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________________ पञ्चपञ्चाशः सर्गः 'वनपरिभ्रमसौख्यमितस्ततः समनुभूय चिरं वनितासखः । युवजनः कुसुमोत्करकल्पितेऽभजत तल्पतले सुरतामृतम् ॥४१॥ प्रतिवनं प्रतिगुल्मलतागृहं प्रतितरु प्रतिवापि विहारतः । विषयसौख्यमसेवत सौख्यवान खिलयादव पौरजनो मधौ ॥४२॥ द्विगुणिताष्टसहस्रवधूगणैर्बहुगुणीकृतभोगनभोगतः । Jain Education International सुमधुमाधवमासममानयत् सुभगताघरमाधव चन्द्रमाः ॥४३॥ पतिनिदेशजुषो हरियोषितो मुषितमानवमानसवृत्तयः । सह विजहुरैधीश्वरनेमिना तरुलतारमणीयवनेषु ताः ॥४४॥ "वनलता कुसुमस्तबकोच्चये मधुमदालसमानसलोचना । मुखसुगन्धितया मुखरालिभिर्वलयिताघृत काचन देवरम् ॥४५॥ उरसि चुम्बति तं कठिनस्तनो स्पृशति काचन जिघ्रति तं परा । मृदुकरण करे परिगृह्य तं शशिमुखं कुरुतेऽभिमुखं परा ॥ ४६ ॥ विटपकैरपि सालतमालजैर्व्य जनकैरिव काश्चिदवीजयन् । विदधुरस्य परास्त्ववतंसकश्रियमशोकतरोर्नवपल्लवैः ॥ ४७ ॥ विरचितां कुसुमैर्विविधैः स्रजं निजपरिष्वजनस्पृहया परा । शिरसि मालयति स्म गले परा कुरवकान्यपरा शिरसेऽकिरत् ॥ ४८ ॥ इति वसन्तमनन्तमसौ युवा हरिवधूभिरमा प्रतिमानयन् । स ऋतुना तदनन्तरभाविना विभुरसेव्यत सेवकवृत्तिना ॥४९॥ खींचने के सुखका अनुभव कर रहे थे ||४०|| तरुण पुरुष, स्त्रियोंके साथ चिरकाल तक जहाँ-तहाँ वन-भ्रमणके सुखका 'उपभोग कर फूलोंके समूह से निर्मित शय्याओं पर सम्भोगरूपी अमृतका सेवन करने लगे ||४१|| उस वसन्त ऋतु में सुखसे युक्त समस्त यादव, प्रत्येक वन, प्रत्येक झाड़ी, प्रत्येक लतागृह, प्रत्येक वृक्ष और प्रत्येक वापीमें विहार करते हुए विषय सुखका सेवन कर रहे थे ||४२ || सोलह हजार स्त्रियोंके द्वारा अनेकरूपताको प्राप्त भोगरूपी आकाशमें विद्यमान एवं सौन्दर्यको धारण करनेवाले श्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाने भी वसन्तऋतुके उस चैत्र वैशाख मासको बहुत अच्छा माना था ||४३|| मनुष्यको मनोवृत्तिको हरण करनेवाली श्रीकृष्णकी स्त्रियाँ, पतिकी आज्ञा पाकर वृक्षों और लताओंसे रमणीय वनोंमें भगवान् नेमिनाथके साथ क्रीड़ा करने लगीं ||४४ ॥ मधुके मदसे जिसका हृदय और नेत्र अलसा रहे थे ऐसी किसी स्त्रीको वन-लताओंके फूलोंके गुच्छे तोड़ते समय मुखकी सुगन्धिसे प्रेरित गुनगुनाते हुए भ्रमरोंने घेर लिया इसलिए उसने भयभीत हो देवरनेमिनाथको पकड़ लिया || ४५|| कोई कठिनस्तनी वक्षःस्थलपर उनका चुम्बन करने लगी, कोई उनका स्पर्श करने लगी, कोई उन्हें सूंघने लगी, कोई अपने कोमल हाथसे उनका हाथ पकड़ चन्द्रमाके समान मुखके धारक भगवान् नेमिनाथको अपने सम्मुख करने लगी ||४६|| कितनी ही स्त्रियाँ साल और तमाल वृक्षकी छोटी-छोटी टहनियोंसे पंखोंके समान उन्हें हवा करने लगीं । कितनी ही अशोक वृक्षके नये-नये पल्लवोंसे कर्णाभरण अथवा सेहरा बनाकर उन्हें पहनाने लगीं ||४७|| कोई अपने बालिंगनकी इच्छासे नाना प्रकारके फूलोंसे निर्मित माला उनके शिरपर पहनाने लगी, कोई गलेमें डालने लगी और कोई उनके शिरको लक्ष्य कर कुरवकके पुष्प फेंकने लगी ||४८|| इस प्रकार युवा नेमिनाथ कृष्णकी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करते हुए उस वसन्तको ऐसा समझ रहे थे जैसे उसका कभी अन्त ही आनेवाला न हो । तदनन्तर वसन्तके बाद आनेवाली १. नवपरिभ्रम - म । २. वनलताः म । ३. लोचना: म । ६२१ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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