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________________ त्रिचत्वारिंशः सर्ग: ५२७ चन्द्रामासंगसंजातविकासस्य सुगन्धिताम् । कुमुदाकरराजस्य पङ्कगन्धो न बाधते ॥१६९॥ इति संचित्य रागान्धः स तस्या हरणे मनः । न्यधत्त मधुरुर्वीशो मतिमानपि मान्यपि ॥१७०॥ ततो भीमकमुदवृत्तं वशीकृत्य कृती मधुः । अयोध्यापुरमागत्य चन्द्रामाहृतमानसः ॥१७१॥ सान्तःपुरान् स्वसामन्तान् स्वपुरं स्वपुरस्थितान् । सत्वरं सत्त्वसंपन्नः समाहूय यथायथम् ॥१७२॥ सर्वान् संपूज्य संपूज्य विचित्राम्बरभूषणः । विससर्ज निजावासान् प्रसादालादिताननान् ॥१७३॥ अतिसंमान्य सस्त्रीकं तथा वटपुरेश्वरम् । अजीगमदतिप्रीतं प्रीतिपूर्व निजास्पदम् ॥१७४।। चन्द्राभायास्तु यद् योग्यमद्याप्याभरणं वरम् । न सजमिति तावरसा तेन रुद्ध्वा निजीकृता ॥१७॥ प्रभुत्वमखिलस्त्रीणां महादेवीपदेन सः । दत्त्वा कामान् यथाकामं न्यषेवत तया मधुः ॥१७॥ तस्याः कौमारमर्त्ता तु वियोगानलदीपितः । उन्मत्तता परां प्राप्तः पर्यटन् क्षितिमाकुलः ॥१७७।। चन्द्राभालापवार्तिः पुररथ्यास पर्यटन् । धूसरो वीक्षितो जातु प्रासादस्थितया तया ।।१७८॥ जातकारुण्ययावाचि मधुराजस्ततोऽनया। नाथ ! पूर्वपतिं पश्य भ्रमन्तं मे प्रलापिनम् ॥१७१।। तस्मिन्नवसरे चण्डैस्तैः कश्चित्पारदारिकः । गृहीत्वा दर्शितस्तस्मै नृपाय न्यायवेदिने ॥१८॥ किमहो देवदण्डोऽस्य तेनोक्तं सोऽपराधवान् । अत्यन्तपापभागेष तस्मादस्य विधीयते ॥१८॥ चन्द्रिकाके संगसे विकसित कुमुदवनकी सुगन्धिको कीचड़की दुर्गन्ध नष्ट नहीं कर सकती उसी प्रकार चन्द्राभाके संगसे प्रफुल्लित मेरी कीर्तिको अपवादरूपी कीचड़की दुर्गन्ध नष्ट नहीं कर सकेगी ॥१६९॥ राजा मधु यद्यपि बहुत बुद्धिमान् और अभिमानी था तथापि रागसे अन्धा होनेके कारण उसने उक्त विचार कर चन्द्राभाके हरण करने में अपना मन लगाया-उसके हरनेका मनमें पक्का निश्चय कर लिया ॥१७॥ तदनन्तर उच्छृङ्खल राजा भीमकको वशकर कृतकृत्य होता हुआ राजा मधु अयोध्या नगरीमें वापस आ गया। वहां चूकि चन्द्राभाके द्वारा उसका मन हरा गया था इसलिए उसने बड़े उत्साहसे युक्त हो अपने समस्त सामन्तोंको अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ शीघ्र ही अपने नगरमें बुलाया और यथायोग्य नाना प्रकारके वस्त्राभूषणोंसे सबका सत्कारकर उन्हें अपने-अपने घर विदा कर दिया। स्वामीके द्वारा यह सत्कार प्राप्तकर सबके मुख प्रसन्नतासे विकसित हो रहे थे। वटपुरका राजा वीरसेन भी अपनी स्त्री चन्द्राभाके साथ वहां आया था सो राजा मधुने उसका बहुत भारी सत्कार कर उसे यह कहकर अपने घरके लिए विदा कर दिया कि चन्द्राभाके योग्य आभूषण अभी तक तैयार नहीं हो सके हैं इसलिए तैयार होनेपर भेज देंगे। भोला-भाला वीरसेन चला गया और चन्द्राभाको रोककर राजा मधुने अपनी स्त्री बना ली। महादेवीका पद देकर उसने चन्द्राभाको समस्त स्त्रियोंका प्रभुत्व प्रदान किया। इस प्रकार वह उसके साथ मनचाहे भोग भोगने लगा ॥१७१-१७६।। इधर चन्द्राभाका पहलेका पति उसकी विरहरूपी अग्निसे प्रदीप्त हो अत्यधिक उन्मत्तताको प्राप्त हो पृथिवीपर बड़ी व्यग्रतासे इधर-उधर घूमने लगा ॥१७७॥ एक दिन वह 'चन्द्रामा चन्द्राभा' इस प्रकारके आलापकी वार्तासे दुखी हुआ धूलि-धूसरित हो नगरको गलियोंमें घूम रहा था कि महलपर खड़ी चन्द्राभाने उसे देख लिया॥१७८॥ देखते ही के साथ उसके हृदय में दया उमड़ आयी। उसने पास ही बैठे राजा मधुसे कहा कि हे नाथ ! देखो यह मेरा पूर्व पति कैसा प्रलाप करता हुआ घूम रहा है ।।१७९।। उसी अवसरपर कुछ क्रूर कर्मचारियोंने परस्त्रीसेवन करनेवाले किसी पुरुषको पकड़कर न्यायके वेत्ता राजा मधुके लिए दिखाया और कहा कि हे देव ! इसके लिए कौन-सा दण्ड योग्य है ? राजा मधुने उत्तर दिया कि यह अपराधी अत्यन्त पापी है इसलिए इसके हाथ पांव तथा १. यातकारुण्यया म., ग.। २. किमिह म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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