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________________ पञ्चपञ्चाशः सर्गः इति वितर्कमतर्कितदर्शनं सुपरिबोध्य तया तमयोजयत् । रहसि कन्यकया कृतककणं विदितचित्रपदादिकलेखिका ॥२४॥ अविरहं सुरतामृतपायिनोरमृतपायिवधूवरयोरिव । वरवधूवरयोः समये तयोर्ब्रजति वृत्तमिदं विदितं हरेः ॥२५॥ हरिरतो बलशम्बमनोमवप्रभृतिभिर्यदुभिः सह संगतः । मदनजानयनं प्रति यातवान् खगपवाणपुरं स विहायसा ॥२६॥ नरतुरङ्गरथद्विपसंकुले युधि विजित्य स तत्र खगाधिपम् । तमनिरुद्धमुषासहितं हि तं निजनिवासपुरं हरिरामयत् ॥२७॥ विरहदुःखमपोद्य ततोऽखिलः शमनिरुद्धसमागमसंभवम् । अनुदिनं स्वजनो जनतासखः सुखमरंस्त समस्तसुखाश्रयः ॥२८॥ निजवधूजनलालितनेमिना हरिरमा नृपपौरपयोधिना । कुसमितोपवनं समधी ययौ विदितरैवतकं रमणेच्छया ॥२९॥ पृथुभिरश्वरथै र्ययुरीश्वरा रुचिरभूषणनेमिवकाच्युताः । तसितातपबारणहारिणो वृषमतालबृहद्गरुडध्वजाः ॥३०॥ दशदशाह कुमारगणावृतः करितुरङ्गरथैर्मदयन् जनम् । कुसुमबाणधनुर्मकरध्वजैः पथि रथेन ययौ मकरध्वजः ॥३१॥ पुरजनोऽथ यथार्हसुवाहनैर्विविधवस्त्रविभूषणभूषितः । हरिपुरस्सरराजवधूजनः पथि जगाम तथा शिविकादिमिः ॥३२॥ रहता है ।।२३।। अतकित वस्तुओंको देखकर कुमार इस प्रकार विचार कर हो रहा था कि इतने में चित्रलेखा सखी आयी और सब समाचार बता एकान्तमें कंकण बन्धन कराकर उस कन्याके साथ मिला गयी ॥२४॥ तदनन्तर देव-देवांगनाओंके समान निरन्तर सुरतरूपी अमृतका पान करनेवाले उन दोनों स्त्री-पुरुषोंका समय सुखसे व्यतीत होने लगा। इधर श्रीकृष्णको जब अनिरुद्धके हरे जानेका वृत्तान्त विदित हुआ तब वे बलदेव, शम्ब और प्रद्युम्न आदि यादवोंके साथ मिलकर अनिरुद्धको लानेके लिए आकाशमार्गसे विद्याधरोंके राजा बाणकी नगरी पहुंचे ॥२५-२६॥ और मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंसे व्याप्त युद्ध में विद्याधरोंके अधिपति बाणको जीतकर उषासहित अनिरुद्धको अपने नगर वापस ले आये ॥२७॥ तदनन्तर अनिरुद्धके समागमसे समुत्पन्न सुखको पाकर सब लोगोंका विरहजन्य दुःख दूर हो गया और समस्त सुखोंके आधारभूत स्वजन और पुरजन सुखसे क्रीड़ा करने लगे ।।२८।। अथानन्तर एक समय वसन्त ऋतुके आनेपर श्रीकृष्ण, अपनी स्त्रियोंसे लालित भगवान् नेमिनाथ, राजा महाराजा और नगरवासीरूपी सागरके साथ, जहाँ उपवन फूल रहे थे ऐसे गिरनार पर्वतपर क्रीड़ा करनेकी इच्छासे गये ॥२९॥ जो धारण किये हुए सफेद छत्रोंसे सुशोभित थे, तथा बैल, ताल और गरुड़को ध्वजाओंसे युक्त थे ऐसे सुन्दर भूषणोंसे विभूषित भगवान् नेमिनाथ, बलदेव ओर श्रीकृष्ण पृथक्-पृथक् बड़े-बड़े घोड़ोंके रथोंपर सवार हो एकके बाद एक जा रहे थे ॥३०॥ उनके पीछे समुद्रविजय आदि दश यादवोंके कुमारोंसे परिवृत प्रद्युम्न, मार्गमें फूलोंके बाण, धनुष तथा मकर चिह्नांकित ध्वजासे मनुष्योंको आनन्दित करता हुआ हाथी और घोडोंके रथोंपर सवार हो जा रहा था ॥३॥॥ उसके पीछे नाना प्रकारके वस्त्राभषणोंसे विभषित नगरवासी लोग यथायोग्य उत्तमोत्तम वाहनोंपर सवार होकर चल रहे थे और इनके बाद कृष्ण १. चित्रलेखा नाम सखी। २. -विदित-म.। ३. संगतः म. । ४. खगक म.। ५. रश्वयुत-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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