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________________ ४१२ हरिवंशपुराण द्यूतवेश्याप्रसङ्गेन विनाश्य द्रविणं पितुः । चौथं भ्रातरः सर्वे गतास्तूजयिनी पुरीम् ॥१.१॥ कनीयांसं महाकाले संतत्यथै निधाय ते । प्राविशन् निशि निःशङ्काः पुरी षडपि चेतरे ॥१०२॥ कमलायास्तदा भर्ता राजान वृषमध्वजः । वप्रश्रीवल्लभस्तस्य 'दृढमुष्टिर्भटोत्तमः ॥१०॥ स वज्रमुष्टये मङ्गी स्वाङ्गजायाङ्गजातये । राज्ञा विमलचन्द्रेण विमलाजामदापयत् ॥१०॥ सातिवल्लमिका तस्य 'वल्लकीवाङ्गवतिनी। श्वश्रं शुश्रषया मनी संगता नानुवर्तते ॥१०५॥ अन्तःकलुषिणी सास्याः सततापायचिन्तती। उपायं चिन्तयन्त्यास्ते छद्मना तद्वियोजने ॥१०६॥ सा वसन्तोत्सवे रन्तु वनं प्रमदपूर्वकम् । दाङमामन्वेहि मङ्गीति राज्ञामा प्रागतेऽङ्गजे ॥१०॥ माल्यदानापदेशेन तामादिष्टां वधू कुधीः । संदष्टां दंदशकेन धूपिनेन घटोदरे ॥१०॥ मूर्च्छिता विषवेगेन ३वर्भूत्यैरजीहरत् । श्मशानं तन्महाकालं कालस्यापि भयंकरम् ॥१०९॥ स रात्री गृहमागत्य ज्ञात्वा वृत्तान्तमाविशत् । महाकाल महास्नेहाइन्वेष्टं स्वप्रियां प्रियः ॥११॥ खड्गदीप्रकरः सोऽयं तच्छ्मशानमशङ्कितः । रात्री प्रतिमयापश्यद् वरधर्ममुनि स्थितम् ॥११॥ जिनदत्ता आयिकाके समीप दीक्षा ले ली ।।१००|| सातों भाइयोंने जुआ और वेश्या व्यसनमें फंसकर पिताका सब धन नष्ट कर दिया। जब उनके पास कुछ भी नहीं रहा तब सब भाई चोरी करनेके लिए उज्जयिनी नगरी गये ॥१०१।। उज्जयिनीके बाहर एक महाकाल नामका वन है। वहाँ सन्ततिकी रक्षाके लिए छोटे भाईको रखकर शेष छहों भाई निःशंक हो रात्रिके समय नगरीमें प्रविष्ट हुए ॥१०२।। उस समय उज्जयिनीका राजा वृषभध्वज था। उसकी स्त्रीका नाम कमला था। राजा वृषभध्वजका दृढ़मुष्टि नामका एक उत्तम योद्धा था। उसकी स्त्रीका नाम वप्रश्री था। उन दोनोंको वज्रमुष्टि नामका पुत्र था । युवा होनेपर जब वह कामसे पीड़ित हुआ तब उसने राजा विमलचन्द्रसे उनकी विमला रानीसे उत्पन्न मंगी नामक पुत्री उसके लिए दिलवा दी ॥१०३-१०४|| मंगी वचमुष्टि के लिए बहुत प्यारी थी। वह वीणाकी तरह सदा उसीके साथ रहती थी और शुश्रुषासेवासे युक्त हो सासके अनुकूल आचरण नहीं करती थी अर्थात् सासकी कभी सेवा नहीं करती थी। इसलिए उसकी सास मन ही मन बहुत कलुषित रहती थी और निरन्तर उसके नाशका उपाय सोचती रहती थी। एक दिन वह छलसे उसके मारनेका उपाय सोचती हुई बैठी थी कि इतनेमें वसन्तोत्सवका समय आ गया और उसका पुत्र वज्रमुष्टि प्रमदवनमें कोड़ा करनेके लिए राजाके साथ पहले चला गया तथा मंगीसे कह गया कि हे मंगि! तू शीघ्र ही मेरे पीछे बा जाना ॥१०५-१०७।। इधर सासने मंगीको वसन्तोत्सवमें नहीं जाने दिया। उस दुर्बुद्धिने एक घड़े पिन जातिका जहरीला सॉप पहलेसे बुला रखा था। अवसर देख उसने मंगोसे कहा कि तू वसन्तोत्सवमें नहीं जा सकी है इसलिए दुःखी न हो। मैंने तेरे लिए पहलेसे ही सुन्दर माला बला रखी है। जा उस घड़ेमें-से निकालकर पहिन ले। भोली-भाली मंगीने मालाके लोभसे घड़ेमें ज्योंही हाथ डाला त्योंही उस धूपिन सर्पने उसे डंस लिया ॥१०८॥ मंगी विषके वेगसे तुरन्त ही मूच्छित हो गयी और सासने उसे अपने भृत्यों द्वारा उस महाकाल नामक श्मशानमें जो यमराजके लिए भी भय उत्पन्न करनेवाला था छुड़वा दिया ||१०९|| वज्रमुष्टि जब रात्रिको घर आया और सब वृत्तान्त उसे मालूम हुआ तो वह बड़े स्नेहसे अपनी प्रिया मंगीको ढूंढ़नेके लिए महाकाल श्मशान में जा घुसा ॥११०।। उस समय उसके हाथमें एक चमकती हुई तलवार थी। उसोके बलपर वह निःशंक होकर श्मशानमें घुसा जा रहा था। आगे चलकर उसने उस श्मशानमें रात्रि-भरके लिए प्रतिमा योग लेकर विराजमान वरधर्म १. दृष्टमुष्टि -म. । २. वीणेव । ३. श्वश्रूशुश्रूषया म., ग. । ४. सकृतापाय -ग. । ५. राज्ञा अमा = सहेत्यर्थः । ६. रात्रिप्रतिमया-म., ख., ग. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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