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________________ हरिवंशपुराणे भ्रमच्चक्रसमारूढो बाणं संधृत्य दक्षिणः । लक्ष्यं चन्द्रकवेधाख्यं विव्याध नृपसंनिधौ ॥१३४॥ द्रौपदी च द्रुतं माल कन्धरेऽभ्येत्य बन्धुरे । अकरोत्करपद्माभ्यामर्जुनस्य वरेच्छया ॥ १३५ ॥ विप्रकीर्णा तदा माला सहसा सहवर्तिनाम् । पञ्चानामपि गात्रेषु चपलेन नभस्वता ॥ १३६॥ ततश्चपललोकस्य तत्त्वमूढस्य कस्यचित् । वाचो विचेरुरित्युच्चैर्वृताः पञ्चानयेत्यपि ॥१३७॥ सद्गन्धस्य सुवृक्षस्य तुङ्गस्य फलितस्य सा । पुष्पितेव लताभासीदर्जुनस्याङ्गमाश्रिता ॥ १३८॥ ततः कुन्त्याः समीपं सा धीरमञ्जीरबन्धना । अग्रतः पश्यतां राज्ञां नोतानीतिविदां विदा || १३९ ॥ संनह्यते नृपाः केचिदनुयाता युयुत्सवः । निषिद्धा अपि यत्नेन दुपदेन नयैषिणा ॥ १४० ॥ अर्जुनेन च भीमेन धृष्टद्युम्नेन च त्रिभिः । धन्विभिर्दूरतो रुद्धा नाभितः पदमप्यदुः ॥ १४१ ॥ धृष्टद्युम्नरथस्थेन स्वनामाङ्कः किरीटिना । द्वौणस्याङ्के शरः क्षिप्तः सर्वसंबन्धवाचकः ॥१४२॥ द्रोणश्वत्थामवीराभ्यां भीष्मेण विदुरेण च । वाचितः सर्वसंबन्धः प्रमदं प्रददौ परम् ॥१४३॥ द्रुपदस्य सगोत्रस्य द्रोणादीनां च सौख्यतः । शङ्खवादित्रनिर्घोषा जाताः पाण्डवसंगमे ॥१४४॥ जातबान्धवसंबन्धे परमानन्ददायिनि । संवृत्या नन्दिताः पञ्च तेऽमी दुर्योधनादिभिः ॥१४५॥ द्रौपदी दीपिकेवासी स्नेहसंभारपूरिता । पाणिग्रहणयोगेन दिदीपेऽर्जुनधारिता ॥ १४६ ॥ ५४८ उधर राजा लोग ऐसा विचार कर रहे थे इधर अत्यन्त चतुर अर्जुन डोरीपर बाण रख झटसे चलते हुए चक्रपर चढ़ गया और राजाओंके देखते-देखते उसने शीघ्र ही चन्द्रकवेध नामका लक्ष्य बेध दिया || १३४|| उसी समय द्रौपदीने शीघ्र ही आकर वरको इच्छासे अर्जुनकी झुकी हुई सुन्दर ग्रीवामें अपने दोनों कर-कमलोंसे माला डाल दी || १३५ || उस समय जोरदार वायु चल रही थी इसलिए वह माला टूटकर साथ खड़े हुए पाँचों पाण्डवोंके शरीरपर जा पड़ी ||१३६|| इसलिए विवेकहीन किसी चपल मनुष्यने जोर-जोरसे यह वचन कहना शुरू कर दिया कि इसने पाँच कुमारोंको वरा है || १३७|| जिस प्रकार किसी सुगन्धित, ऊँचे एवं फलोंसे युक्त वृक्षपर लिपटी फूली लता सुशोभित होती है उसी प्रकार अर्जुनके समीप खड़ी द्रौपदी सुशोभित हो रही थी || १३८|| तदनन्तर कुशल अर्जुन नूपुरोंके निश्चल बन्धन से युक्त उस द्रौपदीको अनीतिज्ञ राजाओं के आगेसे उनके देखते-देखते माता कुन्तीके पास ले चला ॥ १३९ || युद्ध करनेके लिए उत्सुक राजाओं को यद्यपि नीतिचतुर राजा द्रुपदने रोका था तथापि कितने ही राजा जबर्दस्ती अर्जुनके पीछे लग गये ॥१४०॥ परन्तु अर्जुन, भीम और धृष्टद्युम्न इन तीनों धनुर्धारियोंने उन्हें दूरसे ही रोक दिया । ऐसा रोका कि न आगे न पीछे कहीं एक डग भी रखनेके लिए समर्थं नहीं हो सके || १४१ || तदनन्तर धृष्टद्युम्न के रथपर आरूढ़ अर्जुनने अपने नाम से चिह्नित एवं समस्त सम्बन्धों को सूचित करनेवाला बाण द्रोणाचार्यकी गोद में फेंका || १४२ ॥ द्रोण, अश्वत्थामा, भीष्म और विदुरने जब उस समस्त सम्बन्धों को सूचित करनेवाले बाणको बाँचा तो उसने सबको परम हर्षं प्रदान किया || १४३ ॥ पाण्डवोंका समागम होनेपर राजा द्रुपद, कुटुम्बी जन, तथा द्रोणाचार्य आदिको जो महान् सुख उत्पन्न हुआ था । उससे शंख और बाजोंके शब्द होने लगे || १४४ || परम आनन्दको देनेवाले भाइयोंके इस समागमपर दुर्योधन आदिने भी ऊपरी स्नेह दिखाया और पांचों पाण्डवोंका अभिनन्दन किया || १४५ || जिस प्रकार स्नेहतेल समूहसे भारी दीपिका किसीके पाणिग्रहण - हाथमें धारण करनेसे अत्यधिक देदीप्यमान होने लगती है उसी प्रकार स्नेह-प्रेमके भारसे भरी द्रौपदी, पाणिग्रहण - विवाहके योगसे १. विव्याथ म. । २. वाचोदितोरु म, घ. । ३. धीरगा जीवबन्धना म. 1 म. । सौख्यतः घ., ख. । ६. निर्घोषाज्जाताः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only ४. प्रपदो म । ५. सौख्यतां www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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