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________________ द्वाचत्वारिंशः सर्गः अथ सभ्यसमाकीर्णामन्यदा यादवीं समाम् । आजगाम नभोगामी नारदो नमसो मुनिः ॥१॥ आपिशङ्गजटाभारश्मश्रुकूर्चः शशिद्युतिः । विद्युद्वलयविद्योतिशारदाम्बुधरोपमः ॥२॥ विचित्रवर्णविस्तीर्णयोगपट्टविभूषितः । परिवेषवतो बिभ्रदौषधीशस्य विभ्रमम् ॥३॥ 'चलद्दुकूलकोपीनपरिधानपरिच्युतः । दिवोऽनुग्रहबुद्धयेव जगतः कल्पपादपः ॥४॥ देहस्थितेन शुद्धेन त्रिगुणेनोज्ज्वलोकृतः । यज्ञोपवीतसूत्रेण स रत्नत्रितयेन वा ॥५॥ असाधारणरूपेण गौरवाधानहेतुना । नैष्ठिकब्रह्मचर्येण पाण्डित्येनेव मण्डितः ॥६॥ शुद्धप्रकृतिरस्यन्तमरिषड्वर्गवर्जितः । राज्योदय इवोदारो राजलोकस्य पूजितः ॥७॥ द्वारिकाविभवालोकस्वशिरकम्पविग्रहम् । तेऽवतीर्ण तमालोक्य सहसोत्थाय पार्थिवाः ॥८॥ नमस्यासनदानादि सोपचारेण सक्रमम् । पूजयन्ति स्म संमानमात्रेण परितोषिणम् ॥९॥ जिनकृष्णबलालोकसंमाषणसुखामृतम् । पीत्वाप्यतृप्तनेत्रस्तमध्यतिष्ठत्समार्णवम् ॥१०॥ पूर्वापरविदेहाना जिनेन्द्राणां कथामृतैः । समेरुवन्दनोदन्तैमनोऽमीषामतर्पयत् ॥११॥ अथानन्तर किसी समय आकाशमें गमन करनेवाले नारद मुनि आकाशसे उतरकर सभासदोंसे भरी हुई यादवोंकी सभामें आये ॥१॥ उन नारदजीकी जटाएं, दाढ़ी और मूछ कुछकुछ पीले रंगकी थी तथा वे स्वयं चन्द्रमाके समान शुक्ल कान्तिके धारक थे इसलिए बिजलियोंके समूहसे सुशोभित शरद् ऋतुके मेघके समान जान पड़ते थे ।।२।। वे रंग-बिरंगे एक विस्तृत योगपट्टसे विभूषित थे इसलिए परिवेष ( मण्डल ) से युक्त चन्द्रमाको शोभा धारण कर रहे थे ॥३॥ उनका कौपीन और चद्दर हवासे मन्द-मन्द हिल रहा था इसलिए वे उनसे ऐसे जान पड़ते थे मानो जगत्का उपकार करनेकी इच्छासे आकाशसे कल्प वृक्ष ही नीचे आ गिरा हो ॥४।। वे अपने शरीरपर स्थित तीन लरके उस शुद्ध यज्ञोपवीत सूत्रसे अत्यन्त उज्ज्वल थे जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीन गुणोंके समान जान पड़ता था ॥५॥ वे जिस प्रकार असाधारण पाण्डित्यसे सुशोभित थे उसी प्रकार गौरवको उत्पत्तिके असाधारण कारणरूप नैष्ठिक ब्रह्मचर्यसे सुशोभित थे ॥६॥ वे राजाओंके उत्कृष्ट राज्योदयके समान समस्त राजाओंके पूजनीय थे क्योंकि जिस प्रकार राज्योदय शद्धप्रकृति अर्थात भ्रष्टाचार-रहित मन्त्री आदि प्रकृतिसे सहित होता है उसी प्रकार नारद भी शुद्धप्रकृति अर्थात् निर्दोष स्वभावके धारक थे और राज्योदय जिस प्रकार शत्रओंके षड्वर्गसे रहित होता है उसी प्रकार नारद भी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य इन छह अन्तरंग शत्रुओंसे रहित थे ॥७॥ द्वारिकाका वैभव देख, आश्चर्यसे जिनका शिर तथा शरीर कम्पित हो रहा था ऐसे नारदजीको आकाशसे नीचे उतरते देख सब राजा लोग सहसा उठकर खड़े हो गये ॥८॥ सम्मान मात्रसे सन्तुष्ट हो जानेवाले नारदजीको सबने नमस्कार तथा आसन-दान आदि उपचारोंसे क्रमपूर्वक सम्मान किया ॥९|| श्री नेमिजिनेन्द्र, कृष्ण नारायण और बलभद्रके दर्शन तथा सम्भाषणसे उत्पन्न सुखरूपी अमृतका पान करके भी जिनके नेत्र तृप्त नहीं हुए थे ऐसे नारद मुनि सभारूप सागरके मध्य में अधिष्ठित हुए-विराजमान हुए ।।९-१०॥ तत्पश्चात् नारदने पूर्व-पश्चिम विदेह क्षेत्रमें उत्पन्न तीर्थंकरोंको १. चलढुकूलकोपोनपरिधानपरिच्युतः ग., घ, ङ., म. । २. पार्थिवः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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