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________________ हरिवंशपुराणे मोहस्य प्रकृतीः सप्त क्षपयित्वा विशुद्धधीः । सम्यग्दर्शन मर्काभं क्षायिकं प्रतिपद्यते ॥ ८७ ॥ आरोढा क्षपकश्रेणीमप्रमत्तः प्रकृत्य सः । अथाप्रवृत्तकरणमपूर्वकरणत्वकृत् ॥ ८८ ॥ अपूर्वकरणो भूत्वा स पापप्रकृतिस्थितिम् । तनूकृत्यानुभागं चानिवृत्तिकरणाप्तितः ॥ ८९ ॥ अनिवृत्ति गुणस्थाने क्षपकव्यपदेशभाक् । शुक्लध्यानान लाक्रान्तकर्मप्रकृतिकक्षकः ॥९०॥ सन्निद्रानिद्राप्रचलाप्रचला स्त्यानगृद्धिभिः । दुर्गती सानुपूर्वी के पूर्वां जातिचतुष्टयीम् ॥९१॥ सत्यावरा योद्योतसूक्ष्मसाधारणाभिधाः । सहैव क्षपयत्येताः षोडश प्रकृतीः कृती ॥९२॥ 'अत्रैवातः परं स्थानं कषायाष्टकमस्यति । ततो नपुंसकं वेदं स्त्रीवेदं च ततः परम् ॥ ९३॥ * वेदे नोकराणां षट्कं प्रक्षिप्य वै सह । निरस्याक्षिप्य पुंवेदं क्रोधसंज्वलनाने ||१४|| मानसंज्वलते तं च मायासंज्वलने त्वमुम् । लोभसंज्वलने खेनं निक्षिप्य दहति क्रमात् ॥ ९५ ॥ लोभसंज्वलनं सूक्ष्मं कृत्वा सूक्ष्मकषायगः । लोभसंज्वलनस्यान्तमन्ते कृत्वा विमोहकम् ॥ ९६ ॥ भूत्वा क्षीणकषायस्योपान्तिमें समयेऽस्यति । निद्रां च प्रचलामन्त्ये ज्ञानावृत्यन्तराययोः ॥ ९७ ॥ प्रत्येकं प्रकृतीः पञ्च चतस्रो दर्शनावृतेः । दग्ध्वैकत्ववितर्काग्नेः सयोगः केवली भवेत् ॥९८॥ सद्धेयं चाप्यसद्वेद्यं नामदेवगतिश्रुतिः । औदारिकशरीरादिनाम्ना पञ्चतयं तथा ॥ ९९ ॥ संघातपञ्चकं चापि पुनर्बन्धकपञ्चकम् । वैक्रियौदारिकाहारकायाङ्गोपाङ्गकत्रिकम् ॥१००॥ संस्थाननामषट्कं च षट्संहनननाम च । वर्णपञ्चकनामापि रसपञ्चकनाम च ॥ १०१ ॥ ६४२ भूमिका मनुष्य मोहनीय कर्मकी सात प्रकृतियों का क्षय कर विशुद्ध बुद्धिका धारक होता हुआ सूर्यके समान क्षायिक सम्यग्दर्शनको प्राप्त होता है ।।८६-८७।। तदनन्तर सातिशय अप्रमत्तगुणस्थानवर्ती मनुष्य क्षपक श्रेणीमें चढ़कर अथाप्रवृत्तकरण ( अधःप्रवृत्तकरण ) को करके उसके बाद अपूर्वकरणको करता है ||८८|| फिर अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती होकर पापप्रकृतियोंको स्थिति तथा अनुभागको क्षीण करता हुआ अनिवृत्तिकरणको प्राप्त होता है || ८५ ॥ तदनन्तर अनिवृत्तिकरण नामक नवम गुणस्थानमें क्षपक संज्ञाको प्राप्त होता हुआ कर्मप्रकृतिरूप वनको शुक्लध्यानरूपी असे आक्रान्त करता है ||१०|| फिर सत्तामें स्थित निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगति, नरक गत्यानुपूर्वी, तियंचगति, तियंचगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रियादि चार जातियाँ, स्थावर, आतप, उद्योत, सूक्ष्म और साधारण इन सोलह प्रकृतियोंका एक साथ क्षय करता है ।।९१-९२ ॥ इसी गुणस्थान में सोलह प्रकृतियोंके क्षयके बाद अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण नामक आठ कषायों को नष्ट करता है। फिर नपुंसकवेद और स्त्रीवेदको नष्ट कर हास्यादि छह नोकपायोंको पुंवेदमें डालकर एक साथ नष्ट करता है । फिर पुंवेदको संज्वलन क्रोधरूपी अग्नि में, संज्वलन क्रोधको संज्वलन मानमें, संज्वलन मानको संज्वलन माया में और संज्वलन मायाको संज्वलन लोभमें डालकर क्रमसे दग्ध करता है ॥९३-९५ ॥ फिर संज्वलन लोभको और भी सूक्ष्म कर सूक्ष्मसाम्पराय नामक दशम गुणस्थान में पहुँचता है। इसके अन्त में संज्वलन लोभका अन्त कर मोहकर्मका बिलकुल अभाव कर चुकता है ||१६|| फिर क्षीणकषायगुणस्थानवर्ती होकर एकत्ववितर्क नामक शुक्लध्यानरूपी अग्निसे इसके उपान्त्य समय में निद्रा और प्रचलाको तथा अन्त समय में ज्ञानावरण और अन्तरायको पाँच-पाँच और दर्शनावरणको चार प्रकृतियों को जलाकर सयोगकेवली होता है ॥ ९७-९८ ।। तदनन्तर सयोगकेवली गुणस्थानको उल्लंघ कर जब आगामी गुणस्थानको प्राप्त होता है तब अयोगकेवली होकर अहंन्त अवस्थाके उपान्त्य समय में सातावेदनीय और असातावेदनीयमेंसे कोई एक देवगति, औदारिक शरीरको आदि लेकर पांच शरीर, पांच संघात, पाँच बन्धन, १. अत्रैवान्तः परं म । २. पुंवेदक । ३. वितर्काग्निः म । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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