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________________ प्रथमः सर्गः १ सत्यातिमुक्तकादेशं कंससंक्षोभकारणम् । प्रार्थनं वसुदेवस्य देवकीप्रसवं प्रति ॥ ६६ ॥ 'आनकेन मुनेः प्रश्नमष्टपुत्रभवान्तरम् । चरितं नेमिनाथस्य पापप्रमथनं तथा ॥ ६० ॥ उत्पत्ति वासुदेवस्य गोकुले बालचेष्टितम् । ग्रहणं सर्वशास्त्राणां बलदेवोपदेशतः ॥ ११ ॥ चापरत्नसमारोपं कालिन्यां नागनाथनम् । वाजिवारणचाणूर मल्लकंसवधं ततः ॥ ३२ ॥ उग्रसेनस्य राज्यं च सत्यभामाकरग्रहम् । सर्वज्ञातिसमेतस्य प्रीतिं च परमां हरेः ॥१३॥ जीवद्यशोविलापं च जरासन्धरूपं ततः । प्रेषितस्य रणे कालयवनस्य पराभवम् ॥ ६४ ॥ तथाऽपराजितस्यापि मारणं हरिणा रणे । शौरीणां परमं तोषमकुतोभयतः स्थितिम् ॥१५॥ शिवादेव्याः सुतोत्पत्तौ षोडशस्त्रप्रदर्शनम् । फलानां कथनं पत्या नेमिनाथसमुद्भवम् ॥१६॥ मेरो जन्माभिषेकं च बालक्रीडामहोदयम् । जरासन्धातिसन्धानं 'शौरिसागरसंश्रयम् ||३७|| देवताकृतमायातो जरासन्धनिवर्तनम् । विष्णोः 'साष्टमभक्तस्य दर्भशय्याविरोहणम् ||१८|| गौतमेनेन्द्रवचनात् सागरस्यापसारणम् । कुत्रेरेण क्षणात्तत्र द्वारावत्या निवेशनम् ॥६॥ रुक्मिणीहरणं भास्वानुप्रद्युम्नसम्भवम् । रौक्मिणेयहृतिं पूर्ववैरिणा धूमकेतुना ॥ १००॥ विजयार्द्धस्थितिं पित्रोर्नारदेनेष्टसूचनम् । प्राप्तिं षोडशलाभानां प्रज्ञप्तेरुपलम्भनम् ||१११ ॥ कालसंवरसङ्ग्रामं पितृमातृसमागमम् । शम्बोत्पत्ति शिशुक्रीडां प्रश्नं चापि पितुः पितुः ||१०२ || तेन स्वहिण्डाख्यानं कुमाराणां च कीर्त्तनम् । वार्तोपलम्भाद् दूतस्य प्रेषणं प्रतिशत्रुणा ॥१०३॥ ऐसा श्री सत्यवादी अतिमुक्तक मुनिका आदेश सुन कंसका व्याकुल होना, 'देवकीका प्रसव हमारे घर ही हो' इस प्रकार कंसकी वसुदेवसे प्रार्थना करना, वसुदेवका अतिमुक्तक मुनिसे प्रश्न, देवकीके आठ पुत्रोंके भवान्तर पूछना और भगवान नेमिनाथके पापापहारी चरितका निरूपण है ||८७- ६०॥ तदनन्तर श्रीकृष्णकी उत्पत्ति, गोकुलमें उनकी बालचेष्टाएँ, बलदेवके उपदेश से समस्त शास्त्रोंका ग्रहण, धनुष रत्नका चढ़ाना, यमुना में नागको नाथना, घोड़ा, हाथी, चाणूरमल्ल और कंसका बध, उग्रसेनका राज्य, सत्यभामाका पाणिग्रहण, सर्वकुटुम्बियों सहित श्रीकृष्णका परम प्रीतिका अनुभव करना, कंसकी स्त्री जीवद्यशांका विलाप, जरासन्धका क्रोध, रणमें भेजे हुए कालयवनका पराजय, श्रीकृष्णके द्वारा युद्ध में अपराजितका मारा जाना, यादवोंका परमहर्ष और निर्भयताके साथ रहना, पुत्रोत्पत्तिके निमित्त शिवादेवीके सोलह स्वप्न देखना, पति के द्वारा स्वप्नोंका फल कहा जाना, नेमिनाथ भगवान्‌का जन्म, सुमेरु पर्वतपर उनका जन्माभिषेक होना, भगवान्की बालक्रीड़ा और महान अभ्युदयका विस्तार, जरासंघका पीछा करना, यादवोंका सागरका आश्रय करना, देवीके द्वारा की हुई मायासे जरासन्धका लौटना, तीन दिनके उपवासका नियम लेकर कृष्णका डाभकी शय्यापर आरूढ़ होना, इन्द्रकी आज्ञासे गौतम नामक देवके द्वारा समुद्रका संकोच करना और कुबेरके द्वारा वहाँ क्षणभर में द्वारावती ( द्वारिका ) नगरी - की रचना होना इन सबका वर्णन है ॥११- ६६ ॥ तदनन्तर रुक्मिणीका हरा जाना, देदीप्यमान भानुकुमार और प्रद्युम्नकुमारका जन्म होना, रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्नका पूर्वभवके वैरी धूमकेतु असुर के द्वारा हरण होना, विजयार्ध में प्रद्युम्न की स्थिति, नारदके द्वारा प्रद्युम्न के माता-पिताको इष्ट समाचारकी सूचना देना, प्रद्युम्नको सोलह लाभों तथा प्रज्ञप्ति विद्याकी प्राप्ति होना, राजा कालसंवर के साथ प्रद्युम्नका युद्ध, मातापिताका मिलाप, शम्बकुमारकी उत्पत्ति, प्रद्युम्न की बालक्रीड़ा, वसुदेवका प्रद्युम्नसे प्रश्न, प्रद्युम्न द्वारा अपने भ्रमणका वृत्तान्त, सकल यादव कुमारोंका कीर्तन, समाचार पाकर प्रति शत्रु जरासन्धका कृष्णके प्रति दूत भेजना, यादवोंकी १. वसुदेवेन । २. कृष्णस्य । ३. सर्व कुटुम्बयुक्तस्य । ४. यादवानां समुद्राश्रयम् । ५. उपवासत्रययुक्तस्य । ६. शोभमानभानुकुमारप्रद्युम्नोत्पत्तिम् । ७. प्रद्युम्नस्य हरणम् । ८. स्वकीयपरिभ्रमणाख्यानम् । २ For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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