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________________ त्रयस्त्रशः सर्गः त्रिः परीत्य स तं नत्वा जगौ ते पादपूजनम् । कुर्वे पद्मसहस्त्रेण मुने ! मङ्गीं लभे यदि ॥ ११२ ॥ उक्त्वेति प्रगती लब्ध्वा स तामानीय मानिनीम् । महामुनिपदस्पर्शानिर्विषां विदधे वधूम् ॥ ११३ ॥ मुनिपादोपकण्ठेऽसौ तावत्तिष्ठेत्युदीर्यं ताम् । सुदर्शनं सरो यातः पद्मानामानिनीषया ॥ ११४ ॥ शूरसेनस्तमादर्य महास्नेहं प्रियां प्रति । स जिज्ञासुर्मनस्तस्था रूपी रूपमदर्शयत् ॥ ११५ ॥ गूढधीः कृतसल्लापस्तया सकृतमन्त्रणः । तस्य दर्शनमात्रेण जातासौ कामविह्वला ॥ ११६ ॥ तमागत्याब्रवीद् देव ! मामिच्छ कृपयान्वितः । स बमाण करोम्येवं कथं भर्तरि जीवति ॥ ११७ ॥ बिभेम्यतः प्रियेऽवश्यं वीर्यान्वितभटादहम् । त्वं मा कुर्वीर्मयं नाथ ! सा तं प्राह सुरक्तधीः ॥११८॥ असिना घातयाम्येनं तेनाभ्युपगतं तथा । तत्र गूढतनुस्तस्थौ तत्कृतं तद्दिदृक्षया ॥ ११९ ॥ आगत्याभ्यर्च्य साध्वंही नमतोऽस्य शिरस्यसिः । मुक्तस्तया निरुद्धो द्वाक् शूरसेनेन तेन सः ॥१२०॥ अन्तर्हितवपुर्यातः शूरसेनो विरक्तधीः । ततोऽनु मायया मङ्गी तस्य स्पर्शेण शङ्किता ।। १२१ ॥ स्वदोषच्छादनायासौ पपात धरणीतले । मर्त्रा पृष्टा प्रिये किं नु केनचिद् भीषितात्र हि ॥ १२२ ॥ न किंचिदपि चात्यत्र तां प्रबोध्य भयातुराम् । वज्रमुष्टिर्मुनिं नत्वा सकान्तः स्वगृहं गतः ॥ १२३ ॥ 3 ४१३ मुनिराजको देखा ॥ १११ ॥ उसने तीन प्रदक्षिणाएं देकर मुनिराजको नमस्कार किया और कहा कि मुनिराज ! यदि मैं मंगीको प्राप्त कर सका तो एक हजार कमलोंसे आपके चरणोंकी पूजा करूँगा ||११२ || इस प्रकार कहकर वह ज्योंही आगे बढ़ा त्योंही उसे उसकी स्त्री मंगी मिल गयी । वह उसे मुनिराज के पास ले आया और उनके चरणोंके स्पर्शसे उसने उसे विष रहित कर लिया ॥ ११३ ॥ तदनन्तर 'जबतक मैं न आ जाऊँ तबतक तुम मुनिराजके चरणोंके समीप बैठना' इस प्रकार मंगोसे कहकर वज्रमुष्टि कमल लानेकी इच्छासे सुदर्शन नामक सरोवर की ओर चला गया | ११४ || पास ही छिपा हुआ शूरसेन मंगीके प्रति वज्रमुष्टिका महान् स्नेह देख चुका था इसलिए उसने उसके मनका भाव जाननेको इच्छासे उसे अपना रूप दिखाया । वह सुन्दर तो था हो ||११५|| वह अपने अभिप्रायको छिपाकर उसके साथ मीठी-मीठी बातचीत और गुप्त सलाह करने लगा। मंगी उसे देखते ही कामसे विह्वल हो गयी ॥ ११६ ॥ उसी विह्वल दशा में उसने शूरसेनके पास जाकर कहा कि हे देव ! आप कृपा कर मुझे स्वीकृत कीजिए। मंगीकी प्रार्थना सुनकर शूरसेनने कहा कि जबतक तुम्हारा पति जीवित है तबतक मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ ? है प्रिये ! मैं इस शक्तिशाली सुभटसे अवश्य ही डरता हूँ। इसके उत्तरमें अनुरागसे भरी मंगीने कहा कि हे नाथ! आप इसका भय नहीं कीजिए। मैं इसे तो तलवारसे अभी मार डालती हूँ । शूरसेनने उत्तर दिया कि यदि ऐसा है तो मुझे स्वीकार है। इस प्रकार कहकर वह उसका वह कार्य देखने की इच्छा से वहीं छिपकर खड़ा हो गया ।। ११७-११९ ।। तदनन्तर वज्रमुष्टिने आकर मुनिराजके चरणोंकी पूजा की और पूजा करनेके बाद ज्योंही वह नमस्कार करने लगा त्योंही मंगीने उसके शिरपर तलवार छोड़ना चाही, परन्तु शूरसेनने शीघ्र ही आकर तलवार छीन ली || १२० || शूरसेनको यह दृश्य देखकर संसारसे वैराग्य हो आया, इसलिए वह अपने-आपको प्रकट किये बिना ही वहाँसे चला गया। मंगी उसके स्पशंसे शंकित हो गयी, इसलिए अपना दोष छिपाने के लिए वह माया बताती हुई पृथिवी तलपर गिर पड़ी । मुष्टिको मंगी इस दुष्कृत्यका पता नहीं चल पाया। इसलिए वह उससे पूछता है कि प्रिये ! क्या यहाँ तुम्हें किसी ने डरा दिया है ? यहाँ भयका तो कुछ भी कारण दिखाई नहीं देता । इस प्रकार भयसे पीड़ित मंगीको सचेत कर वज्रमुष्टिने मुनिराजको नमस्कार किया और तदुपरान्त वह स्त्रीको साथ ले घर चला गया ॥ १२१-१२३॥ १. यदा म. । २. तत्कृत्यं म. । ३. मुनिचरणी । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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