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________________ प्रथमः सर्गः रामकेशवयोः 'प्लुष्टबन्धु गुवकलत्रयोः । निर्गमं दुर्गमं शोक कौशाम्बवनसेवनम् ॥११९।। शीरिरक्षणमुक्तस्य प्रमादाईवयोगतः । जरत्कुमारमुकेन शरेण हननं हरेः ॥१२॥ ततो घातकशोकं च शोकं रामस्य दुस्तरम् । सिद्धार्थबोधितस्यास्य निर्विण्णस्य तपस्यनम् ।।१२।। ब्रह्मलोकोपपादं च कौन्तेयानां तपोवनम् । ऊर्जयन्तगिरावन्ते नेमिनाथस्य निवृतिम् ॥१२२॥ उपसर्गजयं पञ्चपाण्डवानां महात्मनाम् । दीक्षां जरत्कुमारस्य सन्तानं तस्थ चायतम् ॥१२३।। हरिवंशप्रदीपस्य जितशत्रोत केवलम् । पुरप्रवेशमन्ते च श्रेणिकस्य पृथुश्रियः ।।१२४।। वर्धमानजिनेशस्य निर्वाणं गणिनां तथा । देवलोककृतं वक्ष्ये प्रदीपमहिमोदयम् ॥१२।। हरिवंशपुराणस्य विभागोऽयं ससंग्रहः । श्रयतां विस्तरः सिद्धये भव्यैः सभ्यरतः परम् ।। ५२६॥ शार्दूलविक्रीडितम् एकस्यापि महानरस्य चरितं पापस्य विधंसनं, सर्वेषां जिनचक्रवर्तिहलिनामेतबुधाः किं पुन: । वायकस्य महाधनस्य महतस्तापस्य विच्छेदकं,लोकव्यापिघनाघनौघनिपतद्धारासहस्रं न किम् ।।१७।। मुक्त्वा लोकपुराणतिर्य गपथभ्रान्ति विवेकी जनो,गृह्णातु प्रगुजां पुराणपदवीमेतां हितग्रापिणीम् । दिग्मूढं विरहय्य मोहबहुलं संशुद्धदृष्टिः परो विस्तीर्ण जिनभास्करप्रकटिते मार्ग भृगोः कः पतेत् ।।१२८॥ इत्यरिष्टनेमिपुराण संग्रह हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती संग्रहविभागवर्णनो नाम प्रथम: वर्ग:॥१॥ पुत्रियोंका संयम ग्रहण करना, द्वीपायन मुनिके क्रोधसे द्वारिका पुरीका विनाश, जिनके भाई, पुत्र तथा स्त्रियाँ जल गयी थीं ऐसे बलराम और कृष्णका द्वारिकासे निकलना, असा शोक, कौशाम्बीके वनमें दोनों भाइयोंका जाना, बलभद्रकी रक्षासे रहित श्रीकृष्णका भाग्यवश जरत्कुमारके द्वारा छोड़े हुए बाणसे प्रमादपूर्वक मारा जाना, तदनन्तर मारनेवाले जरत्कुमारका शोक करना, बलरामका दुस्तर शोक, सिद्धार्थ देवके द्वारा प्रतिबोधित होनेपर बलदेवका विरक्त हो दीक्षा धारण करना, ब्रह्मलोकमें जन्म होना, पाण्डवोंका तपके लिए वनको जाना. गिरिनार पर्वतपर नेमिनाथका निर्वाण होना, महान् आत्माके धारक पाँच पाण्डवोंका उपसर्ग जीतना, जरत्कुमारकी दीक्षा, उसकी विस्तृत सन्तान, हरिवंशके दीपक राजा जितशत्रुको केवलज्ञान, विशाल लक्ष्मीके धारक राजा श्रेणिकका अन्त में नगर प्रवेश, श्री वर्धमान जिनेन्द्र और उनके गणधरोंका निर्वाण और देवोंके द्वारा किया हुआ दीपमालिका महोत्सवका वर्णन है। श्री जिनसेन स्वामी कहते हैं कि इस पुराणमें इन सबका मैं वर्णन करूंगा ।।११७-१२५।। गौतम स्वामी कहते हैं कि इस प्रकार हरिवंशपुराणका यह संग्रह सहित अवान्तर विभाग दिखा दिया। अब इसके आगे भव्य सभासद् आत्म-सिद्धि के लिए इसके विस्तारका वर्णन श्रवण करें ॥१२६॥ हे विद्वज्जनो! जब एक ही महापुरुषका चरित पापका नाश करनेवाला है तब समस्त तीर्थंकरों, चक्रवतियों और बलभद्रोंके चरितका निरूपण करनेवाले इस ग्रन्थको महिमाका क्या कहना है ? सो ठीक ही है क्योंकि जब एक ही महामेघका जल अत्यधिक सन्तापको नष्ट करनेवाला है तब लोकमें सर्वत्र व्याप्त मेघ समूहसे पड़नेवाली हजारों जलधाराओंकी महिमाका क्या कहना है ? ॥१२७|| विवेकोजन, लौकिक पुराणरूपी टेढ़े-मेढ़े कुपथके भ्रमणको छोड़, सीधे तथा हित प्राप्त करनेवाले इस पुराणरूपी मार्गको ग्रहण करें। मोहसे भरे हुए दिङ्मूढ मनुष्यको छोड़ अत्यन्त शुद्ध दृष्टिको धारण करनेवाला ऐसा कौन मनुष्य है जो जिनेन्द्रदेवरूपी सूर्यके द्वारा लम्बे-चौड़े मार्गके प्रकाशित होनेपर भी भृगुपात करेगा-किसी पहाड़को चट्टानसे नीचे गिरेगा? अर्थात् कोई नहीं ॥१२८॥ इस प्रकार जिसमें भगवान् अरिष्टनेमिके पुराणका संग्रह किया गया है ऐसे श्री जिनसेनाचार्य विरचित हरिवंशपुराणमें 'संग्रह विभाग वर्णन' नामका प्रथम सर्ग समाप्त हुआ ॥१॥ १. दग्धबन्धपुत्रस्त्रीकयोः । २. बलभद्ररक्षारहितस्य । ३. पाण्डवानाम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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