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________________ ६२२ हरिवंशपुराणे प्रतिदिनं वसति स्म हरिस्तदा खरनिदाघमृतं प्रतिमानयन् । स्वधतिकारिणि रैवतके गिरौ शिशिरशीकरनिर्झरहारिणि ॥५०॥ हरिवधूनिवहरुपरोधतः' प्रकृतिरागपरागपराङ्मुखः । शिशिरवारिणि तत्र जलास्पदे जलविहारमसंवत तीर्थकृत् ॥५१॥ तरणदूरनिमजनकक्रियाः सलिलयन्त्रकराश्च परस्परम् ।। यदुनृपस्य मुदा वरयोषितः प्रतिविचिक्षिपुरम्बुमुखाम्बुजे ॥५२॥ विभुमपि प्रति ता व्यकिरन्नपः करतलाञ्जलिमिर्जलयन्त्रकैः । प्रलघु तेन तु ताः किरतापगाः जलधिनेव मुहुर्विमुखीकृताः ।।५३॥ अजनि मजनक जनरअनं न खलु केवलमेवमनीदृशम् । अपि तु चित्रसमालमनैर्धमत्परिमलैरपि तजलरञ्जनम् ॥५४॥ उदतरत् प्रभुणा तरुणीघटा गतनिदाघजधर्मघनश्रमा । मृदितपुष्करिणी करिणी चिरादिव महाकरिणा करिणीघटा ॥५५॥ च्युतवतंसविशेषकमाकुलं तरलदृष्टि विधूसरिताधरम् । शिथिलमेखलमिष्टकचग्रहं रत इवाप पुरन्ध्रिकुलं श्रियम् ॥५६॥ परिजनाहृतवस्त्रविभूषणैस्तदनुभूषिततोषितयोषितः । विभवपुर्वसनैः सममार्जयन सुपरिधाय परं परिधानकम् ॥५७॥ ग्रीष्म ऋतु सेवककी तरह भगवान्की सेवा करने लगी ।।४९।। उस समय तीक्ष्ण गरमोसे युक्त ग्रीष्म ऋतुको अच्छा मानते हुए श्रीकृष्ण उसी गिरनार पर्वतपर प्रतिदिन निवास करने लगे क्योंकि वह उन्हें बहत ही आनन्दका कारण था और ठण्डे जलकणोंसे युक्त निझरोंसे मनोहर था ॥५०॥ यद्यपि भगवान् नेमिनाथ स्वभावसे ही रागरूपी परागसे पराङ्मुख थे तथापि श्रीकृष्णके स्त्रियोंके उपरोधसे वे शीतल जलसे भरे हुए जलाशयमें जलक्रीड़ा करने लगे ॥५१॥ यदु नरेन्द्रकी उत्तम स्त्रियां कभी तैरने लगती थीं, कभी लम्बी-लम्बी डुबकियां लगाती थीं, कभी हाथमें पिचकारियां ले हर्षपूर्वक परस्पर एक-दूसरेके मुखकमलपर पानी उछालती थीं ।।५२।। वे अपनी हथेलीकी अंजलियों और पिचकारियोंसे जब भगवान्के ऊपर जल उछालने लगी तो उन्होंने भी जल्दी-जल्दी पानी उछालकर उन सबको उस तरह विमुख कर दिया जिस तरह कि समुद्र अपने जलकी तीव्र ठेलसे जब कभी नदियोंको विमुख कर देता है-उलटा लौटा देता है॥५३॥ उनका वह नका वह ऐसा अनुपम स्नान न केवल जनरंजन-मनुष्योंको राग-प्रीति उत्पन्न करनेवाला हुआ था किन्तु फैलती हुई सुगन्धिसे युक्त नाना प्रकारके विलेपनोंसे जल रंजन-जलको रंगनेवाला भी हुआ था ॥५४॥ जिस प्रकार कमलोंके समूहको मर्दन करनेवाली एक चंचल सैंडसे युक्त हस्तिनियोंका समूह जलाशयमें किसी महाहस्तीके साथ चिरकाल तक तैरता रहता है उसी प्रकार वह तरुण स्त्रियोंका समूह अपने हाथ चलाता और कमलोंके समूहको मर्दित करता हुआ चिर काल तक तैरता रहा। इस जल-क्रीड़ासे उनका ग्रीष्मकालीन घामसे पन्न समस्त भय दर हो गया था ॥५५॥ उस समय स्त्रियोंके कर्णाभरण गिर गये थे, तिलक मिट गये थे, आकुलता बढ़ गयी थी, दृष्टि चंचल हो गयी थी, ओठ धूसरित हो गये थे, मेखला ढीली हो गयी थी और केश खुल गये थे इसलिए वे सम्भोगकाल-जैसी शोभाको प्राप्त हो रही थीं ॥५६।। तदनन्तर परिजनोंके द्वारा लाये हुए वस्त्राभूषणोंसे विभूषित स्त्रियोंने, सन्तुष्ट होकर वस्त्रोंसे भगवान्का शरीर पोंछा और उन्हें दूसरे वस्त्र पहनाये ॥५७।। १. -रुपरोधितः म., ङ. । २. स्वमुखवारिसुसेकवधूजनाः म., ङ. । ३. सता म. । ४. गतिनिदाघज म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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