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________________ ६९२ हरिवंशपुराणे 'त्रिसंख्या गुप्तयः पञ्चसंख्याः समितयस्तथा । दशद्वादशधर्मानुप्रेक्षाश्चारित्रपञ्चकम् ॥३०॥ द्वाविंशतिभिदा मिन्नपरीषहजयोऽपि च । हेतवः संवरस्यैते सप्रपञ्चाः समन्विताः ॥३०२॥ बन्धहेतोरभावाद्धि निर्जरातश्च कर्मणाम् । कास्न्येन विप्रमोक्षस्तु मोक्षो निर्ग्रन्थरूपिणः ॥३०३॥ जीवादिसप्ततत्त्वानामेतेषां ज्ञानसंगतम् । श्रद्धानं तच्चरित्रं च साक्षान्मोक्षस्य साधनम् ॥३०॥ भवेनैकेन मार्गस्थाः केचिरसप्ताष्टभिः परे । भुक्तस्वर्गसुखा भव्याः सिद्धयन्ति ध्यानिनः सदा ॥३०५॥ इति श्रुत्वा जिनेन्द्रोक्तं मोक्षमार्गमनाविलम् । प्रणेमुर्दादशगणाः प्रकृताञ्जलयो विभुम् ॥३०६॥ ते सम्यग्दर्शनं केचित्संयमासंयम परे । संयम केचिदायाताः संसारावासभीरवः ॥३०७॥ द्वे सहस्र नरेन्द्रास्ते कन्याश्च नृपयोषितः । सहस्राणि बहून्यापुः संयम जिनदेशितम् ॥३०८॥ 'शिवा च रोहिणी देवी देवकी रुक्मिणी तथा । देव्योऽन्याश्च सुचारित्रं गृहिणां प्रतिपेदिरे ॥३०९॥ यदुमोजकुलप्रष्टा राजानः सुकुमारिकाः। जिनमार्गविदो जाता द्वादशाणुव्रतस्थिताः ॥३१०॥ कृतपूजाः सुरैरिन्द्राः प्रणम्य जिनभास्करम् । प्रयाताः स्वास्पदं रामकेशवाद्याश्च यादवाः ॥३११॥ शार्दूलविक्रीडितम् विश्वाशा विशदाः शरद्विदधती धौतं पयोदैस्तथा विस्पष्टग्रहतारकाकुसमितं रम्यं नभोमण्डलम् । पुग्दल द्रव्यके ग्रहणका विच्छेद हो जाना द्रव्यसंवर है ॥३००।। तीन गुप्तियाँ, पाँच समितियां, दश धर्म, बारह अनुप्रेक्षाएँ, पांच चारित्र और बाईस परिषहजय ये अपने अवान्तर विस्तारसे सहित संवरके कारण हैं ॥३०१-३०२॥ निग्रन्थ मुद्राके धारक मुनिके बन्धके कारणोंका अभाव तथा निर्जराके द्वारा जो समस्त कर्मोंका अत्यन्त क्षय होता है वह मोक्ष कहलाता है ।।३०३।। इन जीवादि सात तत्त्वोंका सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ही मोक्षका साक्षात् साधन है ॥३०४|| मोक्षमार्गमें स्थित कितने ही अन्य जीव एक ही भवमें सिद्ध हो जाते हैं और कितने ही भव्य स्वर्गके सुख भोगकर सदा यात्माका ध्यान करते हुए सात-आठ भवमें मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ।।३०५॥ इस प्रकार नेमि जिनेन्द्रके द्वारा कहा हआ निर्मल मोक्षमार्ग सुनकर बारह सभाओंके लोगोंने हाथ जोड़कर भगवान्को नमस्कार किया ॥३०६|| श्रोताओं में से कितने ही लोगोंने सम्यग्दर्शन धारण किया, कितने ही लोगोंने संयमासंयम प्राप्त किया और संसारवाससे डरनेवाले कितने ही लोगोंने पूर्ण संयम-मुनिव्रत स्वीकृत किया ॥३०७।। उस समय दो हजार राजाओंने, दो हजार कन्याओंने एवं हजारों रानियोंने जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए पूर्ण संयमको प्राप्त किया ॥३०८॥ शिवा देवी, रोहिणी, देवकी, रुक्मिणी तथा अन्य देवियोंने श्रावकोंका चारित्र स्वीकृत किया ॥३०९।। यदुकुल और भोजकुलके श्रेष्ठ राजा तथा अनेक सुकुमारियां जिनमार्गको ज्ञाता बन बारह अणव्रतोंकी धारक हो गयीं ॥३१०|| जो देवोंके साथ पूजा कर चके थे, ऐसे इन्द्र तथा बलभद्र और कृष्ण आदि यादव, जिनेन्द्ररूपी सूर्यको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥३११॥ तदनन्तर जो समस्त दिशाओंको उज्ज्वल कर रही है, मेघोंके द्वारा धुले हुए सुन्दर १. स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरिषहजयचारित्रैः ॥२॥ त. सू. अ. ९ । २. बन्धहेत्वभावनिर्जराम्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ।। त. सू. अ. १०। ३. सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ।। त. सू. अ. १ । ४. प्रकृत्याञ्जलयो म. । ५. ३.९, ३१०, ३११ तमाः श्लोकाः ङ. ख. पुस्तकयोन सन्ति क पुस्तकेऽपि पश्चात् योजिताः सन्ति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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