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________________ पञ्चचत्वारिंशः सर्गः रूपलावण्य सौभाग्यकलालंकृतविग्रहा । द्रौपदी तनया तस्य द्रुपदस्योपमोज्झिता ॥ १२२ ॥ तस्याः कृते कृताः सर्वे 'मनोजेन नृपात्मजाः । सग्रहा इव याचन्ते नानोपायनपाणयः ॥ १२३ ॥ दाक्षिण्यभङ्गभीतेन द्रुपदेन ततो नृपाः । विश्वे चन्द्रकवेधार्थमाहूताः कन्यकार्थिनः ॥ १२४ ॥ द्रौपदीप्रहवश्यानां काश्यप्यामिह भूभृताम् । कर्णदुर्योधनादीनां माकन्द्यां निवहोऽभवत् ॥ १२५॥ सुरेन्द्रवर्धनः खेन्द्रः स्वसुतावरमार्गणैः । धनुर्गाण्डीवमादेशाद्दिव्यं तत्र तदाऽकरोत् ॥ १२६॥ चण्डगाण्डीव कोदण्डमण्डलीकरणक्षमः । राधावेधसमर्थो यो द्रौपद्याः स भवेत्पतिः ॥ १२७ ॥ इतीमा घोषणां श्रुत्वा द्रोणकर्णादयो नृपाः । समेत्य मण्डलीभूय कोदण्डमभितः स्थिताः ॥ १२८॥ देवताधिष्ठितायास्तैश्वापयष्टेः प्रदर्शनम् । आसीत्सत्या इवाशक्यं स्पर्शनाकर्षणे कुतः ॥ १२२ ॥ भाविना स्वामिना पश्चादर्जुनेन सदर्जुना । दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तदाकृष्टा स सतीव वशं स्थिता ॥१३०॥ आरोग्याकृष्य पार्थेन धनुर्ज्या स्फालिताक्षिभिः । भ्रान्तं वधिरितं कर्णैः कर्णादीनां पदध्वनौ ॥ १३१ ॥ वितर्कः कर्कशं दृष्ट्वा तं तेषामित्यभूदयम् । सहजैः सहजैश्वर्यो मृत्वोत्पन्नः किमर्जुनः ॥१३२॥ धन्विनः स्थानमन्यस्य सामान्यस्येदृशं कुतः । अहो दृष्टिरहो मुष्टिरहो सौष्ठवमित्यपि ॥ १३३ ॥ पुत्र थे जो एकसे एक बढ़कर बलवान् ॥ १२१ ॥ राजा द्रुपदकी एक द्रौपदी नामकी पुत्री भी थी जिसका शरीर रूप लावण्य, सौभाग्य तथा अनेक कलाओंसे अलंकृत था एवं जो अपने सौन्दयंके विषय में सानी नहीं रखती थी ॥१२२॥ कामदेवने सब राजपुत्रोंको उसके लिए पागल सा बना दिया था इसलिए वे नाना प्रकारके उपहार हाथमें ले उसकी याचना करते थे || १२३|| तदनन्तर 'किस किससे बुराई की जाये' यह विचार दाक्षिण्य-भंगसे भयभीत राजा द्रुपदने कन्याकी इच्छा रखनेवाले सब राजकुमारोंको चन्द्रक यन्त्रका वेध करनेके लिए आमन्त्रित किया || १२४ || इस पृथिवीपर द्रौपदीरूप ग्रहके वशीभूत हुए कर्ण, दुर्योधन आदि जितने राजा थे उन सबका झुण्ड माकन्दी नगरी में इकट्ठा हो गया || १२५ | | उसी समय सुरेन्द्रवर्धन नामका एक विद्याधर राजा अपनी पुत्री के योग्य वर खोजने के लिए वहां आया और उसने राजा द्रुपदकी आज्ञासे गाण्डीव नामक धनुषको वरकी परीक्षाका साधन निश्चित किया || १२६ | | उस समय यह घोषणा की गयी कि 'जो अत्यन्त भयंकर गाण्डीव धनुषको गोल करने एवं राधावेध ( चन्द्रकवेध ) में समर्थ होगा वही द्रौपदीका पति होगा' || १२७|| इस घोषणाको सुनकर वहां जो द्रोण तथा कर्ण आदि राजा आये थे वे सब गोलाकार हो धनुषके चारों ओर खड़े हो गये || १२८ || परन्तु सती स्त्री के समान देवोंसे अधिष्ठित उस धनुष-यष्टिका देखना भी उनके लिए अशक्य था फिर छूना और खींचना तो दूर रहा ||१२९|| ५४७ तदनन्तर जब सब परास्त हो गये तब द्रौपदीके होनहार पति एवं सदा सरल प्रकृतिको धारण करनेवाले अर्जुनने उस धनुष-यष्टिको देखकर तथा छूकर ऐसा खींचा कि वह सती स्त्रीके समान इनके वशीभूत हो गयी || १३०|| जब अर्जुनने खींचकर उसपर डोरी चढ़ायी और उसका आस्फालन किया तो उसके प्रचण्ड शब्द में कर्णं आदि राजाओंके नेत्र फिर गये तथा कान बहरे हो गये || १३१|| तीक्ष्ण आकृतिके धारक पार्थको देखकर कर्ण आदिके मनमें यह तर्क उत्पन्न हुआ कि क्या स्वाभाविक ऐश्वयंको धारण करनेवाला अर्जुन अपने भाइयोंके साथ मरकर यहाँ पुनः उत्पन्न हुआ है ? ||१३२|| अर्जुनके सिवाय अन्य सामान्य धनुर्धारीका ऐसा खड़ा होना कहाँ सम्भव है ? अहा ! इसकी दृष्टि, इसकी मुट्ठी और इसकी चतुराई - सभी आश्चयंकारी हैं ॥१३३॥ १. मनोवेगैर्नृपात्मजाः म. क. । २. पृथिव्याम् 'क्षोणी ज्या काश्यपी क्षितिः' इति धनंजयः । ३. सदा सर्वदा ऋजुना सरलेन । ४. क्षिति: म. ( ? ) । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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