SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 452
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४१४ हरिवंशपुराणे चौरास्ततः समागत्य चौर्याल्लब्धधनं तदा । विभज्य समभागेन स्वं गृहाणेति तं जगुः ॥१२४॥ अमिच्छन् शूरसेनोऽपि जगौ दारार्थमर्थिनः । घटन्तेऽनर्थकार्य ते वज्रमुष्टिस्त्रियः समाः ॥१२५॥ दृष्ट्वा श्रुत्वा च वृत्तान्तं षट् कनिष्ठाः विरागिणः । प्रावजन् वरधर्मान्ते ज्येष्ठेभ्योऽप्यनयद् धनम् ॥१२६॥ सप्तसु श्रुतवार्तासु निष्क्रान्तास्वथ तास्वपि । तस्यैव स गुरोरन्ते सुभानुः प्रावजसुधीः ॥१२७॥ मुनीन् कालान्तरेणामूनागतान् वीक्ष्य सूरिणा । दीक्षाहेतुमसौ पृष्ट्वा वज्रमुष्टिरदीक्षत ॥५२८॥ भायिकास्तास्तथा पृष्ट्वा जिनदत्तापुरःसरा । मङ्गी संस्मृतवृत्तान्ता प्रवद्राज दृढव्रता ॥१२९।। भृतघोरतपोभाराः सर्वेऽप्याराध्य तेऽभवन् । सौधर्म चाणवायुकास्त्रायस्त्रिंशत्सुरोत्तमाः ।।१३०॥ पूर्वस्मिन् धातकीखण्डे भारते रौप्यपर्वते । च्युत्वा दक्षिणश्रेण्यां च नित्यालोकपुरोत्तमे ॥१३॥ चित्रचूलमनोहर्योज्येष्ठश्चित्राङ्गदोऽङ्गजः । जज्ञे त्रिद्वन्दगर्भास्तु क्रमेणैव तथोत्तरे ॥१३२।। कान्तौ गरुडसेनौ द्वौ गरुडध्वजवाहनौ। चूलौ मणिहिमादी च व्योमानन्दचरौ वरौ ॥१३३।। अभिरूपतमाः सर्वे भूरिविद्योद्यताः स्थिताः। चित्रचूलसुता मूनि ते चूलामणयो नृणाम् ।।१३४॥ राजा मेघपुरे चैव सर्वश्रीशो धनंजयः। धनश्रीरिति विख्याता तस्य कन्यातिरूपिणी ॥१३५॥ तदनन्तर शूरसेनके जो छह भाई चोरी करनेके लिए गये थे उन्होंने चोरीसे प्राप्त हुए धनके बराबर हिस्से कर शूरसेनसे कहा कि अपना हिस्सा उठा लो ॥१२४।। शूरसेनने हिस्सा लेने के प्रति अनिच्छा प्रकट करते हुए कहा कि लोग खियोंके पीछे ही नाना प्रकारके अनर्थ करते हैं और स्त्रियाँ वज्रमुष्टिकी स्त्रीके समान होती हैं ।।१२५।। इस वृत्तान्तको देख-सुनकर छह छोटे भाइयोंने विरक्त होकर उसी समय वरधर्म गुरुके समीप दीक्षा ले ली और बड़ा भाई स्त्रियोंके पास धन ले गया ॥१२६।। जब उन भाइयोंकी सातों स्त्रियोंने यह वृत्तान्त सुना तो उन्होंने भी विरक्त हो दीक्षा ले ली। अन्तमें बड़े भाई सुभानुकी बुद्धि भी ठिकाने आ गयी इसलिए उसने भी उन्हीं वरधर्म गुरुके पास दीक्षा ली ॥१२७॥ __अथानन्तर किसी समय अपने गुरुके साथ विहार करते हुए वे सातों मुनि उज्जयिनी आये। उनके दर्शन कर वज्रमुष्टिने उनसे दीक्षा लेनेका कारण पूछा। उत्तरमें उन्होंने वज्रमुष्टि और मंगीका सब वृत्तान्त कह सुनाया जिसे सुन वज्रमुष्टिको बहुत खेद हुआ तथा उसी समय उसने दीक्षा ले ली ॥१२८॥ उसी समय आर्यिका जिमदत्ताके साथ विहार करती हुई पूर्वोक्त सात आर्यिकाएं भी उज्जयिनी आयीं। मंगीने उनसे दीक्षाका कारण पूछा। उन्होंने जो उत्तर दिया उसे सुनकर मंगीको अपना पिछला सब वृत्तान्त स्मृत हो गया इसलिए उसने भी दृढ़ व्रत धारण कर दीक्षा ले ली ।।१२९।। तदनन्तर घोर तपके भारको धारण करनेवाले सातों मुनिराज आयुके अन्तमें समाधिमरण कर सौधर्म स्वर्गमें एक सागरकी आयुवाले त्रायस्त्रिंश जातिके उत्तम देव हुए ॥१३०।। धातकीखण्ड द्वोपके पूर्व भरतक्षेत्रमें जो विजयाधं पर्वत है उसकी दक्षिण श्रेणी में एक क नामका नगर है॥१३॥ उसमें किसी समय राजा चित्रचल राज्य करता था उसकी स्त्रीका नाम मनोहरी था। बड़े भाई सुभानुका जीव उन्हीं दोनोंके चित्रांगद नामका पुत्र हुआ और शेष छह भाइयोंके जीव भी उन्हींके क्रम-क्रमसे तीन युगलोंके रूपमें गरुडकान्त, सेनकान्त, गरुडध्वज, गरुडवाहन, मणिचूल और हिमचूल नामके छह पुत्र हुए। ये सभी आकाशमें आनन्दसे विचरण करते थे तथा अत्यन्त उत्कृष्ट थे ॥१३२-१३३॥ चित्रचूलके ये सभी पुत्र अत्यन्त सुन्दर थे, अनेक विद्याओंके प्राप्त करने में उद्यत थे और मनुष्योंके मस्तकपर चूडामणिके समान स्थित थे ॥१३४।। उसी समय मेघपुर नगरमें सर्वश्री नामका स्त्रोका स्वामी धनंजय नामका राजा राज्य करता था। राजा धनंजय और रानी सर्वश्रीके एक धनश्री नामको अत्यन्त रूपवती कन्या १. ज्येष्ठश्चासौ इभ्यश्चेति ज्येष्ठेभ्यः। २. यज्ञे म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy