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________________ ४५२ हरिवंशपुराणे स्वसुः प्रसूतिं प्रतिविद्ये कंसः प्रसूत्यगारं 'विघृणः प्रविश्य । विलोक्य बालामं मलाममुष्याः पतिः कदाचित्प्रमवेदरिमें ॥३१॥ विचिन्त्य शङ्काकुलितस्तदेति निरस्तकोपोऽपि स दीर्घदर्शी । स्वयं समादाय करेण तस्याः प्रणुद्य नासां चिपिटीचकार ॥३२॥ स देवकी मानस तापकारी सुतान्तदर्शी किल निर्वृतारमा | अतिष्ठदन्तर्हितरौद्रभावः सुखेन तावत्कतिचिद्दिनानि ॥ ३३ ॥ ततो व्रजस्थः कृतजातकर्मा स्तनंधयोऽसौ कृत कृष्णनामा । प्रवर्धते नन्दयशोदयोस्तु प्रवर्धयन् प्रीतिमभूतपूर्वाम् ॥ ३४ ॥ गदासिचक्राङ्कुशशङ्खपद्मप्रशस्त रेखारुणपाणिपादः । स गोपगोपीजनमानसानि सकामसुत्तानशयो जहार ॥ ३५ ॥ सुरूपमिन्दीवरवर्णशोभं स्तनप्रदानव्यपदेश गोध्यः । अहंयवः पूर्णपयोधरास्तमतृप्तनेत्राः पपुरेकतानम् ॥ ३६ ॥ इतः कदाचिद्वरुणेन कंसो निमित्तविज्ञेन हितैषिणोक्तः । नृपैधते ते रिपुत्र कश्चित्पुरे वने वा परिमृग्यतां सः ॥ ३७ ॥ ततोऽष्टमाख्यानशनं तपोऽसौ चकार कंसो रिपुनाशबुद्ध्या । पुराभ्युपेतार्थ समर्थनाय सुदेवताः प्रोचुरुपेत्य वास्तम् ॥३८॥ पुरातपःसाधितदेवतास्ता इमा वयं ते वद वस्तु कृत्यम् । विहाय itaraपाणी क्षणेन कः कंसरिपुर्निरस्यः ॥ ३९ ॥ तदनन्तर बहनकी प्रसूतिका समाचार पाकर निर्दय कंस प्रसूतिका - गृहमें घुस गया । वहाँ निर्दोष कन्याको देखकर यद्यपि इसका क्रोध दूर हो गया था तथापि दीर्घदर्शी होनेके कारण उसने विचार किया कि कदाचित् इसका पति मेरा शत्रु हो सकता है । इस शंकासे आकुलित होकर उसने उस कन्याको स्वयं उठा लिया और हाथसे मसलकर उसकी नाक चपटी कर दी ||३१-३२|| इस प्रकार देवकीके मनको सन्ताप करनेवाले कंसने जब देखा कि अब इसके पुत्र होना बन्द हो गया है तब वह सन्तुष्ट हो हृदयकी क्रूरताको छिपाता हुआ कुछ दिनों तक सुखसे निवास करता रहा ||३३|| तदनन्तर जिसका जातसंस्कार कर कृष्ण नामे रखा गया था ऐसा व्रजवासी बालक नन्द और यशोदाकी अभूतपूर्वं प्रीतिको बढ़ाता हुआ सुखसे बढ़ने लगा ||३४|| जब वह बालक चित्त पड़ा हुआ गदा, खड्ग, चक्र, अंकुश, शंख तथा पद्म आदि चिह्नोंकी प्रशस्त रेखाओंसे चिह्नित लाल-लाल हाथ-पैर चलाता था तब गोप और गोपियों के मनको बरबस खींच लेता था || ३५|| नील कमल जैसी सुन्दर शोभाको धारण करनेवाले उस मनोहर बालकको, पूर्ण स्तनोंको धारण करनेवाली गोपिकाएँ स्तन देने के बहाने अतृप्त नेत्रोंसे टकटकी लगाकर देखती रहती थीं ||३६|| इधर किसी दिन कंसके हितैषी वरुण नामक निमित्तज्ञानीने उससे कहा कि राजन् ! यहाँ . कहीं नगर अथवा वनमें तुम्हारा शत्रु बढ़ रहा है उसकी खोज करनी चाहिए ॥ ६७॥ तदनन्तर शत्रुके नाशकी भावनासे कंसने तीन दिनका उपवास किया सो पूर्व भवमें इसने जिन देवियों को यह कहकर वापस कर दिया था कि अभी कुछ काम नहीं है अगले भवमें आवश्यकता पड़े तो सहायता करना । वे देवियां पूर्व स्वीकृत कार्यको सिद्ध करनेके लिए आकर कंससे कहने लगों कि १. विज्ञ म. । २. विगता घृणा दया यस्य सः विघृणः म., ग । ३ चिपिटींचकार म । ४ बलभद्रनारायणी मुक्त्वा । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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