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________________ ६७६ हरिवंशपुराणे चतुराहारहानं यन्निरारम्भस्य पर्वसु । स प्रोषधोपवासोऽक्षाण्युपेत्यास्मिन्वसन्ति यत् ॥१५॥ गन्धमाल्यानपानादिरुपमोग उपेत्य यः । भोगोऽन्यः परिभोगो यः परित्यज्यासनादिकः ॥१५५॥ परिमाणं तयोर्यत्र यथाशक्ति यथायथम् । उपमोगपरीभोगपरिमाणवतं हि तत् ॥५५६॥ मांसमद्यमधुबूतवेश्यास्त्रीनक्तभुक्तितः । विरति नियमो ज्ञेयोऽनन्तकायादिवर्जनम् ॥१५७॥ स संयमस्य वृद्धि चर्यमततीत्यतिथिः स्मृतः । प्रदानं संविभागोऽस्मै यथाशुद्धियथोदितम् ॥१५॥ मिक्षौषधोपकरगप्रतिश्रयविभेदतः । संविभागोऽतिथिभ्यस्तु चतुर्विध उदाहृतः ॥१५९॥ सम्यक्कायकषायाणां बहिरन्तर्हि लेखना । सल्लेखनापि कर्तव्या कारणे मारणान्तिकी ॥१६॥ रागादानामनुत्तावागमोदितवर्मना । अशक्यपरिहारे हि सान्ते सल्लेखना मता ॥१६१॥ अष्टौ निश्शतादीनामष्टानां प्रतियोगिनः । सम्यग्दृष्टरतीचारास्त्याज्याः शङ्कादयः सताम् ॥१६२॥ पञ्च पञ्च त्वतीचारा व्रतशीलेषु भाषिताः । यथाक्रमममी वेद्याः परिहार्याश्च तद्वतैः ॥१६३॥ गतिरोधको बन्धो धो दण्डातिताडना । कर्णाद्यवयवच्छेदोऽप्यतिभ रातिरोपणम् ॥१६४॥ प्राप्ति है उसे सामायिक नामका पहला शिक्षाव्रत जानना चाहिए ॥१५३।। दो अष्टमी और दो चतुर्दशी इन चार पर्वके दिनोंमें निरारम्भ रहकर चार प्रकारके आहारका त्याग करना सो प्रोषधोपवास नामका दुसरा शिक्षाबत है। जिसमें इन्द्रियाँ बाह्य-संसारसे हटकर आत्माके समीप वास करती है वह उपवास कहलाता है ।।१५४॥ गन्ध, माला, अन्न, पान आदि उपभोग हैं और आसन आदिक परिभोग हैं। पास जाकर जो भोगा जाता है वह उपभोग कहलाता है और जो एक बार भोगकर छोड़ दिया जाता है तथा पुनः भोगने में आता है वह परिभोग कहलाता है। जिस में उपभोग तथा परिभोगका यथाशक्ति परिमाण किया जाता है वह उपभोग-परिभोग-परिमाण व्रत है ।।१५५-१५६।। मांस, मदिरा, मधु, जुआ, वेश्या तथा रात्रिभोजनसे विरत होना एवं काम आदि जीवोंका त्याग करना सो नियम कहलाता है ॥१५७।। जो संयमकी वृद्धिके लिए निरन्तर भ्रमण करता रहता है वह अतिथि कहलाता है उसे शुद्धिपूर्वक आगमोक्त विधिसे आहार आदि देना अतिथिसंविभाग व्रत है ।।१५८|| भिक्षा, औषध, उपकरण और आवासके भेदसे अतिथि संविभाग चार प्रकारका कहा गया है ।।१५९।। मृत्युके कारण उपस्थित होनेपर बहिरंगमें शरीर और अन्तरंगमें कषायोंका अच्छी तरह कृश करनी सल्लेखना कहलाती है। व्रती मनुष्यको मरणान्तकालमें यह सल्लेखना अवश्य ही करनी चाहिए ।।१६०।। जब अन्त अर्थात् मरणका किसी तरह परिहार न किया जा सके तब रागादिकी अनुत्पत्तिके लिए आगमोक्त मार्गसे सल्लेखना करना उचित माना गया है ॥१६१।। निशंकित आदि आठ अंगों के विरोधी शंका, कांक्षा आदि आठ दोष सम्यग्दर्शनके अतिचार हैं। सत्पुरुषोंको इनका त्याग अवश्य ही करना चाहिए ।।१६२।। पाँच अणुव्रत तथा सात शील व्रतोंमें प्रत्येकके पाँच-पांच अतिचार होते हैं। यहाँ यथाक्रमसे उनका वर्णन किया जाता है। तद्-तद् व्रतोंके धारक मनुष्योंको उन अतिचारोंका अवश्य ही परिहार करना चाहिए ।।१६३॥ जीवोंकी गतिमें रुकावट डालनेवाला बन्ध, दण्ड आदिसे अत्यधिक पीटनावध, कान आदि अवयवांका छेदना, अधिक भार लादना और भूख आदिकी बाधा करनेवाला १. इन्द्रियाणि। २. अल्पफर बहुविघातान्मलकाकनवनीत कादीनि संधानकादीनि, बहुजन्तुयोनिस्थानानि, अतोऽन्यदनिष्ठा न्निवर्तनम् (क. टि.)। ३. मारणान्तिकी सल्लेखनां जोषिता-त. सू. । ४. रागादीनां समुत्पत्ता-म. । ५. तत्त्वार्थ सूत्रे तु पञ्चैव अतिचारा: प्रतिपादिताः । तथाहि-'शंका-कांक्षा-विचिकित्सान्यदृष्टि प्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतिचारा:'-त. सू.। ६. कर्णाद्यपनयच्छेदो । ७. वधबन्धच्छेदिताभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥२५॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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