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________________ सप्तपञ्चाशः सर्गः ६५९ प्रविश्य विधिवद्भक्त्या प्रणम्य मणिमौलयः । चक्रपीठं समारुह्य परियन्ति त्रिरीश्वरम् ।।१७५।। पूजयन्तो यथाकामं स्वशक्तिविभवार्चनैः । सुरासुरनरेन्द्राद्याः नामादेशं नमन्ति च ।।१७६।। ततोऽवतीर्य सोपानैः स्वैः स्वैः स्वाञ्जलिमौलयः । रोमाञ्चव्यक्तहर्षास्ते यथास्थानं समासते ।।१७७।। अभ्यक विकसद्भाति कमलाकरमण्डलम् । यथा तथा जिनाभ्यक तद्गणाम्बुजमण्डलम् ।।१७॥ सा सेना सर्वतः सर्वा प्रविशन्ती तदास्पदम् । नालं पूरयितुं पूर्णा नदीव वरुणास्पदम् ॥३७९।। नियंदायद्विशत्पश्यत्परीयत्प्रीणदानमत् । स्तुवदीशं सतां वृन्दं सततं तत्र वर्तते ॥१८॥ न मोहो न मय द्वेषौ नोत्कण्ठारतिमत्सराः । अस्यां मद्रप्रभावेण जम्माजम्भा न संसदि ॥१८१॥ निद्रातन्द्रापरिक्लेशक्षुत्पिपासासुखानि न । नास्त्यन्यच्चाशिवं सर्वमहरेव च सर्वदा ॥१८२।। मालिनीच्छन्दः समवसरणभूमौ बाह्यभूत्येकभूमौ स्थितवति मुनिनाथेऽत्रान्तरङ्गाङ्गिपूतौ । पिबति तृषितनेत्रदिशानां गणानां समितिरमृतरूपं जैनरूपाम्बुराशिम् ॥१८३।। इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती समवसरणवर्णनो नाम सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥५७॥ आप्तजनोंके साथ हाथ जोड़कर भीतर प्रवेश करते हैं ।।१७४|| मणिमय मुकुटोंको धारण करनेवाले वे सब, भीतर प्रवेश कर विधिपूर्वक प्रणाम करते हैं और चक्रपीठपर आरूढ़ होकर भगवान् जिनेन्द्रको तीन बार प्रदक्षिणा देते हैं ॥१७५।। इच्छानुसार अपनी शक्ति और विभवके अनुकूल सामग्रीसे पूजा करते हुए अपने नामका उल्लेख कर नमस्कार करते हैं ॥१७६।। तदनन्तर जिन्होंने अपनी अंजलियाँ मस्तकसे लगा रखी हैं और रोमांचोंसे जिनका हर्ष प्रकट हो रहा है ऐसे वे सब अपनी-अपनी सीढ़ियोंसे नीचे उतरकर सभाओंमें यथास्थान बैठते हैं ।।१७७|| जिस प्रकार सूर्यके सम्मुख खिला हुआ कमलोंका समूह सुशोभित होता है उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवानरूपी सूर्यके सम्मुख वह गणरूपी-द्वादश सभारूपी कमलोंका समूह सुशोभित हो रहा था ।।१७८।। जिस प्रकार नदी समुद्रको भरनेमें समर्थ नहीं है उसी प्रकार सब ओरसे समवसरणमें प्रवेश करती हुई वह सेना उसे भरने में समर्थ नहीं थी ॥१७९|| वहां बाहर निकलता, आता, प्रवेश करता, दर्शन करता, प्रदक्षिणा देता, सन्तुष्ट होता. भगवानको प्रणाम करता और उनकी स्तुति करता हआ सज्जनोंका समूह सदा विद्यमान रहता है ॥१८०॥ समवसरणके भीतर भगवान्के प्रभावसे न मोह रहता है, न राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, न उत्कण्ठा, रति एवं मात्सर्यभाव रहते हैं, न अंगड़ाई और जमुहाई आती है, न नींद आती है, न तन्द्रा सताती है, न क्लेश होता है, न भूख लगती है, न प्यासका दुःख होता है और न सदा समस्त दिन कभी अन्य समस्त प्रकारका अमंगल ही होता है ।।१८१-१८२।। बाह्य विभूतिके अद्वितीय स्थान समवसरण भूमिमें जब अन्तरंग आत्माकी पवित्रतासे युक्त भगवान् विराजमान होते हैं तब बारह सभाओंका समूह अपने तृषित नेत्रोंसे उनके अमृतरूप सौन्दर्य सागरका पान करता है ॥१८३।। इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें समवशरणका वर्णन करनेवाला सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त हा ॥५७।। १. तद्गुणाम्बुज-म. । २. नास्त्यम्य शिवं म., नास्त्यन्यथा क.। ३. आतंकरोगमरणप्पुत्तीओ वेरकामबाधाओ। तण्हाक्षुहपीडाओ जिणमाहप्पेण ण हवंति ॥१३३॥ *.प्र.। ४. गादिप्ती म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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