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________________ षट्पञ्चाशः सर्गः ६४१ शक्तस्य शातने शेषकर्मणां परिपाचने । दण्डं चापि कपाटं च प्रतरं लोकपूरणम् ॥७॥ चतुर्भिः समयैः कृत्वा स्वप्रदेशविसर्पणात् । तावद्भिरेव संहृत्य कृतकर्मसमस्थितिः ॥७५॥ पूर्वकायप्रमाणः सन् भूत्वा निष्ठापयमिदम् । प्रथमं शुक्लमध्यास्ते द्वितीयं परमं पुनः ॥७॥ स्वप्रदेशपरिस्पन्दयोगप्राणादिकर्मणाम् । समुच्छिन्नतयोक्तं तत्समुच्छिन्नक्रियाख्यया ॥७॥ सर्वबन्धास्त्रवाणां हि निरोधस्तत्र यत्नतः । अयोगस्य यथाख्यातचारित्रं मोक्षसाधनम् ॥७८॥ अयोगकेवळी ह्यारमा प्रध्वस्ताखिलकर्मकः । जात्यहेमवदुद्भूतचेतनाशक्तिमास्वरः ॥७॥ सिद्धयन्निहैव संसिद्धस्वोर्ध्वव्रज्यास्वभावतः । पूर्वप्रयोगासंगस्वबन्धच्छेदस्वहेतुतः ।।८०॥ अग्नेः शिखावदाविद्धचक्रालाम्बुवदुस्पतन् । एरण्डबीजबच्चोद्धर्व लोकं समयतो व्रजेत् ॥८॥ धर्मास्तिकायामावान्न लोकान्तमतिगच्छति । धाम्नि संतिष्ठतेऽतोऽग्रे सोऽनन्तसुखसंततिः ॥८॥ चतुर्वर्गे हि देहिभ्यो मोक्षोऽतिशयतो हितः । स चोक्तादेव सद्ध्यानात्स्वकर्मक्षयलक्षणः ॥८३॥ कर्मप्रकृस्यभावो हि मोक्षोऽनन्तसुखावहः । स यस्नायत्नसाध्यत्वाद्विधा मवति देहिनः ॥८॥ चरमोत्तमदेहस्य प्रागसत्वादयस्नतः । गस्यन्तरायुषामेषामभावो भवतीतरः ॥४५॥ उच्यते तु गुणस्थानात्सम्यग्दृष्टेरसंयतात् । समारभ्याप्रमत्तान्ते कचिदेवात्र मानुषः ॥८॥ समय उनका उपयोग विशेष अपने-आपमें होता है, वे विशिष्ट करण अर्थात् भावका अवलम्बन करते हैं, सामायिक भावसे युक्त होते हैं, महासंवरसे सहित होते हैं-नवीन काँका आस्रव प्रायः बन्द कर देते हैं और सत्तामें स्थित कर्मोंके नष्ट करने तथा उदयावलीमें लानेमें समर्थ रहते हैं। यह सब करनेके बाद जब वे पुनः पूर्व शरीर प्रमाण हो जाते हैं तब प्रथम परम शुक्लध्यानको पूर्ण कर द्वितीय परमशुक्लध्यानको प्राप्त होते हैं ।।७२-७६।। आत्मप्रदेशोंके.परिस्पन्दरूप योग तथा कायबल आदि प्राणोंके समुच्छिन्न-नष्ट हो जानेसे यह ध्यान समुच्छिन्नक्रिय नामसे कहा गया है ।।७७॥ इस ध्यानके समय यत्नपूर्वक समस्त कर्मोके बन्ध और आस्रवोंका निरोध हो चुकता है। ध्याता अयोग-योगरहित हो जाता है और उसके मोक्षका साक्षात् कारण परम यथाख्यातचारित्र प्रकट हो जाता है ॥७८॥ वह अयोगकेवली आत्मा, समस्त कर्मोको नष्ट कर सोलहवानीके स्वर्णके समान प्रकट हुई चेतनाशक्तिसे देदीप्यमान हो उठता है ।।७२।। इसी समय वह सिद्ध होता हुआ अनादि सिद्ध ऊध्वंगमन स्वभाव, पूर्व प्रयोग, असंगत्व और बन्धच्छेद रूप हेतुओंसे अग्निशिखा, आविद्धकुलालचक्र, व्यपगतलेपालाबु और एरण्डबीजके समान ऊपरको जाता हुआ एक समय मात्रमें ऊर्ध्वलोकके अन्तमें पहुंच जाता है ।।८०-८१॥ धर्मास्तिकायका अभाव होनेसे सिद्धात्मा लोकान्तको उल्लंघन कर आगे नहीं जाता। वह उसो स्थानपर अनन्त सुखका उपभोग करता हुआ विराजमान हो जाता है ।।८।। चारों वर्गों में प्राणियोंके लिए मोक्ष ही अतिशय हितकारी है, अपने समस्त कर्मोका क्षय हो जाना मोक्षका लक्षण है और ऐसा मोक्ष ऊपर कहे हुए समीचीन ध्यानसे हो प्राप्त होता है ।।८३।। कर्मप्रकृतियोंका अभाव हो जाना ही अनन्त सुखका देनेवाला मोक्ष है । वह कर्म प्रकृतियोंका अभाव यत्नसाध्य तथा अयत्नसाध्यको अपेक्षा दो प्रकारका है। चरमशरोरी जीवक भुज्यमान आयुको छोड़कर अन्य आयुओका जो अभाव है वह अयत्नसाध्य अभाव है क्योंकि इनकी सत्ता पहलेसे आती नहीं है और चरमशरीरीके नवीन बन्ध होता नहीं है। अब यत्नसाध्य प्रकृतियोंका अभाव किस तरह होता है यह कहते हैं ।।८४-८५॥ असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर अप्रमत्त संयत नामक सातवें गुणस्थान तक किसी गुणस्थानमें कम१. सोऽयोग म.। २. गतिभ्रमैः म.। ३. 'पूर्वप्रयोगादसंगत्वाद्बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च' । त. सू. । 'आविद्धकुलालचक्रवदव्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशिखावच्च' ॥त. सू. । ४. सद्ध्यातात् म.। ५. -रसंयतान म.। ६. समारभ्य प्रवर्तन्ते क.। ७. क्वचिदेकत्र म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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