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________________ त्रिचत्वारिंशः सर्ग: मुनिमासाद्य तौ धर्म श्रुत्वा द्विविधमप्यतः । अणुव्रतानि संगृह्य श्रावकत्वमुपागतौ ॥१४५॥ अनपाल्य चि धर्म सम्यग्दर्शनभावितो। कालेन कालधर्मण जाती सौधर्मवासिनी ॥१४६॥ अश्रद्धाय मतं जैनं पितरौ तु मृतौ तयोः । 'जातौ कुयोनिपान्थौ तौ यतो मिथ्यात्वमोहितौ ॥१४७॥ देवी देवसुखं भुक्त्वा च्युत्वाऽयोध्यानिवासिनः । जाती समुद्रदत्तस्य धारियां श्रेष्टिनः सुतौ ॥१४८॥ पूर्णभद्रस्तयोज्येष्ठो मणिमद्रोऽनुजोऽभवत् । अविराधितसम्यक्त्वौ तौ च शासनवत्सलौ ॥१४९॥ गुरोर्महेन्द्रसेनाच्च धर्म श्रुत्वा पितानयोः । तत्पुरेश्वरराजश्च भव्याश्चान्ये प्रवव्रजुः ॥१५०॥ अन्यदा मुनिपूजार्थ रथेन प्रस्थिती पुरः। चाण्डालं सारमेयीं च तौ दृष्टा स्नेहमागतौ ॥१५॥ वन्दित्वा तद्गुरुं भक्त्या पृच्छतः स्म सविस्मयौ । शुनीचाण्डालयोः स्नेहः स्वामिन्नौ किमभूदिति॥१५२॥ गुरुराहावधिज्ञानज्ञातलोकत्रयस्थितिः । विप्रजन्मनि यौ तौ वां पितरौ ताविमौ यतः ॥१५३॥ निशम्येति गरं नत्वा गत्वा तो धर्ममचतुः । मवान्तरकथाप्रायमुपशान्तौ ततस्तकौ ॥१५४॥ निर्वेदी दीनतां त्यक्त्वा त्यक्त्वाहारं चतुर्विधम् । मासेन श्वपचो मृत्वा भूत्वा नन्दीश्वरोऽमरः ॥१५५॥ सारमेयी पुरेऽनव राजपुत्रित्वमागताम् । अबोधयदसावेत्य स्वयंवरगतां सतीम् ॥१५६॥ तदनन्तर मुनिराजके समीप आकर अग्निभूति, वायुभूतिने मुनि और श्रावकके भेदसे दो रका धर्म श्रवण किया और अणव्रत धारण कर श्रावक पद प्राप्त किया ||१४५॥ सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त दोनों ब्राह्मणपुत्र चिरकाल तक धर्मका पालन कर मृत्युको प्राप्त हो सौधर्म स्वर्गमें देव हुए ॥१४६।। उनके माता-पिताको जैनधर्मकी श्रद्धा नहीं हुई इसलिए वे मिथ्यात्वसे मोहित हो मरकर कुगतिके पथिक हुए ॥१४७।। अग्निभूति, वायुभूतिके जीव जो सौधर्म स्वर्गमें देव हुए थे, स्वर्गके सुख भोग, वहाँसे च्युत हुए और अयोध्या नगरीमें रहनेवाले समुद्रदत्त सेठकी धारिणी नामक खोसे पुत्र उत्पन्न हुए ॥१४८।। उनमें बड़े पुत्रका नाम पूर्णभद्र और छोटे पुत्रका नाम मणिभद्र था। इस पर्यायमें भी दोनोंने सम्यक्त्वकी विराधना नहीं की थी तथा दोनों ही जिन-शासनसे स्नेह रखनेवाले थे||१४२|| तदनन्तर काल पाकर इन दोनोंके पिता, अयोध्याके राजा तथा अन्य भव्य जीवोंने महेन्द्रसेन गुरुसे धर्म श्रवण कर जिन-दीक्षा धारण कर ली ॥१५०।। किसी समय पूर्णभद्र और मणिभद्र, रथपर सवार हो मुनिपूजाके लिए नगरसे जा रहे थे सो बीचमें एक चाण्डाल तथा कुत्तीको देखकर स्नेहको प्राप्त हो गये ॥१५१॥ । मुनिराजके पास जाकर दोनोंने भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर आश्चर्यसे युक्त हो उन्होंने पूछा कि हे स्वामिन् ! कुत्ती और चाण्डालके ऊपर हम दोनोंको स्नेह किस कारण उत्पन्न हुआ? ॥१५२।। अवधिज्ञानके द्वारा तीनों लोकोंको स्थितिको जाननेवाले मुनिराजने कहा कि ब्राह्मणजन्ममें तुम्हारे जो माता-पिता थे वे ही ये कुत्ती और चाण्डाल हुए हैं सो पूर्वभवके कारण इनपर तुम्हारा स्नेह हुआ है ।।१५३।। इस प्रकार सुनकर तथा मुनिराजको नमस्कारकर दोनों भाई कुत्ती और चाण्डालके पास पहुंचे। वहाँ जाकर उन्होंने उन दोनोंको धमका उपदेश दिया तथा पूर्वभवको कथा सुनायी जिससे वे दोनों ही शान्त हो गये ॥१५४|| चाण्डालने संसारसे विरक्त हो दोनता छोड़ चारों प्रकारके आहारका त्याग कर दिया और एक माहका संन्यास ले मरकर नन्दीश्वर द्वीपमें देव हुआ ॥१५५।। कुत्ती इसी नगरमें राजाकी पुत्री हुई। इधर राजपुत्रीका स्वयंवर हो रहा था। जिस समय वह स्वयंवरमें स्थित थी उसी समय पूर्वोक्त नन्दीश्वर देवने १. याती म., ग.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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