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________________ हरिवंशपुराणे स्त्रीणामाथं पारतलयं 'विदुःखं दौलभ्येऽमूर्भर्तुरङ्ग विदुः खम् । सापत्न्यं वा पुष्पवस्वं च वान्ध्यं वैधव्ये वा सूतिरोगेऽपि वान्ध्यम् ॥१३५॥ दौर्भाग्ये वा भाग्यहीने स्वनाथे स्त्रीगर्भत्वे 'मत्रपत्ये स्वनाथे । गर्मनावे गर्ममारे वियोगे जीवना मर्मरोगाभियोगे ॥१३६॥ स्यान्मिथ्यात्वं स्त्रीत्वहेतुः स्वतन्त्रं वस्त्रस्येवातानतिर्यक् स्वतन्त्रम् । स्त्रीदुःखानामन्तकृद्भव्यसत्वैजैनी दृष्टिः सेव्यतां सेव्यसत्त्वैः ।। १३७॥ इत्यरिएनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतौ भगवन्निष्क्रमणकल्याणवर्णनो नाम पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥५५॥ को प्राप्त हुए ॥१३४॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि ये स्त्रियां नाना दुःख उठाती हैं। सबसे पहले तो इन्हें परतन्त्रताका विशिष्ट दुःख है, फिर पतिके दुर्लभ होनेपर शरीरको शून्य-व्यर्थ समझती हैं। फिर सपत्नीके होनेका, ऋतुमती होनेका, वन्ध्या होनेका, विधवा होनेका, प्रसूतिकालमें रोग हो जानेका, अन्धा होनेका, दौर्भाग्य होनेका, भाग्यहीन पतिके मिलनेका, लड़कीलड़की ही, गर्भमें आनेका, बार-बार मृत सन्तानके होनेका, बिलकुल अनाथ हो जानेका, गर्भ धारण करनेका, पतिके जीवित रहते हुए भी उसके साथ वियोग होनेका, अथवा किसी मर्मान्तक रोगके हो जानेका दुःख सहन करती है ॥१३५-१३६॥ जिस प्रकार आतान-वितानभूत तन्तु वस्त्रके स्वतन्त्र कारण हैं, उसी प्रकार मिथ्यादर्शन स्त्रीपर्यायका स्वतन्त्र कारण है, इसलिए सेवनीय शक्तिके धारक भव्य-जीवोंको स्त्री-सम्बन्धी दुःखोंका अन्त करनेवाले सम्यग्दर्शनकी सेवा करनी चाहिए ॥१३७॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें भगवान के दीक्षा-कल्याणका वर्णन करनेवाला पचपनवाँ सर्ग समाप्त हआ ।।५५।। १. विविधं दुःखं विदुःखम् । २. भतुरने क., अमू: स्त्रियः भर्तुः दौलम्ये सति अङ्गं स्वकीयं शरीरं खं शून्यं व्यर्थमिति यावत् विदुः जानन्ति । ३. वन्ध्यायाः भावो वान्ध्यम् । ४. वा अथवा अन्धाया भावः रि। ६. मर्तृ मरणशीलम् अपत्यं तस्मिन् । ७. सुष्ठु अनाथः तस्मिन् स्वनाथे सति । ८. जीवंश्चासौ भर्ता च जीवद्भर्ता तेन । ९. वस्त्रस्य यथा आतानभूताः तिर्यग्भूताश्च ये तन्तवः ते स्वतन्त्र कारणं भवन्ति तथा मिथ्यात्वं स्त्रीत्वस्य स्वतन्त्रं कारणमस्तीत्यर्थः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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