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________________ त्रिचत्वारिंशः सर्गः सुवशस्तु मनोहस्ती तपोमयरणक्षितौ । पापसेनां निगृह्णाति साध्वाधोरणनोदितः ॥ ९९६ ॥ शब्दरूप रसस्पर्शगन्धसस्याभिलाषिणः । हृषीक मृगयूथस्य मनोमारुतहारिणः ॥ १९७॥ निरुध्य प्रसभं धैर्यं दृढवातुरया चितम् । चिरसंचितपापस्य करोमि तपसा क्षयम् ॥१९८॥ इत्याभाष्य मनोवेगं निगृह्य विदधे मधुः । धियं बोधपयोधौ तां तापस्ये तापशान्तये ॥ १९९॥ आगस्य च तदाऽयोध्यां नाम्ना त्रिमलवाहनः । मुनिर्मुनिसहस्रेण सहस्राम्रवनेऽवसत् ॥ २००॥ मधुः सकैटभः श्रुत्वा तमयात्लवधूजनः । प्रपूज्य विधिना धर्म शुश्राव च विशेषतः ॥ २०१ ॥ भोगसंसारशारीर पुरवैराग्यसंगतः । प्रवव्राज सह भ्रात्रा क्षत्रियैर्बहुभिर्मधुः ॥ २०२ ॥ विशुद्धान्वय संभूताः शतशोऽथ सहस्त्रशः । प्राव्रजन् व्रतशीलाढ्याश्चन्द्रामाद्या नृपस्त्रियः ॥२०३॥ माधवोऽपि निजं राज्यं ररक्ष कुलवर्धनः । वर्धमानः शरीरेण पौरुषेण जयेन च ॥ २०४ ॥ चक्रतुस्तौ तपो घोरं राजानौ मधुकैटभौ । व्रतगुप्तिसमित्याढ्यौ निर्ग्रन्थौ ग्रन्थवर्जितौ ॥ २०५ ॥ एक एव तयोरासीदङ्गोपाङ्गपरिग्रहः । न बाह्याभ्यन्तरासंगादङ्गोपाङ्गपरिग्रहः ॥ २०६ ॥ षष्टाष्टमादिषण्मासपर्यन्तोपोषितावृषी । निःशेषैरागमोक्तस्तौ चक्रतुः कर्मनिर्जराम् ॥२०७॥ उत्तुङ्गगिरिश्टङ्गेषु तयोरातापनस्थयोः । स्वेदस्य बिन्दवः पेतुर्विलीनस्येव कर्मणः ॥ २०८ ॥ वर्षा जीवरक्षार्थं वृक्षमूलस्थयोर्वपुः । युधीव शरधाराभिर्न मिन्नं धृतिकण्टकम् ॥ २०९ ॥ इसके विपरीत अच्छी तरह वशमें किया हुआ मनरूपी हाथी, साधुरूपी महावतके द्वारा प्रेरित हो तपरूपी रणभूमि में पापरूपी सेनाको अच्छी तरह रोक लेता है || १९६ || शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्धरूपी धान्यकी अभिलाषा रखनेवाले एवं मनरूपी वायुसे प्रेरित हो चौकड़ी भरनेवाले इस इन्द्रियरूपी मृगोंके झुण्डके संचित धैर्यको ध्यानरूपी मजबूत जालसे जबरदस्ती रोककर मैं तपके द्वारा चिरसंचित पापका अभी हाल क्षय करता हूँ ।।१९७-१९८|| इस प्रकार कहकर तथा मनके वेगको रोककर राजा मधुने ज्ञानरूपी जलसे धुली हुई अपनी बुद्धिको सन्तापकी शान्तिके लिए तपश्चरण में लगाया ॥ १९९ ॥ उसी समय विमलवाहन नामक मुनिराज एक हजार मुनियोंके साथ अयोध्या नगरी में आकर उसके सहस्राम्रवनमें ठहर गये || २००|| मुनियोंके आगमनका समाचार सुन राजा मधु, अपने छोटे भाई कैटभ और स्त्रीजनोंके साथ उनके दर्शन करनेके लिए गया । विधिपूर्वक उनकी पूजा कर उसने विशेष रूप से धर्मश्रवण किया || २०१ ॥ तथा भोग, संसार, शारीरिक सुख एवं नगर आदिसे विरक्त हो उसने भाई कैटभ तथा अन्य अनेक क्षत्रियोंके साथ जिन दीक्षा ले ली || २०२|| विशुद्ध कुलमें उत्पन्न तथा व्रत और शीलसे युक्त चन्द्राभा आदि सैकड़ों-हजारों रानियाँ भी दीक्षित हो गयीं - आर्यिका बन गयीं ॥ २०३ || राजा मधुके बाद उसका पुत्र कुलवर्धन, जो शरीर, पुरुषार्थं तथा विजयसे निरन्तर बढ़ रहा था अपने कुलकी रक्षा करने लगा || २०४ || ५२९ राजा मधु और कैटभ घोर तप करने लगे । वे व्रत गुप्ति और समिति से युक्त थे तथा परिग्रहसे रहित निर्ग्रन्थ- मुनिराज थे || २०५ ॥ उस समय उन दोनोंके एक अंगोपांग ही परिग्रह था अथवा बाह्य और आभ्यन्तर आसक्तिका अभाव होनेसे अंगोपांग भी परिग्रह नहीं था || २०६ || वे दोनों मुनि वेला-तेलाको आदि लेकर छह-छह माह के उपवास करते थे और आगममें प्रतिपादित समस्त आचरणोंसे कर्मोंकी निर्जरा करते थे || २०७|| जब कभी वे ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों की चोटियोंपर आतापन योग लेकर विराजमान होते थे तब उनके शरीर से पसीनाकी बूँदें टपकने लगती थीं और ऐसो जान पड़ती थीं मानो कर्म ही गल-गलकर नीचे गिर रहे हों || २०८ || वर्षाऋतु जीवोंकी रक्षा १. जलधाराभिः पक्षे बाणधाराभिः । २. धैर्यकवचयुक्तम् । ६७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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