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________________ पञ्चपञ्चाशः सर्गः द्रुतविलम्बितवृत्तम् अथ स नेमिकुमारयुवान्यदा धनदसंभृतवस्त्रविभूषणैः । स्रगनुलेपनकैरतिराजितो नृपसुतः प्रथितैः परिवारितः ॥१॥ समविशस्समदेभगतिर्नुपरमिगतः 'प्रणतश्चलितासनैः । 'कुसुमचित्रसमां बलकेशवप्रभृतियादवकोटिमिराचिताम् ॥२॥ हरिकृताभिगतिहरिविष्टरं स तदलङकुरुते हरिणा सह । श्रियमुवाह परां तदलं तदा तहरिद्वयहारि यथासमम् ।।३।। सदसि सभ्यकथामृतपायिमिः प्रकटशौर्यशरीरविभूतिमिः । सह हरिनुंवरैः समुपासित-क्षणमरंस्त रुचा स्थगिताखिलः ॥४।। बलवतां गणनास्वथ केचन प्रतिशशंसुरतीव किरीटिनम् । युधि युधिष्ठिरमुग्रवृकोदरं युगलमुद्धतमप्यपरे परान् ॥५॥ हलधरं बलवन्तमलं तथा हरिमथोतदुर्धरभूधरम् । स्वबलदर्शनतत्परराजकं चलयितुं स्वपदात्तु सशायिकम् ।।६।। हरिसभागतराजकमारतोरिति निशम्य सलीलदृशा हली। जिनमदीक्ष्य जगी जिननेमिना भगवता न समोऽस्ति जगस्त्रये ।।७।। अथानन्तर एक दिन कुबेरके द्वारा भेजे हुए वस्त्र, आभूषण, माला और विलेपनसे सुशाभित, प्रसिद्ध-प्रसिद्ध राजाओंसे घिरे एवं मदोन्मत्त हाथीके समान सुन्दर गतिसे युक्त युवा नेमिकुमार, बलदेव तथा नारायण आदि कोटि-कोटि यादवोंसे भरी हुई कुसुमचित्रा नामक सभामें गये। राजाओंने अपने-अपने आसन छोड़ सम्मुख जाकर उन्हें नमस्कार किया। श्रीकृष्णने भी आगे आकर उनकी अगवानी की। तदनन्तर श्रीकृष्णके साथ वे उनके आसनको अलंकृत करने लगे। श्रीकृष्ण और नेमिकुमारसे अधिष्ठित हुआ वह सिंहासन, दो इन्द्रों अथवा दो सिंहोंसे अधिष्ठितके समान अत्यधिक शोभाको धारण करने लगा ॥१-३॥ सभाके बीच, सभ्यजनोंकी कथारूप अमृतका पान करने वाले एवं अत्यधिक शूर-वीरता और शारीरिक विभूतिसे युक्त अनेक राजा जिनकी उपासना कर रहे थे और अपनी कान्तिसे जिन्होंने सबको आच्छादित कर दिया था ऐसे नेमिकुमार श्रीकृष्णके साथ क्षण-भर क्रोड़ा करते रहे ॥४॥ तदनन्तर बलवानोंकी गणना छिड़नेपर कोई अर्जुनकी, कोई युद्ध में स्थिर रहनेवाले यधिष्ठिरकी. कोई पराक्रमो भीमकी. कोई उद्धत सहदेव और नकलको एवं लोगोंकी, अत्यन्त प्रशंसा करने लगे ॥५॥ किसीने कहा बलदेव सबसे अधिक बलवान् हैं तो किसीने दुर्धर गोवर्धन पर्वतको उठानेवाले एवं अपना बल देखने में तत्पर राजाओंके समूहको अपने स्थानसे विचलित करनेके लिए बाण धारण करनेवाले श्रीकृष्णको सबसे अधिक बलवान् कहा ॥६॥ इस प्रकार कृष्णको सभामें आगत राजाओंकी तरह-तरहकी वाणी सुनकर लीलापूर्ण दृष्टिसे भगवान् नेमिनाथकी ओर देखकर कहा कि तीनों जगत्में इनके समान १. प्रणतं क., ख.। २. कुसुमचित्रानाम्नी सभाम् । ३. स्वपदं तु सशामकं क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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