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________________ ५२८ हरिवंशपुराणे हस्तपादशिरच्छेदं देहदण्डं भयास्पदम् । देव्या चोक्तं तदा देव ! अयं दोषो न किं तव ॥१८॥ तद्वचसा स म्लानो हि हिमानीहतपनवत् । चिन्तयेदनया तथ्यं ममोक्तं हितमिच्छया ।।१८।। परस्त्रीहरणं सत्यं दुर्गतेदुःखकारणम् । ज्ञात्वा विरागिणं कान्तमूचे सापि विरागिणी ॥१८४।। कि मोगैरीदृशैः कृत्यं परस्त्रीविषयैः प्रमो । किंपाकसदृशैः स्वामिन् ! दुःखदैः प्रीणकैरपि ।।४५|| मोगास्ते स्वपरयोयें नोपतापस्य हेतवः । सम्मताः साधुलोकस्य नेतरे विषयात्मकाः ॥१८६।। इति प्रबोध्यमानोऽयं मधुश्चन्द्रामया शनैः । मुमोच सुदृढीभूतं मोहकादम्बरोमदम् ।।१८७।। जगाद च स तां देवी प्रसन्नमतिरादरात् । साधु ! साधु ! स्वया साधि ! प्रतिपादितमत्र मे ॥१८॥ न युक्तमीदशं कर्म पुंसामाचरितु सताम् । परपीडाकरं वाढं परत्रेह च पापकृत् ॥१८॥ मादक्षोऽपि यदीदक्षं कर्म लोकविगर्हितम् । करोति तत्र किं वाच्यमव्युत्पन्नः पृथग्जनः ।।१९०॥ स्वकलत्रेऽपि यत्रायं रागोऽत्यर्थ निषेवितः । कर्मबन्धस्य हेतुः स्यात् किं पुनः परयोषिति ।।१९।। ज्ञानाङ्कशनिरुद्धोऽपि मनोमत्तमहाद्विपः । उरथेन नयत्युग्रः किमत्र कुरुते बुधः ।।।१२।। निरुद्धय निशितैर्दण्डैरनङ्कुशमनोगजम् । प्रवर्तयन्ति ये माग केचिदेवात्र ते भटाः ॥१९३।। दण्डैर्मनोगजो मत्तो रतिवासितया हृतः । यावन्न युज्यते तावत् कुतस्तस्य मदक्षतिः ॥१९॥ प्रयत्नेन मनोहस्ती यावन्नात्र वशीकृतः । तावदारोहकस्यापि भयायैव न शान्तये ॥१९५॥ शिर काटकर इसे भयंकर शारीरिक दण्ड दिया जाये। देवी चन्द्राभाने उसी समय कहा कि हे देव ! क्या यह अपराध आपने नहीं किया है ? आपने भी तो परस्त्रीहरणका अपराध किया है ।।१८०-१८२॥ चन्द्राभाके उक्त वचन सुनते ही राजा मधु तुषारसे पीड़ित कमलके समान म्लान हो गया-उसके मुखको कान्ति नष्ट हो गयो । वह विचार करने लगा कि मेरा हित चाहने वाली इस चन्द्राभाने यह सत्य ही कहा है ॥१८३॥ सचमुच ही परस्त्रीहरण दुर्गतिके दुःखका कारण है। पतिको विरागी देख चन्द्राभाने भी विरक्त हो कहा कि हे प्रभो! इन परस्त्रीविषयक भोगोंसे क्या प्रयोजन है ? हे नाथ! ये भोग यद्यपि वर्तमानमें सुख पहुंचानेवाले हैं तथापि परिपाक कालमें किपाक फलके समान दुःखदायी हैं । सज्जन पुरुषोंको वे ही भोग इष्ट होते हैं जो निज और पर के सन्तापके कारण नहीं हैं । अन्य विषयरूप भोगोंको सत्पुरुष भोग नहीं मानते ॥१८४-१८६॥ चन्द्राभाके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर राजा मधुने धीरे-धीरे मोहरूपी मदिराके सुदृढ़ मदको छोड़ दिया ॥१८७॥ और बड़ी प्रसन्नतासे आदरपूर्वक उससे कहा कि ठीक, ठोक, हे साध्वि ! तुमने बहुत अच्छी बात कही ॥१८८। यथार्थमें सत्पुरुषोंको ऐसा काम करना उचित नहीं जो परलोक तथा इस लोकमें दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेवाला तथा पापको बढ़ानेवाला हो ।।१८९॥ जब मेरे जैसा प्रबुद्ध व्यक्ति भी ऐसा लोक-निन्द्य कार्य करता है तब अविवेकी साधारण मनुष्यको तो बात ही क्या है ? ॥१९०॥ जहां अपनी स्त्रीके विषयमें भी सेवन किया हुआ यह अत्यधिक राग कमंबन्धका कारण है वहां परस्त्रीविषयक रागको तो कथा ही क्या है ? ॥१९१॥ यह मनरूपी मदोन्मत्त महा हाथी ज्ञानरूपी अंकुशसे रोके जानेपर भी इस जीवको कुमार्गमें ले जाता है। यहां विद्वान् क्या करे ? ॥१९२।। जो इस अनंकुश मनरूपी गजको तीक्ष्ण दण्डोंसे रोककर सुमार्गमें ले जाते हैं ऐसे शूर-वीर पुरुष संसारमें विरले ही हैं ।।१९३|| रतिरूपी हस्तिनीके द्वारा हरा हुआ यह मनरूपी मत्त हाथी जबतक इन्द्रिय-विजयरूपी दण्डोंसे युक्त नहीं किया जाता है तबतक इसके मदका नाश कैसे हो सकता है ? ॥१९४|| यह मनरूपी हाथी जबतक प्रयत्नपूर्वक वशमें नहीं किया गया है तबतक यह चढ़नेवालेके लिए भयका ही कारण रहता है, शान्तिका नहीं ॥१९५।। १. तद्वचसामलाभो हि हेमन्ते पद्मवन्नृपः ग.। २. मदक्षितिः म., ग. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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