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________________ ६२० हरिवंशपुराणे उपचितो जनताभिरसौ गिरिः श्रियमुवाह सहोपवनैस्ततः । सुरगिरेः सुरसंगवधूजनैरुपचितस्य चितस्य वनान्तरैः ॥३३॥ 'समपनीतयथोचितवाहना वनविहारमतो जनताखिला । सपदि कर्तमसावुपचक्रमे गिरिनितम्बवनेषु यथायथम् ॥३४॥ सुरमिपुष्परजःसुरमौ श्रमव्यपगमध्यसने श्वसने दिशः । वहति शीतलदक्षिणमारुते स्मररतिश्रम एव नृणामभूत् ॥३५॥ रसितचूतलतारसकोकिलाः कलरवा: कलकण्ठतया गिरौ । जनमनास्यपहर्तुमतिक्षमाः परिचुकूजुरिह स्मरदीपिताः ॥३६॥ मधुलिहां मधुपानजुषां कुलैः कुरवका वकुलाः सुभगाः कृताः । द्विपदषट्पदभेदवता रवैः श्रयति वाश्रय आश्रयिणो गुणान् ॥३७॥ करिकटेष्वयुगच्छदगन्धिषु स्थितिमपास्य मदभ्रमराः श्रिताः । ससहकारसुरद्रुममञ्जरीरमिनवासु रतिर्महती भवेत् ॥३८॥ कुसुममारभृतः प्रणता भृशं प्रणयभङ्गमियेव नता द्रुमाः। युवतिहस्तधुताः कुसुमोच्चयेऽतनुसुखं 'तरुणा इव भेजिरे ॥३९॥ अनतिनम्रतया निजशाखया कथमपि प्रमदाकरलब्धया । तरुगणः कुसुमग्रहणेऽभज दृढकचग्रहसौख्यमिव प्रभुः ॥४०॥ आदि राजाओंकी स्त्रियां पालको आदिपर सवार हो मार्गमें प्रयाण कर रही थीं ॥३२।। उस समय जन-समूहसे व्याप्त और उपवनोंसे सुशोभित गिरनार पर्वत, देव-देवियोंसे व्याप्त एवं नाना वनोंसे युक्त सुमेरु पर्वतकी शोभाको धारण कर रहा था ॥३३॥ समीप पहुंचनेपर सब लोग यथायोग्य अपने-अपने वाहन छोड़, पर्वतके नितम्बपर स्थित वनोंमें शीघ्र ही इच्छानुसार विहार करने लगे ॥३४॥ उस समय वासन्ती फूलोंकी परागसे सुगन्धित, श्रमको दूर करनेवाली, ठण्डी दक्षिणकी वायु सब दिशाओं में बह रही थी इसलिए मनुष्योंके कामभोग-सम्बन्धी श्रम ही शेष रह गया था शेष सब श्रम दूर हो गया था ॥३५॥ आम्रलताओंके रसका आस्वादन करनेवाली, सुन्दर कण्ठसे मनुष्योंका मन हरण करनेमें अत्यन्त दक्ष और कामको उत्तेजित करने में निपुण मधुरभाषी कोकिलाएं उस समय पवंतपर चारों ओर कुहू कुहू कर रही थीं ||३६।। मधुपान करनेमें लीन भ्रमरोंके समूहसे कुरवक और मौलिश्रीके वृक्ष तथा द्विपद अर्थात् स्त्री-पुरुष अथवा कोकिल आदि पक्षी और षट्पद अर्थात् भ्रमरोंके शब्दसे वनके प्रदेश, अत्यन्त मनोहर हो गये थे सो ठीक ही है क्योंकि आश्रय, आश्रयो-अपने ऊपर स्थित पदार्थके गुण ग्रहण करता ही है ॥३७|| मदपायी भ्रमर, सप्तपर्ण पुष्पके समान गन्धवाले हाथियोंके गण्डस्थलोंपर स्थितिको छोड़कर आम्र और देवदारुकी मंजरियोंपर जा बैठी सो ठीक ही है क्योंकि नवीन वस्तुओंसे अल्पाधिक प्रीति होती ही है ॥३८॥ फूलोंके भारको धारण करनेवाले वृक्ष अत्यन्त नम्रीभूत हो रहे थे और उससे ऐसे जान पड़ते थे मानो स्नेह-भंगके भयसे ही नम्रीभूत हो रहे थे। वे ही वृक्ष पुष्पावचयनके समय जब युवतियोंके हाथोंसे कम्पित होते थे तब तरुण पुरुषोंके समान अतनु-बहुत भारी अथवा कामसम्बन्धी सुखको प्राप्त होते थे ॥३९|| फूल चुनते समय वृक्षोंकी ऊंची शाखाओंको स्त्रियां किसी तरह अपने हाथसे पकड़कर नीचेकी ओर खींच रही थी उससे वे नायकके समान स्त्री द्वारा केश १. समय म.। २. रसितः स्वादितः चूतलतारसो यैस्ते, ते च ते कोकिलाश्च इति- ३. -माश्रयिणो म. । ४. मदं भ्रमराश्रिताः म.। ५. युवतिहस्तयुता म.। ६. अतनुसुखं महासुखं कामसुखं वा । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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