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________________ एकोनपश्चाशः सर्गः ५७७ पुरि विरताजिकागणमहत्तरिकापदया प्रतधरपादमूलमितया सह मुवतया । सुगुरुरपृच्छयत प्रणतया निजपूर्वकृतं स्फुरदवधीक्षणः क्षणमसाविति तां न्यगदीत् ॥१४॥ तव दुहितः सुराष्ट्रविषये विषयेन्द्रियजैविंगतभवे सुखैरतिविमूर्छितमूढधिया। 'पहषतयाभिरूपपदमुद्रहतामभृता नभृतमनशं निभृतमात्ममनोनयनम् ॥१५॥ अतिविषमं तपो घटयतो मृतशायिकया शकटमृषेरुपर्युपरि हितं तदा त्वकया। विमृदितनासिकापुटतटस्य मुनेः स्खलनं मनसि न जातमीषदपि धीरतया तया ॥१६॥ अजनितजीवघातगुणतो नरके पतनं तव हि मनाग्न जातमृषिगात्रवधादिह तु । अजनि विनासिकस्य वदनस्य महाविकृतिः फलति फलं स्वकर्मजगतां हि यथाविहितम् ॥१७॥ सकृदपि जीवघातकृदधादसकृत्परतः परवशघातदुःखममियास्यति जन्तुरिह । अवयवघातकृत् सकृदपि स्वकृतेरसकृदवयवघातमेष्यति सदेति जिनस्य वचः ॥१८॥ वचनमनस्तनुभिरमियः परुषाः पुरुषाः पुरुषवधादिषु प्रभुतया प्रयतन्त इह । दुरितमहाप्रभुः परभवेषु जनेषु पुनः प्रभवति दुःखदानचतुरश्चतुरेष्वपि हि ॥१९॥ और जाते समय अपने अल्हड़ स्वभावसे उसे 'चिपटी नाकवाली' कहकर चिढ़ा दिया। उसने एकान्तमें दर्पणमें प्रतिबिम्बित चिपटी नाकसे युक्त अपना मुख देखा जिससे वह लज्जित होती हुई उस पर्यायसे विरक्त हो गयी ॥१३॥ उसने नगरमें विद्यमान आयिकाओंके समूहकी प्रधान सुव्रता नामक गणिनीके चरणोंको शरण प्राप्त की और उन्हें साथ लेकर वह व्रतधर नामक मुनिराजके चरणमूलमें गयो। उन्हें नमस्कार कर उसने उक्त मुनिराजसे पूछा कि 'हे भगवन् ! मैंने पूर्वभवमें क्या पाप किया था जिससे मुझे यह कुरूप प्राप्त हुआ है।' इसके उत्तरमें अवधिज्ञानरूपी नेत्रको विकसित करनेवाले मुनिराज उससे इस प्रकार कहने लगे-॥१४॥ हे पुत्री ! पूर्वभवमें तेरा जीव सुराष्ट्र देशमें उत्तम रूपको धारण करनेवाला पुरुष था। वहाँ विषय और इन्द्रियजन्य सूखोंसे अत्यन्त मढ़ बुद्धि होनेके कारण वह क्रूरतावश विषयोंमें स्वच्छन्द हुए अपने मन और नेत्रोंको स्वाधीन नहीं रख सका ॥१५॥ एक बार एक मुनि मृतशय्यासे अत्यन्त विषम तप तप रहे थे। तूने उनपर अपनी गाड़ी चला दी जिससे उनकी नाक पिचक गयी। मुनिराजने अपने मनमें बहुत भारी धीरता धारण कर रखी थी इसलिए इस घटनासे उनके मनमें कुछ भी क्षोभ उत्पन्न नहीं हुआ ॥१६॥ मुनिराजके जीवका घात नहीं हुआ था इसलिए तेरा नरक वास नहीं हुआ। किन्तु उनके शरीरका कुछ घात हुआ था इसलिए इस जन्ममें तेरा मुख नासिकासे रहित हो महाविकृत हुआ है। ठीक ही है संसारमें जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है ॥१७॥ जिनेन्द्र भगवान्का यह कहना है कि जो प्राणी इस संसारमें एक बार भी किसी जीवका घात करता है वह उसके पापसे पर-भवमें दूसरोंके द्वारा घात होनेके दुःखको प्राप्त होगा और जो किसीके अवयवका एक बार भी घात करता है वह अपने किये पापके अनुसार अनेक बार अवयवके घातको प्राप्त होगा ॥१८॥ जो क्रूर मनुष्य, प्रभुताके कारण निर्भय हो मन, वचन, कायसे मनुष्य आदि प्राणियोंके वधमें प्रयत्न करते हैं परभवोंमें वे कितने ही चतुर क्यों न हों दुःख देनेमें चतुर पापरूपी महाप्रभु उनपर बार-बार अपना प्रभाव जमाता है-उन्हें बार-बार दुःख देता है ॥१९॥ इसलिए स्वपर हितको चाहनेवाले प्राणियोंको भले ही वे राजा क्यों न हों सदा परहिंसा आदि पापोंसे दूर रहना चाहिए। १. सुरगुरु म. । २. विगतभये म., ङ. । ३. कठोरतया ( क. टि.) । पुरुषतया म., ख., ङ. । ४. निवभृतं म., ङ.। ५. रभि यः पुरुषाः परुषाः म.। ६. दुःखदानचरश्चतुरेष्वपि हि म. । ७३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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