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________________ हरिवंशपुराणे यादवानां सभाक्षोभं सेनयोरुपसर्पणम् । विजयाधै 'खगोमं वसुदेवपराक्रमम् ॥१०॥ अक्षौहिणीप्रमाणं च रथिनोऽतिरथांस्तथा । महासमरथान् सर्वान् नृपानर्धरथानपि ॥१०५॥ चक्रव्यूहव्यपोहाथ गरुडव्यूहकल्पनम् । सिंहगारुडविद्यासु रथाप्तिं बलकृष्णयोः ॥१०६॥ नेमेः सारथिरूपेण मातुले रुपसर्पणम् । नेम्यनावृष्णिपार्थ श्च चक्रव्यूहस्य भेदनम् ॥10॥ कदनं पाण्डुपुत्राणां धृतराष्ट्रसुतैः सह । सेनापत्योर्महायुद्धं कृष्णमागधयोरतः ।।१०८॥ चक्रोत्पत्तिं तदा विष्णोर्जरासन्धवधस्ततः । विजयं वसुदेवस्य खेचरीभिनिवेदितम् ॥१०९॥ कृष्णकोटिशिलोत्क्षेपं वसुदेवागमं ततः । ततो दिग्विजयं दिव्यं रत्नानां च समुद्भवम् ॥११॥ भ्रात्रोः राज्याभिषेकं च द्रौपदीहरणं सह । पाण्डवैर्धातकीखण्डाद् विष्णुनानयनं पुनः ॥१११॥ नेमिसामर्थ्य विज्ञानं मजनं तदनन्तरम् । पूरणं पाञ्चजन्यस्य विवाहारम्भसंभ्रमम् ॥११२॥ मृगमोक्षविधानं च दीक्षणं केवलोदयम् । देवागमविभूतिं च समवस्थानकीर्तनम् ।।११३॥ राजीमत्यास्तपःप्राप्ति द्विधा धर्मोप शनम् । धर्मतीर्थविहारं च षट्पहोदरसंयभम् ॥१४॥ ऊर्जयन्तनगारोहं देवकीप्रश्नसंकथाम् । रुक्मिणीसत्यमामादिसहादेवीभवान्तरम् ।।११५॥ कुमारस्य गजाख्यस्य संमवं तस्य दीक्षणम् । वसुदेवेतरोद्विग्ननवभ्रातृतपस्यनम् ॥१६॥ त्रिषष्टिपुरुषोभूति सजिनान्तरविस्तरम् । बलदेवपरिप्रश्नं ततः प्रद्युम्नदीक्षणम् ।।११।। रुक्मिण्यादिहरिस्त्रीणां दुहितणां च संयमम् । दीपायनमुनेः क्रोधाद् द्वारवल्या विनाशनम् ॥११८।। सभामें क्षोभ उत्पन्न होना, दोनों सेनाओंका पास-पास आना, विजया पर्वतके विद्याधरोंमें क्षोभ उत्पन्न होना, श्री वसुदेवका पराक्रम, अक्षौहिणी दलका प्रमाण, रथी, अतिरथ, समरथ और अर्धरथ राजाओंका निरूपण, जरासन्धके चक्रव्यूहको नष्ट करनेके लिए श्रीकृष्णको सेनामें गरुड़व्यूहकी रचना होना, बलदेवको सिंहवाहिनी और कृष्णको गरुड़वाहिनो विद्याकी प्राप्ति होना, नेमिके सारथिके रूप में उनके मामाके पुत्रका आगमन, नेमि, अनावृष्णि तथा अर्जुनके द्वारा चक्रव्यूहका भेदा जाना, पाण्डवोंका कौरवोंके साथ युद्ध, दोनों सेनाओंके अधिपति कृष्ण तथा जरासन्धके महायुद्धका वर्णन है ॥१००-१०८।। तदनन्तर श्रीकृष्णके चक्ररत्नकी उत्पत्ति होना, जरासन्धका मारा जाना, विद्याधरियोंके द्वारा वसुदेवके लिए श्रीकृष्णकी विजयका समाचार सुनाना, कृष्णका कोटिशिलाका उठाना, वसदेवका आगमन, श्रीकृष्णका दिग्विजय, दिव्यरत्नोंकी उत्पत्ति, दोनों भाइयोंका राज्याभिषेक. द्रौपदीका हरण, श्रीकृष्ण द्वारा पाण्डवोंके साथ जाकर धातकीखण्डसे द्रौपदोका पूनः वापस लाना, श्रीकृष्णको नेमिनाथकी सामथ्यंका ज्ञान होना, नेमिनाथकी जलक्रीड़ा, पांचजन्य शंखका बजाना, नेमिनाथके विवाहका आरम्भ, पशुओंका छुड़ाना, दीक्षा लेना, केवलज्ञान उत्पन्न होना, ज्ञानकल्याणकके लिए देवोंका आगमन, समवसरणका निर्माण, राजीमतीका तप धारण करना, सागार और अनगारके भेदसे दो प्रकारके धर्मका उपदेश देना, धर्म-तीर्थोंमें विहार, श्रीकृष्णके छह भाइयोंका संयम धारण करना, नेमिनाथका गिरिनार पर्वतपर आरूढ़ होना, देवकीके प्रश्नका उत्तर देना, रुक्मिणी तथा सत्यभामा आदि आठ महादेवियोंके भवान्तरोका निरूपण, गजकूमारका जन्म, उनकी दीक्षा और वसुदेवसे भिन्न नौ भाइयोंका संसारसे उद्विग्न हो तपश्चरण करनेका निरूपण है ।।१०९-११६|| तदनन्तर भगवान् नेमिनाथके द्वारा त्रेसठ शलाकापुरुषोंकी उत्पत्तिका वर्णन, तीर्थकरोंके अन्तरका विस्तार, बलदेवका प्रश्न, प्रद्युम्नकी दीक्षा, रुक्मिणी आदि कृष्णको स्त्रियों और १. खगक्षोभो क., ख., ग., घ., ङ., म.,। २. एतन्नामधेयस्य शङ्कविशेषस्य। ३. विष्णोः युगलत्रयरूपषट्सहोदरसंयमम् । ४. वसुदेवं विहाय समुद्रविजयादीनां नवानां भ्रातणां तपस्यनं वैराग्यम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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