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________________ ६५८ हरिवंशपुराणे त्रिलोकाधीशितां छत्रत्रयेणेन्दुनयविषा। मामण्डलेन भाधिक्यं भवान्तरतमश्छिदा ॥१६३।। सर्व कुसुमेनान्यसर्वशोकापहारिताम् । अशोकेनामिपूज्यत्वं' सुमनोवृष्टिपूजया ।।१६४॥ सार्वस्वममयाधानघोषणेन जयश्रियाम् । नन्दिमङ्गलघोषेण साधुचित्ताभिनन्दिनम् ॥१६५॥ भास्माधीनाः प्रतीहाराः प्रातिहार्यगुणोद्भवैः । मूषितोऽष्टमहोदनप्रातिहायॆमहेश्वरः ।।१६६।। लोकानां भूतये भूतिमात्मीयां सकलां दधत् । सर्वलोकातिवर्तिन्या मासास्थामधिष्ठितः ॥१६७॥ अयमास्ते समप्रारमा स्वार्थकामाः ससंभ्रमाः । एतैत नमतेशानमित्याह्नानं सघोषणम् ॥१६८॥ वर्तयन्ति सरास्तस्मिन्मण्डले तदन दूतम् । समन्तात्तत्समायान्ति भूतिमिर्नुसुरासुराः ॥१६॥ तददष्टिगोचरे मडक्ष वाहनेभ्योऽवतीर्यते । मानाङ्गणमथास्थाय पूर्व साञ्जलिमौलिमिः ॥१७॥ तत्र बाह्ये परित्यज्य वाहनादिपरिच्छदम् । विशिष्टककुदैर्युक्ता मानपीठ परीत्य ते ॥१७१॥ प्रादक्षिण्येन वन्दित्वा मानस्तम्मनमादितः । उत्तमाः प्रविशत्यन्तरुत्तमाहितभक्तयः ॥१७२।। पापशीला विकर्माणाः शूद्राः पाखण्डपण्डकाः । विकलाङ्गेन्द्रियोभ्रान्ताः परियन्ति बहिस्ततः ।।१०३॥ छत्रचामरभृङ्गाराद्यवहाय जयाजिरे । आप्तरनुगताः कृत्वा विशन्त्यञ्जलिमीश्वराः ॥१७॥ समान कान्तिको धारण करनेवाले छत्रत्रयसे तीन लोकके स्वामित्वको, संसारके आन्तरिक अन्धकारको नष्ट करनेवाले भामण्डलसे कान्तिकी अधिकताको, सब ऋतुओंके फूलोंसे युक्त अशोक वृक्षके द्वारा अन्य समस्त जीवोंके शोक दूर करनेकी सामथ्यंको, पुष्पवृष्टिरूप पूजाके द्वारा पूज्यताको, अभयोत्पत्तिकी घोषणा करनेवाली दिव्यध्वनिसे जयलक्ष्मीको सर्वहितकारिताको और आनन्ददायी मंगलमय वादित्रोंके नादसे साधुजनोंके चित्तको आनन्दित करने की सामर्थ्यको प्रकट कर रहे थे ॥१६२-१६५॥ जो आत्माके आधीन हो उन्हें प्रतीहार कहते हैं। इस प्रकार आत्माधीन गुणोंसे उत्पन्न अष्ट महाप्रातिहार्योंसे भगवान् नेमिनाथ सुशोभित हो रहे थे॥१६६॥ आत्मोत्थ समस्त विभूतिको धारण करनेवाले भगवान् सर्वलोकातिवर्ती दीप्तिसे लोगोंका कल्याण करनेके लिए समवसरणमें विराजमान हुए ॥१६७॥ उस समय देव लोग घोषणाके साथ यह कहकर जीवों न कर रहे थे कि हे आत्महितके इच्छुक भव्यजनो! सम्पूर्ण विकसित आत्माको धारण करनेवाले केवली भगवान् यह विराजमान हैं, शीघ्रतासे यहां आओ-आओ और इन्हें नमस्कार करो ॥१६८।। इस प्रकार जब देवोंने आह्वान किया तब शीघ्र ही मनुष्य, देव और असुर वैभवके साथ सब ओरसे समवसरणमें आने लगे ॥१६९।। समवसरणके दृष्टिगोचर होते ही वे मानांगणमें खड़े हो सबसे पहले हाथ जोड़ मस्तकसे लगाकर वाहनोंसे नीचे उतरते हैं ।।१७०॥ तदनन्तर वाहन आदि परिग्रहको बाहर छोड़कर विशिष्ट राज्यचिह्नोंसे युक्त हो मानपीठकी प्रदक्षिणा देते हैं ॥१७१|| प्रदक्षिणाके बाद सबसे पहले मानस्तम्भको नमस्कार करते हैं तदनन्तर हृदयमें उत्तम भक्तिको धारण करते हुए उत्तम पुरुष भीतर प्रवेश करते हैं ॥१७२॥ और पापी, विरुद्ध कार्य करनेवाले, शूद्र, पाखण्डी, नपुंसक, विकलांग, विकलेन्द्रिय तथा भ्रान्त चित्तके धारक मनुष्य बाहर ही प्रदक्षिणा देते रहते हैं ।।१७३।। सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा नरेन्द्र आदि उत्तम पुरुष छत्र, चमर और शृंगार आदिको जयांगणमें छोड़ १. पुज्यन्ते म.। २. अधिष्ठितं म.। ३. सार्थकामाः म.। ४. विशिष्टकाकूदै-म. 'स्त्री ककुत ककुदोऽप्यस्त्रो वृषाङ्गे राज्यलक्ष्मणि' इति विश्वलोचनः । ५. मानस्तम्भमनादितः म.। ६. नपुंसकाः (ङ. टि.) पाण्डवाः म., ग.। ७ मिच्छाइट्टि अभव्वा तेसुमसण्णी ण होंति कहआई। तह य अणज्झवसाया संदिद्धा विविहविवरीदा ॥९३२॥ त्रैलोक्यप्रज्ञप्तौ चतुर्थ अधिकारः। मिथ्यादृष्टिरभन्योऽसंज्ञी जीवोऽत्र विद्यते नैव । यश्चानध्यवसायो यः सन्दिग्धो विपर्यस्तः ॥५८॥-समवसरणस्तोत्र। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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