SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 525
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ एकोनचत्वारिंशः सर्गः 'सकलश्रुतमत्यवधिप्रविकासिविशुद्ध विलासनिनिद्रा विशिष्ट विलोचनदृष्टिविदृष्टसमस्तचराचरतश्वजगत्रितय । त्रितयारमकदर्शनबोधचरित्रविनिर्मलरत्नविराजितपूर्व भवोग्रतपोयुतषोडशकारणसंचिततीर्थकरप्रकृते ॥१॥ प्रकृतेः स्थितितोऽनुभवाच विशिष्टतराद्भुतपुण्यमहोदय मारुतवेगविचालितदेवनिकायकुलाचरसेवितपादयुग। युगमुख्य मुखाम्बुजदर्शनतृप्तिविवर्जितमव्यमधुव्रतधीर तरस्तवनध्वमिबृंहितदुन्दुमिनादनिवेदितशुद्धयशः ॥२॥ यशसा धवलीकृतजन्मपवित्रितमारतवर्ष महाहरिवंश महोदयशैलशिखामणिबाल दिवाकरदीप्तिजितावपुः । वपुषाधिककान्तिभृताजितपूर्णशशाङ्क, विभो ! हरिनीलमणि द्यतिमण्डलमण्डितदिङमुखमण्डल नेमिजिनेन्द्र ! नमो भवते ॥३॥ मवतेह भुवां त्रितये मवता गुरुणा परमेश्वर विश्वजनीन महेच्छधिया प्रतिपादितमप्रतिमप्रतिमारहितम् । हितमुक्तिपथं प्रथितं विधिवत् प्रतिपद्य विधाय तपो विविधं विधिना प्रविधूय कुकर्ममलं सकलं भवि भव्यजनः प्रणतः ॥४॥ इन्द्र, नेमि जिनेन्द्रकी इस प्रकार स्तुति करने लगा- हे प्रभो! आपने समस्त) श्रुतज्ञान, मतिज्ञान और अवधिज्ञानसे विकसित, शुद्ध चेष्टाओंके धारक, जागरूक एवं विशिष्ट पदार्थोंको. दिखलानेवाली दृष्टिके द्वारा समस्त चराचर पदार्थोंसे युक्त तीनों जगत्को अच्छी तरह देख लिया है। आपने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रके भेदसे त्रिविधताको प्राप्त निर्मल रत्नोंसे सुशोभित पूर्वभव सम्बन्धी उग्र तपसे युक्त सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृतिका संचय किया है ।।१।। उसी तीर्थंकर प्रकृतिकी स्थिति तथा अनुभागबन्धके कारण अत्यन्त विशिष्ट एवं अद्भुत पुण्यके महोदयरूपी वायुके वेगसे आपने देवसमूहरूपी कुलाचलोंको विचलित किया है। उन्होंने आपके चरण युगलकी सेवा की है। आप युगमें मुख्य हैं तथा आपके मुख कमलके देखने सम्बन्धी तृप्तिसे रहित भव्यजीवरूपी भ्रमरोंके अत्यधिक स्तवनोंको ध्वनिसे वृद्धिंगत दुन्दुभियोंके शब्दसे आपका शुद्ध यश प्रकट हो रहा है ।।२।। हे नाथ ! आपने यशसे शुक्लीकृत जन्मसे समस्त भारतवर्षको पवित्र किया है । अत्यन्त श्रेष्ठ हरिवंशरूप विशाल उदया खामणिस्वरूप बालदिनकर-जैसो कान्तिसे आपने सूर्यके शरीरको जीत लिया है। है विभो ! आपने अधिक कान्तिको धारण करनेवाले शरीरके द्वारा पूर्णचन्द्रको जीत लिया है एवं इन्द्रनील मणि-जैसी कान्तिके समूहसे आपने समस्त दिशाओंके मुखमण्डलको सुशोभित कर दिया है इसलिए हे नेमि जिनेन्द्र ! आपको नमस्कार हो ॥३॥ हे परमेश्वर ! हे विश्वजनीन ! हे अप्रतिम-हे अनुपम ! आप तीनों लोकोंके गुरु हैं, एवं उत्कट बुद्धिके धारक हैं। यहां उत्पन्न होते ही आपने अनुपम, प्रसिद्ध एवं मोक्षका जो हितकारी मार्ग बतलाया है उसे स्वीकारकर तथा नाना प्रकारका तपकर भव्य नोव समस्त पापकर्मरूपो मलको विधिपूर्वक नष्ट कर १. त्रोटकद्वयनिर्मितः कश्चित् छन्दो-विशेषः (?)। २. तीर्थकरनाम्नः स्थितेरनुभागोदयाच्च (ग. टि.) । ३. विधायि म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy