप १. ततश्च निर्जरा । २. तपसा निर्जरा च । त. सू. । ३. तत्र चतुर्गतावनेकजातिविशेषावघूर्णिते संसारमहार्णवे चिरं परिभ्रमतः शुभाशुभस्य कर्मणः क्रमेण परिपाककालप्राप्तस्यानुभवोदयावलिस्रोतोऽनुप्रविष्टस्यारब्धफलस्य या निवृत्तिः सा विपाकजा निर्जरा । ४. यत्कर्माप्राप्तविपाककालमौपक्रमिकक्रियाविशेषसामर्थ्यादनु दीणं बलादुदीर्योदयावल प्रविश्य वेद्यते आम्रपनसादिपाकवत् सा अविपाकजा निर्जरा ॥ स. सि. अ. ८ सू. २३ ॥ ५. भागे क्षेत्रा - क. ङ. म. । ६. नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥ २४॥-त. सू. अ. ८ । 'ते खलु पुद्गलस्कन्धा अभव्यानन्तगुणा: सिद्धानन्तभागप्रमितप्रदेशा घनाङ्गुलस्यासंख्य भागक्षेत्रावगाहितः एकद्वित्रिचतुः संख्यासंख्येयसमयस्थितिकाः पञ्चवर्णपञ्चरस द्विगन्धवतुःस्पर्शस्वभावा अष्टविधकर्म प्रकृतियोग्या योगवशादात्मनात्मसात् क्रियन्ते ॥ स. सि. ।। ७. 'शुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम्' ॥२५॥ अतोऽन्यत्पापम् ॥ २६ ॥ त. सू. । ८ आस्रवनिरोधः संवरः ॥१॥ त. सू. अ. ९ । ९. तत्र संसारनिमित्त क्रियानिवृत्तिर्भावसंवरः । तन्निरोधे तत्पूर्वकर्म पुद्गलादानविच्छेदो द्रव्यसंवरः ॥ स. सि. ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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