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________________ सप्तपञ्चाशः सर्गः 'योतिर्मण्डलवासिन्यो मर्तृज्योतिष्टमप्रभाः । अभिनन्द्य तदुद्भूतविभाभासश्चकासति ।।१५२।। वनश्रयो यथा मूर्ता वानव्यन्तरयोषितः । वन्यपुष्पलतानम्रा नमन्ति वरदक्रमम् ॥ १५३ ॥ भवनालयवासिन्यो भगवत्यतिभक्तयः । स्वर्भूर्भुवो यथा लक्ष्म्यः समया तं समासते ।।१५४।। भावनाः पापबन्धस्य छेत्तारं निकषा सते । बिभ्यतः स्वभवाद्भास्वत्कणारत्न विमारुणाः ||१५५ || व्यन्तराः सुन्दराकारा मन्दरस्येव कल्पकाः । भवन्ति मर्तुराकल्पाः सुमनोमाळमारिणः || १५६ || परमेश्वरभास्वप्रमा भास्करादयः । ज्योतिर्गणाः प्रमावृद्धि प्रार्थयन्ते तमानताः ।। १५७॥ सौन्दर्येशाः सुखात्मानो मागा भर्तुरिवोद्यताः । स्वर्भुवः प्रतिभासन्ते सहस्राक्षपुरस्सराः ।। १५८।। दानपूजा दिवमांशा देहवन्तो यथामलाः । वरदं वरिवस्यन्ति नृपाश्चक्रधरादयः ।। १५९ ।। अविद्यावैरमायादिदोषापायाप्ततद्गुणाः । हरीभाया विमान्त्यन्ये तिर्यचस्तादृशो यथा ॥ १६०॥ एवं द्वादशवर्गीयैर्द्वादशाङ्गगुणोपमैः । परीत्योक्तक्रमादीशो गणैरेभिरुपासितः ||१६|| पारमेष्ट्यमनन्यस्थं ख्यापयनासनश्रिया । चामरैरमरोद्भूतैः क्रमस्यैः सुमहेशिताम् ।। १६२ ।। जान पड़ती थीं ॥ १५१ ॥ चौथी सभा में प्रशंसनीय एवं अपने-आपसे निकलनेवाली प्रभासे सुशोभित ज्योतिषी देवोंकी स्त्रियाँ बैठी थीं जो भगवान्‌को कान्तिके समान जान पड़ती थीं ॥ १५२॥ पाँचवीं सभा में मूर्तिधारिणी वनकी लक्ष्मीके समान सुन्दर वनवासी व्यन्तर देवोंकी स्त्रियां स्थित थीं तथा वे वन पुष्पलताओंके समान नम्रीभूत हो भगवान्‌के चरणोंको नमस्कार कर रही थीं ।। १५३ || छठी सभा में भगवान्की अत्यधिक भक्तिसे युक्त भवनवासी देवोंकी अंगनाएँ स्थित थीं जो ऐसी जान पड़ती थीं मानो स्वर्ग, भूमि और अधोलोककी लक्ष्मियाँ ही भगवान् के समीप आकर बैठी हैं ।। १५४ || सातवीं सभा में फणाके समान देदीप्यमान रत्नोंकी कान्तिसे लाल-लाल दिखनेवाले भवनवासी देव, अपने संसारसे भयभीत होते हुए, पापबन्धका छेदन करनेवाले भगवान् के समीप विद्यमान थे ।। १५५ ॥ आठवीं सभा में सुन्दर आकारके धारक व्यन्तर देव बैठे थे | भगवान् के आभूषणस्वरूप थे, तथा फूलों की मालाओंको धारण करनेवाले मन्दरगिरिके समान जान पड़ते थे || १५६ ॥ नवमी सभा में, जिनकी अपनी प्रभा भगवान्की प्रभामें निमग्न हो गयी थी ऐसे सूर्य आदि ज्योतिषी देवोंके समूह नम्रीभूत हो भगवान् से अपनी प्रभावृद्धिकी प्रार्थना कर रहे थे || १५७॥ दसवीं सभा में सौन्दयंके स्वामी, सुखी एवं ऊपर उठे हुए भगवान् के अंशोंके समान इन्द्र आदि कल्पवासी देव सुशोभित हो रहे थे || १५८ || ग्यारहवीं सभा में चक्रवर्ती आदि राजा भगवान् की उपासना करते थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो शरीरधारी दान-पूजा आदि धर्मोके निर्मल अंश ही हो ॥ १५९ ॥ तथा बारहवीं सभामें, जिन्हें अविद्या, वैर, माया आदि दोषोंके नष्ट हो जानेसे विद्या, क्षमा आदि तत्तद्गुण प्राप्त हुए थे ऐसे सिंह, हाथी आदि तिथंच विद्यमान थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उन्हींके समान दूसरे तियंच हों । भावार्थतिच अपनी स्वाभाविक कुटिलताको छोड़कर तदाकार होनेपर भी ऐसे लगते थे जैसे ये वे न हों दूसरे ही हों ॥ १६० ॥ इस प्रकार द्वादशांगके गुणोंके समान बारह सभाओं - सम्बन्धी बारह गण, प्रदक्षिणा रूपसे भगवान्की उपासना करते थे || १६१ ॥ ६५७ भगवान् नेमिनाथ, अपने सिंहासनकी शोभासे दूसरोंमें न पाये जानेवाले परमेष्ठीपनाको ख्यापित कर रहे थे । क्रमपूर्वक ढोरे जानेपर देवोपनीत चमरोंसे महेशिताको, तीन चन्द्रमाके १. ज्योतिर्मण्डल- क. । २. भगवत्पतिभक्तयः म., भगवत्यविभक्तयः ङ. । ३. समयान्तं म, तं भगवतः समय समीपे 'अभितः परितः समयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि' इति द्वितीया । ४. मन्दरेस्येव म. । ५. सौन्दर्येण म. । ६. स्वर्गोत्पन्नाः कल्पवासिदेवाः । ८३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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