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________________ द्वाचत्वारिंशः सर्गः १०५ प्रस्तावेऽत्र गणिज्येष्ठं श्रेणिकोऽपृच्छदित्यसौ । क एष नारदो नाथ ! कुतो वाऽस्य समुद्भवः ॥१२॥ गण्युवाच वचो गण्यः शृणु श्रेणिक मण्यते । उत्पत्तिरन्त्यदेहस्य नारदस्थ स्थितिस्तथा ॥१३॥ आसीत्सौर्य पुरस्यान्ते दक्षिणे तापसाश्रमः । वसन्ति तापसास्तस्मिन् फलमूलादिवृत्तयः ॥१४॥ सुमित्रस्तापसस्तत्र स सोमयशसि स्त्रियाम् । उञ्छवृत्तिः शशिच्छायं पुत्रमेकमजीजनत् ॥१५॥ तमुत्तानशयं यावत्तौ संस्थाय तरोरधः । उच्छवृत्त्यर्थमायातौ नगर क्षुत्पिपासितौ ॥१६॥ संक्रीडमानमेकान्ते तावत्तं जम्मकामराः । दृष्ट्वा पूर्वभवस्नेहान्नीत्वा वैताड्यपर्वतम् ॥१७॥ मणिकाञ्चनपंज्ञायां गुहायां तत्र तं शिशुम् । कल्पवृक्ष दव्याहारैरवर्द्धयन् ॥१८॥ स्वेष्टाय तेऽष्टनर्षाय सरहस्यं जिनागमम् । देवास्तस्मै ददुस्तुष्टा विद्या चाकाशगामिनीम् ॥१९॥ नारदो बहविद्योऽसौ नानाशास्त्रविशारदः । संयमासंयम लेभे साधुः साधुनिषेवया ॥२०॥ कन्दर्पस्य विजेतापि कन्दर्पनिमविभ्रमः । सकन्दर्पप्रियो हासलीलोभल्लोमवर्जितः ॥२१॥ अन्त्यदेहः प्रकृत्यैव नि:कषायोऽप्यसौ क्षिती। रणप्रेक्षाप्रियः प्रायो जातो जल्पाकमास्करः ॥२२॥ जिनजन्माभिषेकादिमहातिशयदर्शने । कुतूहलितया लोकं परिभ्रमति विभ्रमी ॥२३॥ कथारूप अमृतसे तथा मेरु पर्वतकी वन्दनाके समाचारोंसे उन सबके मनको सन्तुष्ट किया ॥११।। इसी अवसरमें राजा श्रेणिकने गौतम गणधरसे पूछा कि हे नाथ ! यह नारद कौन है ? की उत्पत्ति किससे हई है ? इसके उत्तरमें पूज्य गणधर देव कहने लगे कि हे श्रेणिक! चरमशरीरो नारदकी उत्पत्ति तथा स्थिति कहता हूँ सो श्रवण कर ॥१२-१३।। ___ सौर्यपुरके पास दक्षिण दिशामें एक तापसोंका आश्रम था उसमें फल-मूल आदिका भोजन करनेवाले अनेक तापस रहते थे ।१४।। वहीं उञ्छ वृत्तिसे आजीविका करनेवाले एक सुमित्र नामक तापसने अपनी सोमयशा नामक स्त्रीमें चन्द्रमाके समान कान्तिवाला एक पुत्र उत्पन्न किया ॥१५॥ भूख और प्याससे पीड़ित सुमित्र, और सोमयशा, दोनों दम्पती चित्त सोनेवाले उस बच्चेको एक वृक्षके नीचे रखकर उञ्छ वृत्तिके लिए जबतक नगरमें आये तबतक एकान्तमें क्रीड़ा करते हुए उस बालकको देखकर जम्भक नामक देव पूर्वभवके स्नेहसे उठाकर वैताड्यपर्वतपर ले गये। वहां उन्होंने मणिकांचन नामक गुहामें उस बालकको रखकर कल्प वृक्षोंसे उत्पन्न दिव्य आहारसे उसका पालन-पोषण किया ॥१६-१८॥ वह बालक देवोंको बहुत ही इष्ट था इसलिए जब वह आठ वर्षका हुआ तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे रहस्यसहित जिनागम और आकाशगामिनी विद्या प्रदान की ॥१९।। वही नारदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। नारद अनेक विद्याओंका ज्ञाता तथा नाना शास्त्रोंमें निपुण था। वह साधुके वेषमें रहता था तथा साधुओंकी सेवासे उसने संयमासंयम-देशव्रत प्राप्त किया था। वह कामको जीतनेवाला होकर भी कामके समान विभ्रमको धारण करता था, कामी मनुष्योंको प्रिय था, हास्यरूप स्वभावसे युक्त था, लोभसे रहित था, चरमशरीरी था, यद्यपि स्वभावसे ही निष्कषाय था तथापि पृथ्वीमें युद्ध देखना उसे बहुत प्रिय था, अधिकतर वह अधिक बोलनेवालोंमें शिरोमणि था, और जिनेन्द्र भगवान्के जन्माभिषेक आदि महान् अतिशयोंके देखनेका कुतूहली होनेसे विभ्रमपूर्वक लोकमें परिभ्रमण करता रहता था ॥२०-२३॥ १. चरमशरीरस्य (ग. टि.,म. टि.)। नारदस्य चरमशरीरत्वमाम्नायविरुद्धमस्ति । २२ तमे श्लोकेऽपि 'अन्त्यदेहः' इत्यस्य स्थाने 'अत्यदेहः' इति पाठो योजनीयः (प. ला.)। २. कन्दर्पेण सह वर्तन्ते इति सकन्दपस्तेिषां प्रियः (ग. टि.)। ३. वाचालभानुः (ग. टि.)। ६४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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