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________________ द्वितीयः सर्गः शालशैलमहावप्रपरिखापरिवेषिणः । यस्योपरि परं 'गच्छत्यमित्रेतरमण्डलम् ॥११॥ एतावतैव पर्याप्तं पुरस्य गुणवर्णनम् । स्वर्गावतरणे तद्यद्वीरस्याधारतां गतम् ॥१२॥ सर्वार्थश्रीमतीजन्मा तस्मिन् सर्वार्थदर्शनः । सिद्धार्थोऽमवदर्काभो भूपः सिद्धार्थपौरुषः ॥१३॥ यत्र पाति धरित्रीयमभदेकत्र दोषिणी । धर्मार्थिन्योऽपि यत्त्यक्तपरलोकमयाः प्रजाः ।।१४॥ कस्तस्य तान् गुणानुद्वान्नरस्तुलयितुं क्षमः । वर्धमानगुरुत्वं यः प्रापितः स नराधिपः ॥१५॥ उच्चकुलादिसंभूता सहजस्नेहवाहिनी । महिषी श्रीसमुद्रस्य तस्यासीत् प्रियकारिणी ॥१६॥ चेतश्चेटकराजस्य यास्ताः 'सप्तशरीरजाः । अतिस्नेहाकुलं चक्रुस्तास्वाद्या प्रियकारिणी ॥१७॥ कस्ता योजयितुं शक्तस्त्रिशला गुणवर्णनैः । या स्वपुण्य महावीरप्रसवाय नियोजिता ॥१८॥ सर्वतोऽथ नमन्तीषु सर्वासु सुरकोटिषु । प्रभावाग्निपतन्तीषु नमसो वसुवृष्टिषु ॥१९॥ वीरेऽवतरति त्रातुं धरित्रीमसुधारिणः । तीर्थेनाच्युतकल्पोच्चैःपुष्पोत्तरविमानतः ॥२०॥ प्रकाश फैल रहा है, कहीं हीराकी प्रभा फैल रही है और कहीं वैडूर्यमणियोंकी नीली-नीली आभा छिटक रही है। उन सबसे वह एक होनेपर भी सदा सब रत्नोंकी खानकी शोभा धारण करता है ॥१०॥ कोटरूपी पर्वत, बड़े-बड़े धूलि कुट्टिम, और परिवारसे घिरे हुए उस नगरके ऊपर यदि कोई जा सकता था तो मित्र अर्थात् सूर्यका मण्डल ही जा सकता है, अमित्र अर्थात् शत्रुओंका मण्डल नहीं जा सकता था ॥११॥ इस नगरके गुणोंका वर्णन तो इतनेसे ही पर्याप्त हो जाता है कि वह नगर स्वर्गसे अवतार लेते समय भगवान् महावीरका आधार हुआ-भगवान् महावीर वहाँ स्वर्गसे आकर अवतीर्ण हुए ॥१२॥ राजा सर्वार्थ और रानी श्रीमतीसे उत्पन्न, समस्त पदार्थों को देखनेवाले, सूर्यके समान देदीप्यमान और समस्त अर्थ-पुरुषार्थ सिद्ध करनेवाले सिद्धार्थ वहाँके राजा थे ॥१३॥ जिन सिद्धार्थके रक्षा करनेपर पृथिवी इसी एक दोषसे युक्त थी कि वहाँकी प्रजाने धर्मकी इच्छुक होनेपर भी परलोकका भय छोड़ दिया था। भावार्थ-जो प्रजा धर्मकी इच्छुक होती है उसे स्वर्ग, नरक आदि परलोकका भय अवश्य रहता है परन्तु वहांकी प्रजा परलोकका भय छोड़ चुकी थी यह विरोध है परन्तु परलोकका अर्थ शत्रु लोगोंसे विरोध दूर हो जाता है अर्थात् वहाँको प्रजा धर्मकी इच्छुक थी और शत्रुओंके भयसे रहित थी ॥१४॥ जो राजा सिद्धार्थ, साक्षात् भगवान् वर्धमान स्वामीके पितृपदको प्राप्त हुए उनके उत्कृष्ट गुणोंका वर्णन करनेके लिए कौन मनुष्य समथं हो सकता है ? ॥१५॥ ____जो उच्च कुलरूपी पर्वतसे उत्पन्न स्वाभाविक स्नेहकी मानो नदी थी ऐसो रानी प्रियकारिणी लक्ष्मीके समुद्रस्वरूप राजा सिद्धार्थको प्रिय पत्नो थी ॥१६।। जिन सात पुत्रियोंने राजा चेटकके चित्तको अत्यधिक स्नेहसे व्याप्त कर रखा था उन पुत्रियोंमें प्रियकारिणी सबसे बड़ी पुत्री थी ॥१७|| जो अपने पुण्यसे भगवान् महावीरको जन्म देनेके लिए प्रवृत्त हुई उस त्रिशला (प्रियकारिणी ) के गुण वर्णन करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥१८॥ ____ अथानन्तर जब सब ओरसे समस्त देवोंको पंक्तियां नमस्कार कर रही थीं, प्रभावके कारण जब आकाशसे रत्नोंकी वर्षा हो रही थी और भगवान् महावीर जब अपने तीर्थसे प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिए अच्युत स्वर्गके उच्चतम पुष्पोत्तर विमानसे पृथिवीपर अवतीर्ण होनेके लिए उद्यत हुए १. सूर्यमण्डलं गच्छति न तु शत्रुमण्डलम् । २. सर्वार्थ नाम पिता, श्रीमती माता ताभ्यां जन्म यस्य सः । ३. प्रेत्य प्राप्यो लोकः परलोकः पक्षे शत्रुलोकः । ४. -नुद्यान् म.। ५. त्रिशला इति प्रियकारिण्या द्वितीयं नाम । ६. पुत्र्यः । ७. रत्नवृष्टिषु । ८. प्राणिगणान् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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