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________________ प्रधान सम्पादकीय प्रथम संस्करण साहित्यकी प्रेरणाके मूलाधार हैं प्रकृतिके दृश्य और घटनाएँ एवं जीवनके अनुभव । मनुष्यके विभिन्न अनुभवोंमें सबसे अधिक प्रभावशाली उन पुरुषोंके चरित्र सिद्ध. हुए हैं, जिन्होंने लोक-कल्याणका कुछ विशेष कार्य किया, चाहे वह संकटसे मुक्ति सम्बन्धी हो अथवा भौतिक या आध्यात्मिक उत्कर्षक रूपमें । यह बात इसीसे सिद्ध है कि संसारका नब्बे प्रतिशत साहित्य वीर-गाथात्मक है, जिसमें यथार्थ व कल्पित कुछ असाधारण लोकोत्तर मानव-चरित्रका चित्रण पाया जाता है। भारतीय साहित्यको ही देखिए जहाँ वेदोंसे लगाकर कलकी चीनी लड़ाईके किसी छोटे-से समाचार तककी रचनाओंमें किसी न किसी प्रकारके पौरुषकी ही प्रधानता पायी जायेगी। - राष्ट्रके कुछ महापुरुषोंके चरित्र क्षेत्र और कालकी सीमाको पार कर व्यापक रूपसे लोकरुचिके विषय बन गये हैं। राम और कृष्णके चरित्र इसी प्रकारके हैं। हिन्दू और जैन साहित्यमें इनकी प्रधानता है, और गत दो-ढाई हजार वर्षों में अगणित पुराण, काव्य, नाटक व कथानक इन नामोंके आधारसे लिखे गये है । जैसे वैदिक परम्परामें रामायण और महाभारत उक्त विविध साहित्यिक धाराओंके स्रोत सिद्ध हुए हैं वैसे ही जैन साहित्यमें पद्मपुराण या पद्मचरित और हरिवंशपुराण या अरिष्टनेमिचरितका स्थान है । यहाँ हमारा प्रयोजन विशेषतः हरिवंश सम्बन्धी कथानकोंसे है। अर्धमागधी आगममें अनेक स्थलोंपर कृष्ण व कौरव-पाण्डवोंके आख्यान आये हैं। विशेषतः छठे श्रुताङ्ग णायाधम्मकहाओ एवं आठवें अन्तगडदसाओंमें । आगमोत्तर 'वसुदेवहिंडी' आदि प्राकृत ग्रन्थ भी हरिवंश सम्बन्धी कथाओंके महान् आकर हैं । इनका बहुत-सा वर्णन महाभारतसे मिलता है, और कुछ स्वतन्त्र पाया जाता है। विशेष बात यह है कि इन चरित्रोंको भिन्नभिन्न धर्मों में भी अपनी-अपनी सैद्धान्तिक व नैतिक परम्पराके अनुरूप बनाकर अपनाया गया है। पूछा जा सकता है कि इन अन्य धर्मके देवरूप माने जानेवाले पुरुषोंको जैनधर्ममें क्यों और कैसे मान्यता प्राप्त हुई ? उत्तर वही है, जो ऊपर दिया जा चुका है। जैनधर्ममें वीर-पूजाकी मान्यता है। उसने अपने अन्तिम तीर्थंकरको तो वीर व महावीर नामसे सम्बोधित ही किया है। ऐसे चौबीस महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने तप और ज्ञानके बलसे धर्मका मार्ग प्रशस्त बनाया और स्वयं तीर्थकर रूपसे लोकाराधनके पात्र बने । बारह वीर पुरुष ऐसे भी हए है, जिन्होंने लोकविजय और दुष्टनिग्रह करके शासनकी व्यवस्थाएँ स्थापित की । वे चक्रवर्ती पद प्राप्त करके लोकसम्मानके भाजन हुए। इसी प्रकार नौ बलभद्रों, नौ नारायणों तथा इन नारायणोंके शत्रु नौ प्रतिनारायणोंने भी अपने-अपने समयमें कुछ असाधारण पराक्रम द्वारा विविध प्रकारके आदर्श उपस्थित किये। जैन पुराणोंमें विस्तारसे तथा चरित्रों व कथानकोंमें रचयिताकी प्रतिभा व रुचि अनुसार हीनाधिक कलात्मक रूपसे इन वेसठ शलाकापुरुषोंकी वीर-गाथा गायी गयी है। इन्हीं लोकोत्तर वीर पुरुषोंमें राम और कृष्ण भी गिने गये हैं । अतएव उनकी भी जैनपुराणोंमें सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठा पायी जाती है । विषय-वर्णनकी दृष्टिसे वैदिक परम्परामें पुराणके पांच अंग माने गये है-सृष्टिकी रचना, प्रलय और पुनः सृष्टि, मानव वंश, मनुओंके युग और राजवंशोंके चरित्र । अपने मौलिक सिद्धान्तोंके अनुसार उचित हेर-फेरके साथ जैनपुराणों में भी इन लक्षणोंका पालन किया गया है। जैन धर्म विश्वको जड़-चेतन रूपसे अनादि-अनन्त मानता है, किन्तु उसका विकास कालचक्रके आरोह-अवरोह क्रमसे ऊपर-नीचेकी ओर परिवर्तनशीलताको लिये हुए बदला करता है। अतः जैनपुराणों में सर्ग और प्रतिसर्गके स्थानपर विश्वका यही स्वरूप तथा कालचक्रके आरोंका उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी रूप विपरिवर्तन व लोक-व्यवस्थामें हेर-फेरका विवरण दिया गया है । वंशों, मनुओं (कुलकरों) और वंशानुचरितोंका इन पुराणोंमें भी अपनी परम्परानुसार वर्णन है। पुराणविषयक जैन ग्रन्थोंकी संख्या सैकड़ों है, और वे प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश तथा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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