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________________ हरिवंशपुराणे तत्रस्था अपि तद्देशाद्विनिष्क्रम्य नमस्यमी । यथोपदिष्टा दृश्यन्ते संमुखीभूय पश्यताम् ॥१३९॥ पीठानि त्रीणि भास्वन्ति चतुर्दिक्ष भवन्ति तु । चत्वारि च सहस्राणि धर्मचक्राणि पूर्वके ॥१४॥ द्वितीये तु महापीठे शिखिहंसध्वजेतरे । अष्टौ तिष्ठन्ति दिग्भागान्भासयन्तो महाध्वजाः ॥१४१॥ अग्रे श्रीमण्डपोद्भासी प्रासादो बहमङ्गलः । गन्धकुळ्यमिधानः स्यात्तत्र सिंहासनं विभोः ॥१४॥ तत्रासीनं जिनाधीशं नृसुरासुरकोटयः । तुष्टवुस्तुष्टचित्तास्ता मकुटन्यस्तपाणयः ॥१४३॥ विजयस्व महादेव ! विजयस्व महेश्वर । विजयस्व महाबाहो ! विजयस्व महेक्षण ॥१४४॥ इत्यादि स्तुतिकोटीनामन्ते प्रव्रज्य तत्क्षणात् । गणिनामग्रणीर्जातो वरदत्तो गणाधिपः ॥१४५॥ षट्सहस्रनृपस्त्रीमिः सह राजीमती तदा । प्रव्रज्याग्रेसरी जाता सर्यिकाणां गणस्य तु ॥१४६॥ यतिवर्गादयः सर्वे गणा द्वादश ते ततः । प्रणिपत्य यथास्थानं तं प्रमं समुपासते ॥१४॥ परिपर्यध्वनस्तस्मिन्पदेषु द्वादशस्वमी। पूर्वदक्षिणभागादिष्वासतेऽग्रप्रदक्षिणम् ।।१४८॥ तत्र प्रत्यक्षधर्माणो धर्मशांशा इवामलाः । 'भासन्ते वरदस्याग्रे वरदत्तादियोगिनः ।।१४९।। मर्तुर्या भूतयो बाह्यास्तदन्तर्भूतितः प्रति । राजन्ते कल्पवासिन्यो युक्ता स्तन्मूर्तयो यथा ।।१५०॥ हीदयाक्षान्तिशान्त्यादिगुणालंकृतसंपदः । समेत्योपविशन्त्यार्या सद्धर्मतनया यथा ॥१५१।। विराजमान जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमाएं हैं जो उत्तम मंगल द्रव्योंसे सुशोभित हैं ॥१३॥ यद्यपि ये प्रतिमाएं अपने-अपने स्थानपर स्थित हैं तथापि सामने खड़े होकर देखनेवालोंको ऐसी दिखाई देती हैं मानो उन स्थानोंसे निकलकर आकाशमें ही विद्यमान हों ॥१३९।। वहाँ चारों दिशाओं में देदीप्यमान तीन पीठ होते हैं उनमें पहले पीठपर चार हजार धर्मचक्र सुशोभित हैं ।।१४०|| दूसरी पीठपर मयूर और हंसोंकी ध्वजाओंसे भिन्न आठ प्रकारको महाध्वजारों दिशाओंको सुशोभित करती हुई विद्यमान हैं ।।१४१॥ तीसरी पीठपर श्रीमण्डपको सुशोभित करनेवाला अनेक मंगलद्रव्योंसे सहित गन्धकुटी नामका प्रासाद है उसमें भगवान्का सिंहासन रहता है ।।१४२।। उस सिंहासनपर विराजमान जिनेन्द्रदेवको सन्तुष्ट चित्तके धारक मनुष्य, सुर और असुरोंके झुण्डके झुण्ड मुकुटोंपर हाथ लगाकर स्तुति करते थे ।।१४३।। वे कह रहे थे कि हे महादेव ! आपकी जय हो। हे महेश्वर ! आप जयवन्त हों, हे महाबाहो ! आप विजयी हों, हे विशालनेत्र ! जयवन्त हों ॥१४४॥ इत्यादि करोड़ों स्तवनोंके बाद वरदत्तने तत्काल दीक्षा ले लो और गणोंके स्वामी प्रथम गणधर हो गये ॥१४५॥ उसी समय छह हजार रानियोंके साथ दीक्षा लेकर राजीमती आयिकाओंके समूहकी प्रधान बन गयो ॥१४६।। मुनिसमूहको आदि लेकर बारह गण भगवान् नेमिनाथको प्रणाम कर यथास्थान उनकी उपासना करते थे ॥१४७॥ मार्गके चारों ओर घेरकर बारह सभाएं उनकी पूर्व, दक्षिण आदि दिशाओंमें मुनिसमूहको आदि लेकर बारह गण विराजमान थे ॥१४८॥ वहाँ उत्कृष्ट वरको प्रदान करनेवाले भगवान् नेमिनाथके आगे वरदत्तको आदि लेकर अनेक मुनि सुशोभित थे जो धर्मके स्वरूपको प्रत्यक्ष करनेवाले एवं अत्यन्त निर्मल धर्मेश्वरके अंशके समान जान पड़ते थे ॥१४९॥ उनके आगे कल्पवासिनो देवियां सुशोभित थीं जो ऐसी जान पड़ती थीं मानो भगवान्की बाह्याभ्यन्तर विभूतियाँ ही उनका रूप रखकर स्थित हों ॥१५०॥ उनके बाद तीसरी सभामें लज्जा, दया, क्षमा, शान्ति आदि गुणरूपी सम्पत्तिसे सुशोभित आर्यिकाएं विराजमान थीं जो समीचीन धर्मकी पुत्रियोंके समान १. तत्रस्थापि । २. दिग्भागा म.। ३. मण्डपोहासी म., ङ । ४. श्रुति म.। ५. भासते म.। ६. व्यक्तं तन्मूर्तयो यथा म., ड. । ७. तद्धर्म ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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