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________________ ४८८ हरिवंशपुराणे प्रणतप्रिय ! संप्रति जन्मजरामरणामयभीममहामवदुःख.. समुद्रमपारमतीत्य समेष्यति मोक्षमशेषजगच्छिखरम् । शिखराग्रसमग्रगुणाश्रयसिद्धमहापरमेष्ठिमहोपचयं प्रर्वदन्ति च यं मुनयः परमं पदमेकमिहाक्षरमात्महितम् ॥५॥ महितं महतां महदात्मगतं सततोदयमन्तविवर्जितमूर्जित सत्त्वसुखं प्रतिलभ्यमलभ्यमभव्यजनैः खलु यत्र सुखम् । सुखमत्र यदीश्वरविश्वजगत्प्रभुताप्रतिबद्धमपि त्रिदशे न्द्रनरेन्द्र पुरस्सरदेवमनुष्यविशेषमहाभ्युदयप्रमवम् ॥६॥ प्रभवप्रलयस्थितिधर्मपदार्थनिरूपणने पुणशासन शासन नावकशासनसेवनयैव भविष्यति नान्यमताश्रयतः । श्रयतामिति निश्चयमेत्य मवन्ति भवस्यविभूति मतिप्रेवणाः सततं तनुभृन्निवहा भवि येऽत्र त एव जिनेन्द्र कृतित्वमिताः ॥७॥ प्रियसर्वहितार्थवचोविमवं विभवं सरभीकृतदिग्विवरं वरसंहतिसंस्थितिरूपयुतं युतसर्वसुलक्षणपङ्क्तिरुचिम् । रुचिमत्पयसा समदेहरसं रसभावविदं मलमुक्ततर्नु तनुजस्विदिहीनमनन्ततया ततया संहितं भुवि वीर्यतया ॥८॥ तोटकवृत्तम् यतयात्मधियाँ जितनात्मभुवं भुवमव्यतरां सुखसस्यभृताम् । भृतविश्व ! भवन्तमनन्तगुणं गुणकाइक्षितया वयमीश नताः ॥९॥ पृथिवीमें वन्दनीय होंगे ॥४॥ हे प्रणतप्रिय ! हे भक्तवत्सल ! अब आप जन्म-जरा-मरणरूपी रोगोंसे भयंकर संसाररूपी महादुःखके अपार सागरको पार कर मोक्षस्वरूप, समस्त लोककी उस शिखरको प्राप्त होंगे जहाँपर उत्कृष्ट सीमाको प्राप्त समस्त गुणोंके आधारभूत सिद्ध भगवानरूप महापरमेष्ठी विराजमान रहते हैं और जिसे मुनिगण उत्कृष्ट, अद्वितीय, अविनाशी एवं आत्म-हितकारी पद कहते हैं ।।५।। जहांका उत्तम, महान् , आत्मगत, निरन्तर उदयमें रहनेवाला, अन्तरहित और अनन्त बलसम्पन्न सुख महापुरुषोंको ही प्राप्त हो सकता है .अभव्य जीवोंको नहीं। हे स्वामिन् ! आप उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वभाववाले पदार्थोंके निरूपण करने में निपुण शासनका उपदेश करनेवाले हैं। इस संसारमें समस्त जगत्को प्रभुतासे सम्बद्ध एवं इन्द्र, नरेन्द्र आदि देव और मनुष्योंके विशेष महान् अभ्युदयोंका कारणभूत जो सुख है वह भी आपके सेवासे ही प्राप्त होगा। अन्य मतोंके आश्रयसे नहीं। इसलिए सब आपका ही आश्रय लेवें इस प्रकार आपके विषयमें निश्चय-दृढ़ श्रद्धाको प्राप्त कर जो प्राणी इस पृथिवीमें नर्ग्रन्थ बुद्धिके धारण करने में प्रवीण होते हैं-निग्रंन्थ मुद्रा धारण करते हैं हे जिनेन्द्र ! वे ही प्राणी इस संसारमें कृतकृत्यताको प्राप्त होते हैं ॥६-७॥ हे भगवन् ! आप प्रिय एवं सर्वहितकारी वचनोंके वैभवसे सहित हैं, संसारका अन्त करनेवाले हैं, आपने दिशाओंके अन्तरालको सुगन्धित कर दिया है, आप उत्कृष्ट संहनन, उत्कृष्ट संस्थान और उत्कृष्ट रूपसे युक्त हैं, आप समस्त लक्षणोंसे सुशोभित हैं, आपके शरीरका रस-रुधिर दूधके समान है, आप रस और भावको जाननेवाले हैं, आपका शरीर मलसे रहित है, पसीनासे रहित है, आप पृथिवीमें व्याप्त अनन्त बलसे सहित हैं ॥८॥ आपने संयमरूप आत्मबुद्धिसे कामदेवको जीत लिया है। आप सुखरूपी १. प्रणतिप्रिय म। २. प्रविदन्ति म.। ३. प्रतिबुद्धमपि म.। ४. -त्यभिभूति म.। ५. नति ग.। ६. -महितम् ग.। ७ जिनयात्मभुवम् । ८. कामदेवम् (ग. टि.)। ९. सुखसस्यभृतम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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