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________________ ३९८ हरिवंशपुराणे ज्येष्ठो मुमोच यान् बाणान् योद्धसारथिवाजिनाम् । तान् कनिष्ठोऽच्छिनद्बाणैवैनतेय इवोरगान् ॥११९॥ एकैकं स त्रिधा छित्त्वा क्षुरप्रं भ्रातृयोजितम् । युवा विव्याध तस्यास्त्रै रथसारथिवाजिनः ॥१२०॥ दृष्ट्वास्त्रकौशलं तस्य शशंसुरवनीश्वराः । शिरष्कम्पाङ्गलिस्फोटसाधुवादविधायिनः ॥१२१॥ ज्यायानज्ञातसंबन्धः पुनः संधाय सायकम् । दिव्यमस्त्रसहस्राणां सहस्रममुचद् रुषा ॥१२॥ अस्त्रं ब्रह्मशिरः शीघ्रमस्त्रच्छादनमप्यसौ। युवा क्षिप्त्वाच्छिनद्रौद्रं ज्यायसा क्षिप्तसायकम् ॥१२३॥ परं कौशलमस्त्रेपु वसुदेवस्य यद्रणे । चिच्छेदास्त्राणि चित्राणि ररक्ष च निजाग्रजम् ॥१२॥ इत्थं कृतरणक्रीडः कनीयान् ज्यायसे ततः। प्रजिघाय धनस्नेहः स्वनामाकं शनैः शरम् ॥१२५॥ अनुकूलमिषं राजा तमादायेत्यवाचयत् । अज्ञातो निर्गतो योऽसौ महाराज ! तवानुजः ।।१२६॥ सोऽयं वर्षशतेऽतीते संप्राप्तः स्वजनान्तिकम् । पादप्रणाममद्यायं वसुदेवः करोति ते ॥१२॥ भ्रातृस्नेहसमुद्रेकारसमुद्रविजयस्ततः । क्षिप्तचापो रथात्तर्णमुत्तीर्याप निजानुजम् ॥१२८॥ उत्तीर्णः स्यन्दनादाशु वसुदेवोऽपि दूरतः । प्रणतः पादयोस्तेन दोर्ध्यामालिङ्ग्य चोद्धतः ॥१२९॥ आश्लिष्य रुदतोमा॑त्रोः साश्रुलोचनयोस्तयोः । प्राप्याक्षुभ्यादयः सर्वे कण्ठलग्नास्ततोऽरुदन् ॥१३०॥ 'साधु-साधु' शब्द कहकर जिनकी स्तुति कर रहे थे ऐसे उन दोनोंने वायव्य तथा वारुण आदि अस्त्रोंसे चिरकाल तक युद्ध किया ॥११८|| योद्धा, सारथि और घोड़ोंको लक्ष्य कर बड़े भाई जिन बाणोंको छोड़ते थे छोटे भाई उन्हें अपने बाणोंसे उस तरह छेद डालते थे जिस तरह कि गरुड़ सोको छेद डालता है ॥११९।। तदनन्तर युवा वसुदेवने भाईके द्वारा चलाये हुए एक-एक बाणके तीन-तीन टुकड़े कर अपने अस्त्रोंसे उनके रथ, सारथि और घोड़ोंको छेद डाला ॥१२०।। वसुदेवके अस्त्र-कौशलको देखकर राजा लोग उनकी बड़ी प्रशंसा कर रहे थे। उस समय कितने ही राजा अपना शिर हिला रहे थे, कोई अंगुलियां चटका रहे थे और कोई मुखसे साधु-साधु शब्दका उच्चारण कर रहे थे। ॥१२१।। बड़े भाईको इस बातका पता नहीं था कि इसके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है इसलिए उन्होंने क्रोधमें आकर वसुदेवपर हजारों अस्त्रोंसे युक्त दिव्य रौद्रास्त्र छोड़ा परन्तु कुमार वसुदेवने भी शीघ्र ही अस्त्रोंको आच्छादित करनेवाला ब्रह्मशिर नामक अस्त्र छोड़कर बड़े भाईके द्वारा छोड़े हुए उस रौद्रास्त्रको बीचमें ही काट डाला ॥१२२-१२३॥ वसुदेवका संग्राममें शस्त्र चलानेका कौशल परम प्रशंसनीय था क्योंकि उन्होंने नाना प्रकारके शस्त्रोंको तो काट दिया था परन्तु अपने बड़े भाईको सुरक्षित रखा था ॥१२४।। इस प्रकार रणकोड़ा करते-करते जिनका हृदय स्नेहसे भर गया था ऐसे वसुदेवने बड़े भाईके पास अपने नामसे चिह्नित बाण भेजा। उनका वह बाण मन्दगतिसे गमन करता हआ बड़े भाईके पास पहुँचा ॥१२५॥ राजा समुद्रविजयने उस अनुकूल बाणको लेकर उसमें लिखा हुआ यह समाचार पढ़ा कि 'हे महाराज ! जो अज्ञात रूपसे निकल गया था वही मैं आपका छोटा भाई वसुदेव हूँ। सौ वर्ष बीत जानेके बाद वह आज आत्मीय जनोंके समीप आया है । हे आर्य ! वह आपके चरणोंमें प्रणाम करता है ।।१२६-१२७।। तदनन्तर भ्रातृ-स्नेहकी प्रबलतासे समुद्रविजयने अपने हाथका धनुष दूर फेंक दिया और वे शीघ्र ही रथसे उतरकर छोटे भाईके पास जा पहुँचे ।।१२८।। इधर वसुदेव भी शीघ्र ही रथसे उतरकर दूरसे ही उनके चरणोंमें गिर गये । समुद्रविजयने दोनों भुजाओंसे उठाकर उनका आलिंगन किया ।।१२९।। दोनों भाई एक दूसरेका आलिंगन कर रोने लगे और उनके नेत्रोंसे आँसू टप-टप गिरने लगे। उसी समय १. निजं म. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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