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________________ ६१८ हरिवंशपुराणे अथ पुनर्विजयानगोत्तरे पुरवरेऽभिधया श्रुतशोणिते । जगति बाण इति प्रथितः खगः स खलु तिष्ठति गर्वितमानसः ॥१६॥ स्वयमुषा दुहितास्य खगेशिनो गुणकलामरणाविदितावनौ । मदनसूनुमुदारगुणेः श्रुतं 'तमनिरुद्धमधत्त चिरं हृदि ॥१७॥ सुमृदुनापि तदा मृदुनि स्वयं विनिहितेन कृतं तनुतापनम् । मनसि संवसता कुटिलभ्रवः कुटिलवृत्तिरनेन निजीकृता ॥१८॥ अनुदितेन परस्य महाधिना कृशतरां परिपृच्छय हि तां हिताम् । निशि निनाय सखी खचरीवरं खचरलोकमनङ्गशरीरजम् ॥१९॥ प्रतिविबुध्य युवा सहस्सा ह्युषामुषसि रत्नमयूखचिते गृहे । मृदुतले शयने शयितः स्वयं स खलु पश्यति तत्र तु कन्यकाम् ॥२०॥ गुरुनितम्बधनस्तनमारिणी सुतनुमध्यबलित्रयहारिणीम् । सुपरिदश्य सतां सुविहारिणी चिरमचिन्तयदङ्गजधारिणीम् ॥२१॥ हरति केयमिह प्रवरा मनो हरिवधूरुत नागवधूरियम् । न हि मनुष्यवधूमहमीदृशीं क्वचिदपीह कदाचन दृष्टवान् ॥२२॥ पदमपीदमपूर्वमिवेक्ष्यते मयनहारिसुरेन्द्रपदोपमम् । किमिह सत्यमसत्यमिदं तु किं भ्रमति हि स्वपता भुवनं मनः ॥२३॥ गुणोंसे युक्त जिनेन्द्ररूपी उन्नत चन्द्रमाको बड़े आदरसे प्रतिदिन सेवा-शुश्रूषा करते हुए प्रेमप्रदर्शनपूर्वक उनकी पूजा करने लगे ॥१५।। अथानन्तर विजयाध पर्वतकी उत्तर श्रेणी में श्रुतशोणित नामका एक नगर है, उस समय उसमें बाण नामका एक महा अहंकारी विद्याधर रहता था ।।१६।। राजा बाणके गुण और कलारूपी आभूषणोंसे युक्त तथा पृथिवीमें सर्वत्र प्रसिद्ध उषा नामकी एक पुत्री थी जो अपने उदार गुणोंसे विख्यात प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धको चिरकालसे अपने हृदयमें धारण कर रही थी ।।१७।। यद्यपि कुमार अनिरुद्ध अत्यन्त कोमल शरीरका धारक था तथापि कुटिल भौंहोंवाली उषाके हृदय में वास करते हुए उसने कुटिलवृत्ति अंगीकृत की थी इसीलिए तो उसके शरीरमें उसने भारी सन्ताप उत्पन्न किया था ॥१८॥ यद्यपि कुमारी उषा अपने मनको महाव्यथा दूसरेसे कहती नहीं थी तथापि भीतर ही भीतर वह अत्यन्त दुबंल हो गयी थी। एक दिन उसकी सखीने अपना हित करनेवाली उस उषासे पूछकर सब कारण जान लिया और वह रात्रिके समय अनिरुद्धको विद्याधरियोंसे श्रेष्ठ विद्याधरलोकमें ले गयी ॥१९॥ प्रातःकालके समय जब सहसा युवा अनिरुद्धकी नींद खुली तब उसने अपने आपको रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त महलमें कोमल शय्यापर सोता हुआ पाया। जागते ही उसने एक कन्याको देखा ॥२०॥ वह कन्या स्थूल नितम्ब और निविड़ स्तनोंके भारसे युक्त थी, पतली कमर और त्रिबलिसे सुशोभित थी, सत्पुरुषोंके मनको हरण करनेवाली थी और काम अथवा रोमांचोंको धारण करनेवाली थी। उसे देख अनिरुद्ध विचार करने लगा कि यह यहां कौन उत्तम स्त्रो मेरा मन हरण कर रही है ? क्या यह इन्द्राणी है ? अथवा नाग-वधू है ? क्योंकि ऐसी मनुष्यकी खो तो मैंने कभी भी कहीं भी नहीं देखी है ॥२१-२२॥ इन्द्रके स्थानके समान नेत्रोंको हरण करनेवाला यह स्थान भी तो अपूर्व ही दिखाई देता है। यहाँ दिखाई देनेवाला यह सत्य है ? या असत्य है ? यथार्थमें सोनेवालोंका मन संसारमें भ्रमण करता १. वरणादि म.। २. तमनुरुद्ध म.। ३. प्रद्युम्नपुत्रम् । ४. इन्द्राणी। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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