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________________ अष्टपञ्चाशः सर्गः यद्धतुरसभेदः स्याद्रसनाम सदीरितम् । कटुतिक्तकषायाम्लमधुरध्वनिनाम तत् ॥२५८॥ यस्योदयाद्भवेद्गन्धो गन्धनाम तदुच्यते । द्विविधं तत्तु बोद्धव्यं सुरभ्यसुरमीति च ॥२५९॥ यद्धेतुवर्णभेदस्तद्वर्णनामाख्यपञ्चधा । कृष्णनीलस्वरक्तत्वपीतशुक्लस्वयोगतः ॥२६॥ उदयाद्यस्य पूर्वात्मशरीराकृत्यसंक्षयः । चतुर्गत्यानुपूज्यं तत्तथा गुरुलघूदितम् ॥२६१॥ यस्योदयादयोवत्त गुरुत्वान्न पतत्यधः । न गच्छति पुमानूर्व लधुवादकतूलवत् ॥२६२॥ स्वकतो बन्धनाथैः स्यादुपघातो यतस्तु तत् । उपघातं समुदिष्टं पटघातं पराद्वधः॥२३॥ यदीयोदयनिर्वृत्तं भवस्यातपनं महत् । आदित्यवद्वर्तमान मतमातपनाम तत् ॥२६॥ यद्धेतुद्योतनं देहे वेद्यमुद्योतनाम तत् । चन्द्रखद्योतकायेषु वर्तमानं यदीक्ष्यते ॥२६५॥ उच्छवासकारणं यत्तु मतमुच्छ्वासनाम तत् । बिहायोगतिराकाशे शस्ताशस्तगतिप्रभुः ॥२६६॥ तत्प्रत्येकशरीराख्यं नाम स्वत्र शरीरकम् । सदैकात्मोपमोगस्य हेतुनिर्वतते यतः ॥२६॥ साधारणमनेकेषामेकं यस्माच्छरीरकम् । साधारणशरीराख्यं नाम तद्भोगकारणम् ॥२६८॥ उदयाद्यस्य जीवानां द्वीन्द्रियादिषु जन्म यत् । प्रसनाम विपर्यत्वं स्थावराख्यं तु नाम रत् ॥२६॥ सर्वप्रीतिकरो यस्मात्प्राणी सुभगनाम तत् । यतोऽप्रीतिकरोऽन्येषां नाम्ना दुर्भगनाम तत् ॥२७॥ लघु, स्निग्ध, रूक्ष, शीत और उष्णके भेदसे आठ प्रकारका है ॥२५६-२५७।। जिसके निमित्तसे रसमें भेद होता है वह रस नाम कर्म कहा गया है। इसके कटुक, तिक्त, कषाय, आम्ल और मधुरके भेदसे पांच भेद हैं ।।२५८।। जिसके उदयसे गन्ध होता है वह गन्ध नाम कम है। इसके सुगन्ध र दुर्गन्धको अपेक्षा दो भेद जानना चाहिए ॥२५९|| जिसके निमित्तसे वर्णमें भेद होता है वह वर्ण नाम कर्म है। यह कृष्ण, नील, रक्त, पीत और शुक्लके भेदसे पाँच प्रकारका है ॥२६०।। जिसके उदयसे विग्रह गतिमें पूर्व शरीरको आकृतिका विनाश न हो वह नरकगत्यानुपूव्यं आदिके भेदसे चार प्रकारका आनुपूयं नाम कम है। जिसके उदयसे यह जीव भारीपनके कारण लोहेके समान नीचे नहीं गिरता है और लघुपनके कारण आकको रुईके समान ऊपर नहीं उड़ता है वह अगुरु लघु नाम कमं कहा गया है ।।२६१-२६२।। जिसके उदयंसे अपने ही बन्धन आदिसे अपना ही घात होता है वह उपघात नाम कर्म कहा गया है और जिसके उदयसे दूसरोंका घात होता है वह परघात नाम कम है ॥२६३।। जिसके उदयसे शरीरमें सूर्यके समान बहुत भारी आतापकी उत्पत्ति होती है वह आताप नाम कर्म माना गया है इसका उदय सूर्यके विमान में स्थित बादरपृथिवीकायिक जीवोंके ही होता है। इसकी विशेषता यह है कि यह मूलमें ठण्डा होता है और इसकी प्रभा उष्ण होती है ।।२६४।। जिसके उदयसे शरीरमें विशिष्ट प्रकारका प्रकाश होता है वह उद्योत नाम कर्म है। यह उद्योत चन्द्रमाके विमानमें स्थित बादरपृथिवोकायिक जीव तथा जुगनू आदिमें देखा जाता है ।।२६५।। जो उच्छ्वासका कारण है वह उच्छ्वास नाम कम माना गया है तथा जो आकाशमें प्रशस्त एवं अप्रशस्त गति कराने में समर्थ है वह विहायोगति नाम कर्म है ॥२६६।। जिसके उदयसे ऐसे शरीरकी रचना हो जो सदा एक ही आत्माके उपभोगका कारण हो वह प्रत्येकशरीर नाम कर्म है ॥२६७।। जिसके उदयसे एक ही शरीर अनेक जोवोंके उपभोगका कारण होता है वह साधारण नाम कर्म है ॥२६८॥ जिसके उदयसे जीवोंका द्वीन्द्रियादिक जीवोंमें जन्म होता है वह वसनाम कर्म है। जिसके उदयसे इसके विपरीत सिर्फ एकेन्द्रिय जीवोंमें जन्म हो वह स्थावर नाम कर्म है ।।२६९।। जिसके निमित्तसे यह जीव समस्त प्राणियोंके लिए प्रीति करनेवाला होता है वह सुभग नाम कर्म है। जिसके निमित्तसे दूसरोंको १. कट्वातिक्त म.। २. शरीराकृतिसंक्षयः म., क., ङ.। ३. परैर्वधः क.। ४. भवत्यापतनं म.। ५. मतं सातप-म., ङ.। ६. यदीक्षते म.। ७. सदवात्मोपभोगस्य म, ङ.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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