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________________ ५७८ हरिवंशपुराणे अत इह जन्तुभिः परवधादिनिवृत्तिपरैः स्वपरहितैः सदापि भवितव्यमपि प्रभुभिः । न हि पद्धत मभृतामिह संसरतां 'स्वकृतभुजां सतां प्रतिभवति सदा प्रभुता ॥ २० ॥ इति वचनं गुरोरमिनिशम्य कृतावनतिः प्रगतवती तथा सह महत्तरिकार्यिकया । धाद्विमोच्य हिसकाखिलबन्धुजनं सितवसनावृतस्तनमरोद्धृतकालकचा ॥२१॥ व्यपहृतभूषणस्त्रगियमात्मकराङ्गुलि मिर्निक चित केशमारनिखिलोत्खननं तु तदा | प्रविदधती बभौ कुसुमकोमलबाहुलता स्फुटमिव धीकुटीकुटिल शल्यकुलोद्धरणम् ॥२२॥ जघनमुरः कुचावुदरमाचरणं च वपुः सुमृदुदुकूल कैकवसनेन कृतावरणम् । "सुविदधती सती चिरमराजत सा च तदा वृतसिकतास्थलाच्छपयसा शरदीव नदी ॥ २३ ॥ स्वजन कृताभिनिष्क्रमणपूजनिकां जनिकां पुरुतपसां निशाम्य नवसंयतिकां हितकाम् । अजनि महाजनस्य सकलस्य तदेतिमतिः सधृतिः सरस्वती किमु तपस्यति किं नु रतिः ॥ २४॥ व्रत गुणसंयमोपवसनादितपोभिरसौ प्रतिदिन भावनाभिरपि भावितभावयुता । वसति तपस्यया वसतिरागमगीतगिरां पुरुगुणसंयुता गणनिवासगता सततम् ॥ २५॥ बहुषु तु वर्ष वासर गणेषु गतेषु ततो जिनजननामिनिष्क्रमण निर्वृति भूमिपु सा । कृतविहृतिः कदाचन गता पृथुसार्थवशान्निज सहधर्मिणीमिरुरुविन्ध्यमहागहनम् ॥ २६ ॥ क्योंकि संसार में भ्रमण करनेवाले प्राणी अपने द्वारा किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं उनकी प्रभुता - राज्य अवस्था सदा स्थित नहीं रहती ||२०|| इस प्रकार गुरुके वचन सुन वह, सुव्रत गणिनीके साथ चली आयी और समस्त बन्धु जनों का त्यागकर उसने सफेद साड़ीसे स्तनोंको ढक तथा काले केशोंको उखाड़कर आर्थिक का व्रत धारण कर लिया || २१ || जिसने आभूषण और मालाएँ उतारकर फेंक दी थीं तथा जिसकी बाहुरूपी लताएँ फूलोंके समान कोमल थीं ऐसी वह कन्या उस समय अपने हाथकी कोमल अंगुलियों अपने बँधे हुए समस्त बालोंको उखाड़ती हुई ऐसी जान पड़ती थी मानो बुद्धिरूपी कुटीके भीतर विद्यमान शल्यों के समूहको ही उखाड़ रही हो ॥ २२॥ जघन, वक्षःस्थल, स्तन, उदर और चरणोंपर्यन्त समस्त शरीरको एक अत्यन्त कोमल वस्त्रसे आच्छादित करती हुई वह सती उस समय चिरकाल तक शरद् ऋतुकी उस नदी के समान सुशोभित हो रही थी जिसने स्वच्छ जलसे अपने बालुमय स्थलको ढक रखा था ||२३|| कुटुम्बी-जनोंने जिसकी दीक्षा-कालीन पूजा की थी और जो बड़े-बड़े तपोंको जन्म देनेवाली थी ऐसी उस नव दीक्षिता आर्यिकाको देखकर उस समय समस्त महाजनोंके हृदय में यही बुद्धि उत्पन्न होती थी कि क्या यह धैर्यंसहित सरस्वती है। अथवा रति तपस्या कर रही है ||२४|| व्रत, गुण, संयम तथा उपवास आदि तपों एवं प्रतिदिन भायी जानेवाली अनित्य आदि भावनाओंसे जो विशुद्ध भावोंको प्राप्त हुई थी, जो आगमोक्त अनेक पाठोंकी वसतिका थी, उत्तमोत्तम गुणोंसे सहित थी, और सदा आर्यिकाओंके समूहके साथ निवास करती थी ऐसी वह आर्यिका तपस्या करती हुई रहती थी ||२५|| तदनन्तर बहुत वर्षों और दिनोंके समूह व्यतीत हो जानेपर वह जिनेन्द्र भगवान् के जन्म, दीक्षा और निर्वाण कल्याणक की भूमियोंमें विहार कर किसी समय बहुत बड़े संघकी प्रेरणा से अपनी सहधर्मिणियोंके साथ विन्ध्याचलके विशाल वनमें जा निकली ||२६|| और रात्रिके Jain Education International १. सुकृत—क., ङ., म. । २. कुचा म. । ३. धीरेव कुटी तत्र कुटिलशल्यकुलस्योद्धरणं पुनः त्रोटनं कुर्वती इति क पुस्तके टिप्पणी । - मिवोद्धरणं म., बलोद्धरणं ङ. । ४. स्वविदधती म । ५ पुरुतपसं क., ख., ङ, म. । ६. संयता म ङ. । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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