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________________ ६८६ हरिवंशपुराणे कर्मोदयवशोपात्तपुद्गलान्योन्यबन्धनम् । शरीरेषूदयाथस्य मबेबन्धननाम तत् ॥२५०।। यस्योदयाच्छरीराणां नीरन्ध्रान्योन्यसंहतिः । संघातनाम तन्नाम्ना संघातानामनस्ययात् ॥२५१।। शरीराकृति निर्वृत्तिर्यतो भवति देहिनाम् । संस्थाननाम तत् षोढा संस्थानकरणार्थतः ॥२५२।। समादिचतुरस्रोतो न्यग्रोधपरिमण्डलम् । स्वातिसंस्थाननामापि कुब्जवामनहुण्डकम् ॥२५३।। यतो भवति सुश्लिष्टमस्थिसंधानबन्धनम् । तस्संहनननामापि नाम्ना षोढा विभज्यते ॥२५४।। तद्वज्रर्षमनाराचवज्रनाराचकोलकाः । सनाराचार्धनागचाः सासंप्राप्तस्पाटिकाः ॥२५५।। स्पर्शनस्योदयाद्यस्य प्रादुर्भावेन भूयते । स्पर्शनाम मवत्येतत्प्रविमक्तमिवाष्टधा ।।२५६।। ख्यातं कर्कशनामैकं मृदुनाम तथापरम् । गुरुनाम लघुस्निग्धरूक्षशीतोष्णनाम च ॥२५७।। स्थाननिर्माण और प्रमाणनिर्माणके भेदसे दो प्रकारके निर्माण नाम कम हैं ॥२४९||* जिसके उदयरो, कर्मोदयके वशसे प्राप्त पुद्गलोंका परस्पर संश्लेष होता है वह बन्धन नाम कर्म है। इसके औदारिक शरीर बन्धन आदि पांच भेद हैं ॥२५०॥ जिसके उदयसे शरीरके प्रदेशोंका परस्पर छिद्ररहित संश्लेष होता है वह संघात नाम कम है । संघातोंका कभी अत्यय-विघटन नहीं होता इसलिए संघात नाम सार्थक है। इसके औदारिक शरीर संघात आदि पांच भेद हैं ॥२५१।। जिसके उदयसे जीवोंके शरीरकी आकृतिकी रचना होती है वह संस्थान नाम कर्म है। संस्थान अर्थात् आकृतिको करे सो संस्थान है यह संस्थान शब्दकी निरुक्ति है। वह संस्थान, समचतुरस्र संस्थान, न्यग्रोध परिमण्डल संस्थान, स्वाति संस्थान, कुब्जक संस्थान, वामन संस्थान और हुण्डक संस्थानके भेदसे छह प्रकारका होता है। जिसके उदयसे सुडौल-सुन्दर शरीरकी रचना हो वह समचतुरस्र संस्थान नाम कर्म है। जिसके उदयसे शरीरके अवयव न्यग्रोध-वट वृक्षके समान नाभिसे नीचे छोटे और नाभिसे ऊपर बडे हों वह न्यग्रोध परिमण्डल नाम कम है। जिसके उदयसे शरीरकी रचना स्वाति-सांपकी वामीके समान नाभिके नीचे विस्तृत और नाभिसे ऊपर संकुचित हो वह स्वाति नाम कर्म है। जिसके उदयसे शरीरमें कूबड़ निकल आवे वह कुब्जक संस्थान है। जिसके उदयसे शरीर वामन-बोना हो वह वामन नाम कर्म है और जिसके उदयसे शरीरकी आकृति बेडौल हो वह हुण्डक संस्थान नाम कर्म है ।।२५२-२५३।। जिसके उदयसे हड्डियोंका परस्पर मिलन और बन्धन अच्छी तरह होता है वह संहनन नाम कर्म है। इसके वज्रर्षभनाराच संहनन, वज्रनाराचसंहनन, नाराचसंहनन, अर्धनाराचसंहनन, कीलकसंहनन और असंप्राप्तसृपाटिका संहनन ये छह भेद हैं। जिसके उदयसे वज्रके वेष्टन, वज्रकी कीलियां और वज्रके हाड़ हों उसे वज्रर्षभनाराच संहनन कहते हैं। जिसके उदयसे कीलियां और हाड़ तो वज्रके हों परन्तु वेष्टन वज्रके न हों वह वजनाराचसंहनन है। जिसके उदयसे हाड़ तथा सन्धियोंकी कीलें तो हों परन्तु वज्रमय न हों इसी तरह वेष्टन भी वज्रमय न हो उसे नाराचसंहनन कहते हैं। जिसके उदयसे हड्डियाँ आधी कीलोंसे सहित हों उसे अर्धनाराचसंहनन कहते हैं । जिसके उदयसे हाड़ परस्पर कोलित हों उसे कीलक संहनन कहते हैं और जिसके उदयसे हाड़ोंकी सन्धियां कीलोंसे रहित हों तथा मात्र नसों और मांससे बँधी हों उसे असंप्राप्तसृपाटिका संहनन कहते हैं ॥२५४-२५५।। जिसके उदयसे शरीरमें स्पर्शको उत्पत्ति होती है वह स्पर्श नाम कर्म है। यह कड़ा, कोमल, गुरु, १. संघाता नाम सत्तया म. | संघाता नाम सत्वयात् घ., ङ., ग. । संघाता नाम सत्वया स.. २. तत्संहारनामापि म.। * निर्माण नाम कर्मके दो भेद अवश्य हैं परन्तु बयालीस भेदोंकी गणनामें उसका एक भेद ही परिगणित है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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