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________________ पश्चत्रिंशः सर्गः ४५१ अलक्षितः कंसमटैः प्रसुप्तः प्रसुप्तपौरे समये पुरस्य । स गोपुरद्वारकपाटसंधि विपाव्य विष्णुक्रमयुग्मसंगात् ॥२३॥ पयःकणे घ्राणपुटं प्रविष्टे शिशोस्तडिद्वातगमीरनादे। क्षते चिरञ्जीव जयस्वविघ्नस्त्वमित्यनुश्रत्य तदोपरिष्टात् ॥२॥ प्रियोग्रसेनेन नृपेण दत्तां प्रियाशिर्ष तोषयुतोऽगदीत्तम्। रहस्यरक्षा क्रियतां प्रतीक्ष्य विमुक्तिरस्मात्तव दैवकेयात् ॥२५॥ प्रवर्धता भ्रातृशरीरजायाः सुतोऽयमज्ञातमरेरितीष्टम् । तदौग्रसेनीमभिवन्द्य वाचममू विनिर्जग्मतुराशु पुर्याः ॥२६॥ ज्वलद्विषाणो वृषमः पुरस्तात्प्रदीपयन्मार्गमगात्स तूर्णम् । महानुभावाद्यमुना हरेर्दाग् बभूव विच्छिन्नमहाप्रवाहा ॥२७॥ धुनी समुत्तीय ततोऽभिगम्य वनं च वृन्दावनमत्र गोष्ठे । सुनन्दगोपं सयशोदमाप्तं क्रमागतं तौ निशि दृष्टवन्तौ ॥२८॥ समय ताभ्यामहरस्यभेदं प्रवर्द्धनीयं निजपुत्रबुद्धया। शिशं विशालेक्षणमीक्षणानां महामृतं कान्तिमयं स्रवन्तम् ॥२९॥ ततश्च तत्कालभवां यशोदाशरीरजां विश्वसनाय शत्रोः। अरं समादाय समेत्य देव्यै प्रदाय तौ तस्थतरप्रलक्ष्यौ ॥३०॥ शीघ्र ही घरसे बाहर निकल पड़े ।।२२।। उस समय समस्त नगरवासी सो रहे थे तथा कंसके सुभट भी गहरी नींदमें निमग्न थे इसलिए कोई भी उन्हें देख नहीं सका। गोपुर द्वारपर आये तो किवाड़ बन्द थे परन्तु श्रीकृष्णके चरणयुगलका स्पर्श होते ही उनमें निकलने योग्य सन्धि हो गयी जिससे सब बा उस समय पानीकी एक बूंद बालकको नाकमें घुस गयी जिससे उसे छींक आ गयी। उस छींकका शब्द बिजली और वायुके शब्दके समान अत्यन्त गम्भीर था। उसी समय ऊपरसे आवाज आयी कि 'तू निर्विघ्न रूपसे चिरकाल तक जीवित रह ।' गोपुर द्वारके ऊपर कंसके पिता राजा उग्रसेन रहते थे। उक्त आशीर्वाद उन्हींने दिया था। उनके इस प्रिय आशीर्वादको सुनकर बलदेव तथा वसुदेव बहुत प्रसन्न हुए और उग्रसेनसे कहने लगे कि हे पूज्य ! रहस्यको रक्षा की जाये। इस देवकीके पुत्रसे तुम्हारा छुटकारा होगा ।।२४-२५॥ इसके उत्तरमें उग्रसेनने स्वीकृत किया कि 'यह हमारे भाईकी पत्रीका पत्र शत्रसे अज्ञात रहकर वद्धिको प्राप्त हो।' उस समय उग्रसेनके उक्त वचनकी प्रशंसा कर दोनों शीघ्र ही नगरीसे बाहर निकल गये ॥२६॥ उस समय, जिसके सोंग देदीप्यमान थे ऐसा एक बैल आगे-आगे मार्ग दिखाता हुआ बड़े वेगसे जा रहा था। यमुनाका अखण्ड प्रवाह बह रहा था परन्तु श्रीकृष्णके प्रभावसे उसका महाप्रवाह शीघ्र ही खण्डित हो गया ॥२७|| तदनन्तर नदीको पार कर वे वृन्दावनकी ओर गये। वहाँ गांवके बाहर खिरकामें अपनी यशोदा स्त्रोके साथ सुनन्द नामका गोप रहता था। वह वंश-परम्परासे चला आया इनका बड़ा विश्वासपात्र व्यक्ति था। बलदेव और वसुदेवने रात्रिमें ही उसे देखा और दोनोंको पुत्र सौंपकर कहा कि देखो भाई! यह पुत्र विशाल नेत्रोंका धारक है तथा नेत्रोंके लिए कान्तिरूपी महाअमृतको वरसानेवाला है। इसे अपना पुत्र समझकर बढ़ाओ और यह रहस्य किसीको प्रकट न हो सके इस बातका ध्यान रखो ।।२८-२९।। तदनन्तर उसी समय उत्पन्न हुई यशोदाकी पुत्रीको लेकर दोनों शीघ्र ही वापस आ गये और शत्रुको विश्वास दिलानेके लिए उसे रानी देवकीके लिए देकर गुप्त रूपसे स्थित हो गये ॥३०॥ १. पूज्य ? प्रतीक्ष म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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