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________________ हरिवंशपुराणे उरसि नितान्तनीलनिजचूचुकयोरसको कठिनसुवृत्तपीवरपयोधरयोमरतः । अमृतरसभंयक्षरणमीहरिनीलमणिस्थिरतरमुद्रिकोत्कनककुम्भवहेव बमौ ॥७॥ भुजलतयोः शिरीषमृदुपीनवरांसकयोः वरकमलप्रभापटलपाटलपल्लवयोः । कुरुवकताम्रकम्रनखपुष्पकयोवंपुषस्वनुकृतमुद्रकोशकरशाखकयोविवभौ ॥८॥॥ अकठिनकम्बुकण्ठचिबुकापरबिम्बफलप्रह सितपाण्डुगण्डकुटिल ललाटतटीद्विगुणितकोमलोत्पल सुनालसुकर्णभृता चिरमनयात्यमासि धवलासितदीर्घदृशा ॥९॥ प्रमितशिरस्यतिभ्रमरकान्तिकनरकुटिलप्रकटकटीतटीपतितकेशकलापमसौ । शशिवदना प्रकाशमवहद्विहसदशना प्रशिथिलकामपाश मिव लोकवशीकरणम् ॥१०॥ करपदमुद्रिकाकटकनूपुरपूर्वकसअथित चतुर्दशाभरणभूषणभूततनुः। प्रविलसदङ्गरागमृदुवस्त्रमहाबगियं स्थगयति कन्यकोचितसुखा वपुषा युवतीः ॥११॥ पितृसुतपूर्वकस्य यदुसर्वकुलस्य जनैरुचितसपर्यया विहितगौरवभूमिरसौ। सकलकलाकलगुणकलापमहावसतिः सकलसरस्वती स्वयमिव स्वजनोपविधी ॥१२॥ इति समये प्रयाति तु कदाचिदसौ प्रणतैरुपहसिता प्रयाभिरवशाबलराजसुतैः । बिचिपिटनासिकं रहसि दर्पणके स्वमुखं स्फुटमवलोक्य तद्भवविरागमगास्त्रपिता ॥१३॥ आनन्द देनेवाली अपनी नाभिकी गहराईसे और शरीरके मध्यमें स्थित त्रिवलियों-तीन रेखाओंकी विचित्रतासे संसारकी समस्त सुन्दर स्त्रियोंके बीच अत्यधिक सुशोभित होने लगी ॥६॥ वक्षःस्थलपर अत्यन्त नील चूचुकसे युक्त कठोर गोल और स्थूल स्तनोंका भार धारण करनेसे वह कन्या ऐसी सुशोभित होने लगी मानो 'अमृत रसका घर खिरकर कहीं नष्ट न हो जाये' इस भयसे इन्द्रनील मणिकी मजबूत मुहरसे युक्त देदीप्यमान सुवर्णके दो कलश ही धारण कर रही हो ॥७॥ शिरीषके फूलके समान कोमल मोटी और उत्तम कन्धोंसे युक्त, उत्तम कमलकी कान्तिके समूहके समान लाल-लाल हथेली रूप पल्लवोंसे सहित, कुरुबकके फूलके समान लाल एवं सून्दर नखरूपी पुष्पोंसे सुशोभित तथा मंगकी कोशोंका अनुकरण करनेवाली युक्त भुजारूपी लताओंसे वह अत्यधिक सुशोभित होने लगी ॥८॥ कोमल शंखके समान कण्ठ, ठुड्डी, अधरोष्ठरूपी विम्बीफल, प्रकृष्ट हास्यसे युक्त श्वेत कपोल, कुटिल भौंहें, ललाट तट एवं द्विगुणित कोमल नील कमलको उत्तम डण्ठलके समान कानोंको धारण करनेवाली और सफेद काले तथा विशाल नेत्रोंसे सहित वह कन्या चिर काल तक अत्यधिक सुशोभित होने लगी ॥९॥ हास्ययुक्त दांतोंसे सहित वह चन्द्रमुखी कन्या, सुन्दर शिरपर भ्रमरोंको कान्तिको तिरस्कृत करनेवाले देवीप्यमान घुघराले एवं विस्तृत कटि-तटपर पड़े प्रकाशमान उस केशसमूहको धारण कर रही थी, जो लटकते हुए काम-पाशके समान लोगोंको वश करनेवाला था ॥१०॥ हाथ और पैरों में स्थित अंगूठी, कड़े तथा नूपुर आदि समीचीन एवं प्रसिद्ध चौदह आभरणोंसे जिसका शरीर आभूषणस्वरूप हो रहा था, जो शोभायमान अंगराग, कोमल वस्त्र और महामालाओंको धारण कर रही थी तथा जिसे कन्याओंके उचित समस्त सुख उपलब्ध थे ऐसी वह कन्या अपने शरीरके द्वारा संसारकी अन्य युवतियोंको आच्छादित कर रही थी-तिरस्कृत कर रही थी ॥११॥ वह पिता, पुत्र आदि समस्त यदुवंशके मनुष्योंके द्वारा योग्य सत्कारके द्वारा किये हुए गौरवकी भूमि थी. समस्त कलाओं और मनोहर गुणोंके समूहकी महावसतिका थी और कुटुम्बी जनोंके समीप स्वयं शरीरधारिणो सरस्वतीके समान जान पड़ती थी॥१२॥ इस प्रकार समय व्यतीत होनेपर कदाचित् बलदेवके पुत्रोंने आकर उसे नमस्कार किया १. क्षयो निवासः ( क, टि.)। २. वपुषस्तनुकृत-म., वपुषास्वनकृत-इ.। ३. प्रसहित म. । ४. युवती म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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