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________________ पञ्चपञ्चाशः सर्गः पुरि वितीर्य नु तत्र जिनाय ताः सुपरमान्नमथावृजिनाय ताः । प्रवरदत्त इतो महिमा हिताः सुरगणः सुमहामहिमाहिताः ॥१२९॥ पथि तपस्यति तत्र कृते हिते नृपसता मनसि पितेहिते। न्यभृत तापमपारवियोगिनी कुमुदिनीव दिवारवियोगिनी ॥१३०॥ प्रबलशोकवशा प्रविलापिनी शिथिलभूषणकेशकलापिनी । परिजनेन वृता प्ररुरोद सा करुणशब्दतता व्युरुरोद सा ॥१३॥ विधिमुपालमते वरहारिणं वरवधूवरमप्यतिहारिणम् । जघनपीनपयोधरहारिणी' नयनवारिकणाविलहारिणी ॥१३२॥ शमितशोकमरा वचनैर्हितैर्गुरुजनस्य तपोवचनैहि तैः । मतिमधत्त तपस्यनपायिनि प्रशमसौख्यतपस्यनपायिनि ॥१३३॥ शालिनी-छन्दः ''राजीमत्याश्चारुराजीवलक्ष्मी-राजीमस्याः पाणिपादस्य कान्तया । तापस्यान्तं ज्ञातयोऽवेत्य'वृत्तं तापस्यान्तं मानसस्यापुरन्ते ॥१३४॥ तदनन्तर जब पापरहित भगवान् आहार लेनेके लिए द्वारिकापुरीमें आये तब उत्तम तेजके धारक प्रवरदत्तने उन्हें उत्तम खीरका आहार देकर देवसमूहके द्वारा महिमासे युक्त, हितकारी अद्भत महिमा-प्रतिष्ठा प्राप्त को ॥१२९।। जब भगवान नेमिनाथ किये हए उस हितकारी मार्गमें तपस्या करने लगे तब अपार वियोगसे युक्त राजपूत्री राजीमती अपने से युक्त मनमें दिनके समय सूर्यके संयोगसे सहित कुमुदिनीके समान सन्तापको धारण करने लगी ।।१३०॥ राजीमती, प्रबल शोकके वशीभूत थी, निरन्तर विलाप करती रहती थी, उसके आभूषण और केशोंका समूह शिथिल हो गया था तथा वह करुण शब्दोंसे आकाश और पृथ्वीके विशाल अन्तरालको व्याप्त करनेवाले परिजनोंसे घिरकर अत्यधिक रोती रहती थी ॥१३१॥ नितम्ब और स्थूल स्तनों से सुन्दर तथा अश्रुकणोंसे व्याप्त हारको धारण करनेवाली वह राजीमती कभी तो वरको हरनेवाले अपने दुर्दैवको उलाहना देती थी और कभी अत्यन्त मनोहर वरको दोष देती थी ।।१३२॥ तदनन्तर तप धारण करनेकी प्रेरणा देनेवाले गुरुजनोंके उन हितकारी वचनोंसे जब उसके शोकका भार शान्त हो गया तब उसने अपाय-बाधासे रहित, शान्तिरूप सुखके दायक, एवं दुर्भाग्यको दूर करनेवाले तपमें बुद्धि लगायी-तप धारण करनेका विचार किया ॥१३३।। हाथों और पांवोंकी कान्तिसे सुन्दर कमल सम्बन्धी शोभाके समूहको धारण करनेवाली राजमतीने जो वृत्त-चारित्र धारण किया है वह उसके तापदुःखको अन्त करनेवाला हे ऐसा जानकर अन्तमें उसके कुटुम्बोजन मानसिक सन्तापके अन्त १. अवजिनाय पापरहिताय ता इति महिमाशब्दस्य विशेषणम् अत्र आकारान्तमहिमाशब्दः प्रयुक्तः । २. करुणशब्देन तते अतिशयेन व्याप्ते अतोव उरू रोदसी द्यावाभूमी येन स तेन, परिजनेन । ३. वरं हरतीति वरहारो तं विधिम् इत्यस्य विशेषणम् । ४. अतिमनोहरम् । ५. नितम्बस्थूलकुचमनोहरा । ६. नयनवारिकणैः आविलो मलिनो हारो विद्यते यस्याः सा । ७. तपसि विषये वचनं भणनं येषां तैः, तपःप्रेरणादायिभिः । ८. हि निश्चयेन तैः प्रसिद्धः । ९. स्थायिनि । १०. अपकृष्टः अयो भाग्यं अपायः, न विद्यतेऽपायो यस्मिन् तस्मिन् । ११. चारु राजीवस्य सुन्दरसरोरुहस्य लक्ष्मीराजी शोभापङ्क्तिः विद्यते यस्याः तस्याः । १२. ज्ञात्बा। ८. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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